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जब गरीब किंतु सुखी ब्राह्मण के सपने में प्रकट हुए महात्मा कार्ल मार्क्स

मैंने पूछा कि कम्युनिस्ट आदमी खुश कब होता है। इस प्रश्न के उत्तर में नाना प्रकार की टिप्पणियां प्राप्त हुईं। किसी ने कहा कि देश का नुकसान होने पर, किसी ने कहा कि चरस फूंककर, तो किसी ने कहा कि ढपली बजाकर, कोई बोला लाल रंग देखकर, कोई बोला मोदी को गिरता देखकर, तो कोई बोला मरकर मार्क्स में एकाकार होकर… वगैरह, वगैरह। इनके बीच कुछ ऐसे सुधी मनुष्य भी थे जिनका दो टूक उत्तर था- कभी नहीं। जो खुश हो जाए वह कम्युनिस्ट नहीं। यही इस प्रश्न का सटीक उत्तर है और ऐसा क्यों है, वह आपको इस कथा से पता चलेगा।

अथ श्री महात्मा मार्क्स प्राकट्य कथा

एक बार की बात है, प्राचीन समय में एक निर्धन किंतु सुखी ब्राह्मण रहता था। वह भिक्षाटन करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता था। जब बाबा मार्क्स को ये बात पता चली तो उन्हें कुलबुलाहट होने लगी कि गरीब आदमी खुश कैसे हो सकता है। बहुत सोच-विचारकर उन्होंने उस ब्राह्मण को सपने में दर्शन देने का फैसला लिया। भगवान वाले दर्शन नहीं, ल्यूसिड ड्रीमिंग वाले दर्शन। ब्राह्मण भोला था, ल्यूसिड ड्रीमिंग से अनजान था, उसे लगा कि स्वयं प्रभु दर्शन देने आए हैं। ऊपर से मार्क्स बाबा अपने सिर के पीछे एलईडी वाला गोला लगाकर भी आ गए थे तो उस भोले ब्राह्मण को शत-प्रतिशत यकीन हो गया कि ये प्रभु ही हैं। हाथ जोड़कर बोला, प्रभु आज मेरा जन्म सफल हो गया। आपने मुझ गरीब पर इतनी कृपा की, अब और मुझे कुछ नहीं चाहिए।

मार्क्स बोले, ये तो हद एंटी-कम्युनिज़म है। एक तो गरीब, ऊपर से सुखी और ऊपर से अब इसे कुछ और चाहिए भी नहीं। ऐसे चलता रहा तो सारा धंधा शुरू होने से पहले ही चौपट हो जाएगा। उन्होंने कहा, वत्स, क्या तुमको नहीं लगता कि तुम्हारी गरीबी में इस समाज का हाथ है? ब्राह्मण बोला, नहीं प्रभो। ये तो मेरे पिछले जन्मों का फल है। मार्क्स बोले, पिछला जन्म किसने देखा है। तुमको इसी जन्म के आधार पर सभी फैसले लेने चाहिए। तुमको समझना चाहिए कि तुम इसलिए गरीब हो क्योंकि बाकी लोग अमीर हैं। तुमको उनसे भिक्षा मांगकर भोजन नहीं ग्रहण करना चाहिए, बल्कि तुमको उनसे छीनकर भोजन ग्रहण करना चाहिए।

ब्राह्मण घबरा गया, बोला, प्रभु आप कैसी बहकी-बहकी बातें करते हैं। मैं यह करूंगा तो समाज के सम्मुख क्या उदाहरण प्रस्तुत करूंगा। मार्क्स थोड़ा गुस्साकर बोले, रे मूर्ख, अब तू मुझे बताएगा कि मैं कैसी बातें करूं। मैं तो तेरा दुख देखकर तेरी सहायता करने चला आया और तू मुझे ही पाठ पढ़ाने लगा। ब्राह्मण भयभीत हो गया, बोला, प्रभु मुझे क्षमा करें किंतु मैं दुखी नहीं हूँ। मार्क्स क्रोध से थरथराते हुए बोले, गरीब है मगर दुखी नहीं है। ऐसा कैसे हो सकता है! ऐसा संभव ही नहीं है। तुम्हारे बेसिक्स ही गलत हैं। ऐसे कैसे तुमको मोक्ष प्राप्त होगा। मोक्ष का नाम सुनते ही ब्राह्मण सोच में पड़ गया। बोला, अगर मोक्ष प्राप्त करने के लिए दुखी रहना आवश्यक है तो मैं आज से दुखी रहूंगा। मैं प्रण लेता हूँ कि आज से और अभी से कोई मुझे कभी भी सुखी और संतुष्ट नहीं देखेगा। अगर कभी मैं अमीर भी हो जाऊँ तब भी मैं दुखी रहना बंद नहीं करूँगा। कभी किसी क्षणमात्र को भी यदि मैंने सुख महसूस किया तो उसी क्षण मैं मोक्ष से वंचित हो जाऊँ।

यह देखकर मार्क्स के होठों पर मुस्कुराहट नहीं फैली, वो कभी फैल भी नहीं सकती। बस उनकी त्यौंरियां थोड़ी ढीली हो गईं और उन्होंने कुछ शांत स्वर में कहा, तो आज से तुम कम्युनिस्ट क्लैन में शामिल होते हो वत्स। ब्राह्मण कुछ अचकचाकर बोला, कम्युनिस्ट क्लैन! ये क्या है प्रभु? यह हमेशा दुखी रहने वाले लोगों का एक समूह है जो मोक्षप्राप्ति के एक कॉमन उद्देश्य की ओर अग्रसर हैं। मार्क्स ने उसी शांत भाव से एक्स्प्लेन किया। बस तभी से, वो दिन है और आज का दिन, मजाल है कि कभी किसी साधारण मनुष्य ने मोक्षप्राप्ति की ओर अग्रसर कम्युनिस्ट मनुष्यों को हँसते-मुस्कुराते देखा हो।
इति श्री कम्युनिस्ट कथा संपन्न!

(तृप्ति शुक्ला की फ़ेसबुक वॉल से साभार)

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