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योगी आदित्यनाथ के ‘धर्म राज्य’ में हिंदू मंदिरों पर ‘जज़िया’ बंद होगा

राज व्यवस्था में कुछ बड़े बदलाव इतनी सहजता से हो जाते हैं कि लोग विश्वास नहीं कर पाते। उत्तर प्रदेश में इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है। योगी आदित्यनाथ के पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद से जिन सकारात्मक बदलावों का क्रम आरंभ हुआ था, वो दूसरे कार्यकाल में भी जारी हैं। नवरात्र से ठीक पहले अयोध्या की यात्रा पर गए योगी आदित्यनाथ ने एक ऐसी घोषणा की, जो बहुत बड़ी तो नहीं कही जा सकती, लेकिन इसका महत्व ऐसा है कि हर कोई चौंक गया। उन्होंने कहा कि “अयोध्या नगर निगम मंदिरों, मठों, धर्मशालाओं और अन्य धार्मिक स्थानों से व्यावसायिक कर नहीं वसूलेगा।” बरसों तक हिंदू विरोधी और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण वाली राज व्यवस्थाओं के अभ्यस्त हो चुके लोगों के लिए यह घोषणा आश्चर्यचकित करने वाली थी।

अयोध्या के मंदिरों से आरंभ

अयोध्या में 12 हज़ार से अधिक मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल हैं। इस घोषणा से इन सभी को कुछ न कुछ राहत अवश्य मिली है। अभी उन्हें अलग-अलग नामों से ढेरों प्रकार के कर देने होते हैं। संभवत: स्वतंत्रता के बाद भारतीय इतिहास में पहली बार हुआ है कि किसी सरकार ने इस वसूली को बंद करने का आदेश दिया हो। अब तक जो व्यवस्था चली आ रही है वो मुग़लों और अंग्रेजों की तरह हिंदू मंदिरों की ‘लूट’ वाली मानसिकता पर आधारित है। दूसरी ओर मस्जिदों, चर्च और गुरुद्वारा अल्पसंख्यक होने के नाम पर छूट प्राप्त कर रहे थे। वे सरकारी कोष में एक रुपया भी नहीं देते, लेकिन सरकार द्वारा प्रदत्त सारी सुविधाओं का लाभ उठाते हैं। एक कथित सेकुलर देश में यह अन्यायपूर्ण व्यवस्था अपने आप में विचित्र है। यह एक तरह का ‘जजिया’ है जो भारत के हिंदू आज तक भुगत रहे हैं। अब आशा की जा रही है कि योगी आदित्यनाथ की यह घोषणा उत्तर प्रदेश के अन्य स्थानीय निकायों में भी लागू होगी और बहुत शीघ्र अन्य राज्य सरकारें भी अपने यहाँ हिंदुओं की धार्मिक स्वतंत्रता पर इस संस्थागत कुठाराघात को बंद करेंगी।

आंध्र के मंदिरों पर भी टैक्स

स्वतंत्रता के बाद से देश के लगभग सभी राज्यों में यही स्थिति चलती आ रही है। किसी ने इसमें बदलाव की आवश्यकता अनुभव नहीं की। बहुसंख्यक हिंदू समाज भी इस संस्थागत अन्याय को अपनी नियति मान चुका था। छिटपुट रूप से कहीं-कहीं इसके विरोध में स्वर उठते रहे, लेकिन किसी ने इन पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझी। वर्ष 2019 में आंध्र प्रदेश की जन सेना पार्टी के अध्यक्ष और तेलुगु सिनेमा के बड़े कलाकार पवन कल्याण ने सोशल मीडिया पर हैदराबाद के एक मंदिर के पुजारी का वीडियो डाला था, जिसके बाद कई लोगों को इस विषय के बारे में पहली बार पता चला था। उक्त वीडियो में पुजारी श्री रंगराजन ने केवल हिंदू मंदिरों पर कर लगाने की नीति पर प्रश्न उठाया था (देखें बॉक्स) यह विषय तब भी उठा था जब बिहार सरकार ने सभी मंदिरों को पंजीकृत कराने और उन पर 4 प्रतिशत टैक्स लगाने की घोषणा की थी। यह नियम छोटे-छोटे मंदिरों पर भी लागू किया गया।

 

“आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और भारत की अन्य सेकुलर सरकारें हज और यरुशलम जाने वालों को आर्थिक सहायता देती हैं तो हमें कोई आपत्ति नहीं। किंतु केवल मंदिरों पर ही टैक्स का भारी बोझ क्यों है? आंध्र प्रदेश सरकार हिंदू मंदिरों की कुल वार्षिक आय का लगभग 23.5 प्रतिशत कर के रूप में वसूल रही है। इनमें 15 प्रतिशत प्रशासनिक कर, 2 प्रतिशत अंकेक्षण शुल्क (ऑडिट फीस) और सार्वजनिक कल्याण कोष के नाम पर 2 प्रतिशत सम्मिलित है। लेकिन इस तरह की राजस्व वसूली किसी चर्च या मस्जिद से नहीं की जाती। इस तरह मंदिर की कुल आय का लगभग एक-चौथाई सरकारें ले लेती हैं। जबकि चर्च और मस्जिद सरकारी कोष में एक रुपया भी नहीं देते। यह संविधान के अनुच्छेद 27 का सरासर उल्लंघन है।”

श्री रंगराजन, मुख्य अर्चक, चिलकुर बालाजी देवस्थानम

मंदिरों से वसूली, मस्जिदों को माल

एक ओर हिंदू मंदिर दानदाताओं से मिलने वाली छोटी-मोटी राशि पर भी लगभग एक-चौथाई तक कर देने को विवश हैं। दूसरी ओर अधिकांश अल्पसंख्यक धार्मिक संस्थान भारत के सारे नियम-कायदों से परे हैं। सरकारों में मानो होड़ लगी है कि कौन मौलवियों को अधिक से अधिक वेतन देता है। कौन उन्हें अधिक छात्रवृत्ति बाँटता है। कहते हैं कि दिल्ली की जामा मस्जिद ने कई दशक से आज तक बिजली का बिल नहीं चुकाया है। लेकिन कोई छोटा-मोटा मंदिर एक महीना बिल न चुका पाए तो उसकी बिजली-पानी कटते देर नहीं लगती। दिल्ली समेत पूरे देश में ऐसे समाचार आए दिन देखने को मिलते रहते हैं।

स्वतंत्र देश में परतंत्र हिंदू मंदिर

मंदिरों पर कर से ही जुड़ा विषय है उन पर सरकारी नियंत्रण का। देशभर में लगभग 4 लाख हिंदू मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं। उनका चढ़ावा ट्रस्ट के माध्यम से सरकारी ख़ज़ाने में जमा हो रहा है। कुछ कथित सेकुलर दलों की सरकारें इन पैसों का क्या करती हैं समझा जा सकता है। हर वर्ष करोड़ों के चढ़ावे के बाद भी अधिकांश मंदिरों की स्थिति ख़स्ता है। जो पैसा हिंदू समाज के कल्याण पर खर्च होना चाहिए वो राज्य सरकारों की तुष्टीकरण वाली ‘सेकुलर नीतियों’ के काम आ रही हैं। हज़ारों वर्ष की भारतीय परंपरा में किसी हिंदू राजा ने कभी मंदिरों पर अधिकार या नियंत्रण का प्रयास नहीं किया और न ही उनसे कभी कर वसूला। लेकिन हिंदुओं के धार्मिक कार्यों में व्यवधान और हस्तक्षेप की जो परंपरा ग़ुलामी के कालखंड में आरंभ हुई वो स्वतंत्र भारत में भी बनी रही।

हिंदू मंदिरों पर करों का बोझ डालना और उनके आर्थिक अधिकार छीन लेना एक सोचा-समझा षड्यंत्र था। इसका उद्देश्य था कि हिंदुओं को अपने धार्मिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक संस्थान चलाने से वंचित कर दिया जाए। ताकि सेकुलरिज्म की आड़ में विस्तारवादी मज़हबों को अपनी जड़ें फैलाने का अवसर मिल जाए। यह प्रसन्नता की बात है कि 75 वर्ष बाद ही सही इस व्यवस्था को योगी आदित्यनाथ सरकार ने चुनौती दी है।

क्या कहता है अनुच्छेद 27?

संविधान का यह अनुच्छेद सरकारों को निर्देश देता है कि वे सभी धार्मिक स्थलों से कोई टैक्स नहीं वसूलेंगी। किसी को ऐसा कर देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जिसकी धनराशि किसी विशेष धर्म अथवा धार्मिक संप्रदाय की उन्नति या देखभाल के लिए व्यय की जाती हो। इसके लिए दो परिस्थितियाँ अनिवार्य हैं। पहली यह कि सरकारें टैक्स नहीं ले सकतीं, किंतु शुल्क लगा सकती हैं। दूसरी, यह कि आय की राशि उक्त धर्म अथवा मज़हब पर व्यय की गई हो। पहली शर्त का ही दुरुपयोग करके देश की अधिकांश राज्य सरकारें हिंदू धार्मिक स्थलों से कर वसूली कर रही हैं। लेकिन तुष्टीकरण की राजनीति के चलते वो यही काम इस्लाम और ईसाई मज़हबों के साथ नहीं करतीं।

योगी सरकार के लोक हितकारी निर्णय

  • मथुरा में मांस और मदिरा की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध
  • काशी विश्वनाथ, कृष्ण जन्मभूमि और प्रयागराज के संगम क्षेत्र में एक किलोमीटर तक शराब की बिक्री पर प्रतिबंध
  • मंदिरों में वीआईपी दर्शन संस्कृति पर रोक, सामान्य दर्शनार्थियों की सुविधाओं को प्राथमिकता
  • अयोध्या और काशी में बड़े स्तर पर दीपावली मनाने का कार्यक्रम
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