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बाहुबली, RRR बनाने वाले अब बना रहे हैं 1770 के संन्यासी विद्रोह पर फिल्म

फ़िल्म 1770 का पोस्टर हाल ही में सोशल मीडिया पर जारी किया गया है। फ़िल्म के रिलीज़ डेट की घोषणा होनी बाक़ी है।

हिंदी सिनेमा और मीडिया के हिंदू विरोधी छद्म को तोड़ने के लिए एक फ़िल्म आ रही है.. जिसका नाम है- 1770 (सत्रह सौ सत्तर)… यह फ़िल्म 18वीं शताब्दी में हुए संन्यासी विद्रोह के बारे में है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अंग्रेजों से विद्रोह का बिगुल सबसे पहले हिंदू साधु-संतों ने फूंका था। यह वो समय था जब मुगल आक्रमणकारियों का शासन अंतिम साँसें ले रहा था। देश के कई क्षेत्रों में ईस्ट इंडिया कंपनी आधिपत्य जमा चुकी थी। संन्यासी विद्रोह का केंद्र बंगाल और बिहार के क्षेत्रों में था। साधु-संत अपने गाँव अथवा शहर से तीर्थ स्थानों तक आते-जाते रहते थे। वे रास्ते में पड़ने वाले गाँवों में विश्राम करते और वहाँ रहने वाले कृषकों और शिल्पकारों में देश की परिस्थितियों के बारे में बताते। इससे लोगों में परतंत्रता के विरुद्ध एक जागृति पैदा हो रही थी। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध का यह वही समय था जब अंग्रेजों की नीतियों के कारण बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था। अंग्रेज समझ गए कि संन्यासियों का यह जनजागरण उनके लिए समस्या बन सकता है।

अंग्रेजों ने साधुओं पर प्रतिबंध लगाया

ईस्ट इंडिया कंपनी ने संन्यासियों को लुटेरा और अपराधी घोषित करके उनके कहीं भी आने-जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे साधु-संतों में भारी आक्रोश पैदा हो गया। पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन तक सीमित रहने वाले साधुओं ने धर्म स्थापना के लिए शस्त्र उठा लिए… लाखों-करोड़ों लोग अकाल में भूखों मर रहे थे, दूसरी ओर अंग्रेजों के भंडार अन्न से भरे हुए थे। साधु-संन्यासी अंग्रेजों के अन्न भंडारों पर हमला करके उन्हें लूट लेते थे। लूट में मिला सारा अन्न और धन निर्धन परिवारों में वितरित कर दिया जाता था। इस क्रांति का प्रभाव यह हुआ कि संन्यासी समूह जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए। कई छोटे-छोटे ज़मींदार, किसान और गाँवों के लोग उनके साथ सम्मिलित होते गए और आंदोलन फैलता गया।

आपराधिक घटना बताने का प्रयास

अंग्रेजों ने इस विद्रोह को एक आपराधिक घटना के रूप में दिखाने का प्रयत्न किया है। उनके अभिलेखों के अनुसार “संन्यासी के नाम से डकैतों के दल अव्यवस्था फैला रहे हैं। ये तीर्थयात्रियों के रूप में बंगाल के कुछ क्षेत्रों में भिक्षाटन और लूटमार करते हैं। बंगाल में अकाल के कारण इनकी संख्या में वृद्धि हुई है। भुखमरी के कारण कई किसान भी इनके साथ हो गए हैं। 50 से 1000 तक के समूहों में ये लूटमार और अग्निकांड जैसे अपराध करते हैं।”

  • अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध विद्रोह मुख्य रूप से दशनामी नागाओं और गिरि सम्प्रदाय के संन्यासियों ने आरंभ किया था।
  • यह वर्ष 1770 से 1777 अर्थात सात वर्ष तक सबसे उग्र रूप में था।
  • अंग्रेज़ी ठिकानों पर सन्यासियों के छापामार हमले वर्ष 1800 तक जारी रहे।
  • कई स्थानों पर उन्होंने अपना स्वतंत्र शासन भी स्थापित कर लिया था।
  • इस विद्रोह में सहस्त्रों साधु-संतों ने अपने प्राणों की आहुति दी।
  • बंगाली उपन्यासकार बंकिम चंद्र चटर्जी ने संन्यासी विद्रोह पर ही आनंदमठ और देवी चौधरानी नाम से दो पुस्तकें लिखी हैं।
  • वर्ष 1882 में लिखी आनंदमठ में वंदेमातरम गीत भी है, जो आगे चलकर भारत का राष्ट्रगीत बना।

वर्ष 1952 में आनंदमठ नाम से एक फ़िल्म भी आई थी। उसके गाने अत्यंत लोकप्रिय हुए थे। अब पूरे 70 वर्ष बाद तेलुगु निर्माता और लेखक वी विजेंदर प्रसाद ‘1770, एक संग्राम’ नाम से फ़िल्म ला रहे हैं। यह फिल्म तेलुगु के साथ-साथ हिंदी, बंगाली और तमिल भाषाओं में होगी। विजेंदर प्रसाद इससे पहले बाहुबली और RRR जैसी फ़िल्में भी लिख चुके हैं। इस फ़िल्म से लोगों की ढेरों आशाएँ जुड़ी हुई हैं।

हिंदू साधु-संतों के प्रति घृणा की जो नीति अंग्रेजों के समय आरंभ हुई थी, स्वतंत्र भारत में कांग्रेस ने उसे जारी रखा। साधु-संतों को हमेशा संदेह की दृष्टि से देखा जाता रहा। अंग्रेजों से लड़ाई में उनके योगदान और बलिदान को स्कूली इतिहास में नाममात्र का ही स्थान दिया गया है।

  • स्वतंत्रता के ठीक बाद जवाहरलाल नेहरू ने ईसाई मिशनरी वेरियर एल्विन के साथ समझौता किया था, जिसके अंतर्गत नगालैंड में साधु-संतों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया। साधु-संत ईसाई मिशनरियों द्वारा यौन शोषण और धर्मांतरण में रुकावट बन रहे थे। वर्ष 1941 में नगालैंड में एक भी ईसाई नहीं था, आज 88 प्रतिशत जनसंख्या ईसाई बन चुकी है। वेरियर एल्विन एक पीडोफाइल था, जिसने कई जनजातीय बच्चियों का यौन शोषण किया।
  • वर्ष 1954 में प्रयाग कुंभ के दौरान जवाहरलाल नेहरू की यात्रा के कारण साधुओं का मार्ग रोक दिया गया था, जिससे मची भगदड़ में सैकड़ों लोगों की जान चली गई थी। सरकार के दबाव में समाचार पत्रों ने यह समाचार छापा ही नहीं, ताकि नेहरू की छवि ख़राब न होने पाए।
  • 7 नवंबर 1966 को दिल्ली में गोहत्या पर प्रतिबंध की माँग कर रहे साधु-संतों पर इंदिरा गांधी ने गोली चलवाई थी।
  • इसी नीति के अंतर्गत वर्ष 2004 में सत्ता में आते ही सोनिया गांधी ने शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को झूठे आरोपों में जेल भिजवाया था। बाद में हिंदू आतंकवाद के नाम पर साधु-संतों का उत्पीड़न भी उसी नीति का हिस्सा था।
  • महाराष्ट्र के पालघर में साधुओं की पीट-पीटकर हत्या के पीछे भी जो मानसिकता काम कर रही थी वह अंग्रेजों द्वारा पैदा की गई है।
  • ढेरों फ़िल्में बनाई गई हैं, जिनमें साधु-संतों को बच्चे चोरी करते दिखाया जाता है। साधु-संत और संन्यासियों का ये खलनायकीकरण बहुत सोचे-समझे षड्यंत्र का हिस्सा है।

आशा है संन्यासी विद्रोह पर फ़िल्म से लोगों को इस देश का वास्तविक इतिहास पता चलेगा। नई पीढ़ी जानेगी कि मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए किसने अपना बलिदान दिया और किसने मलाई खाई। वे यह भी जान सकेंगे कि कैसे हिंदू संन्यासियों से अंग्रेजों की शत्रुता को कांग्रेस और उसका तंत्र आज भी निभा रहा है।

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