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पैगंबर मोहम्मद साहब की शान में खूनखराबे के पीछे क्या है असली मर्ज़?

बेंगलुरु हिंसा की तस्वीर।

बीमारी मालूम हो, इलाज उपलब्ध हो और बन्दा करवाने को तैयार ना हो। अक्सर देखा है। अगर कोई बड़ी बीमारी या कैंसर जैसा कुछ हो तो लोग पहले तो घबरा जाते हैं। सबसे पहले भागते हैं होमियोपैथी की ओर या किसी साधु बाबा से भभूत-ताबीज लेने। यह होमियोपैथी पर विश्वास की वजह से नहीं, सर्जरी के डर से होता है। सर्जरी का डर लोगों में बीमारी के प्रति तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ लाता है। कोई बीमारी के अस्तित्व को नकारता है, तो कोई उस डॉक्टर को कोसता है जिसने बीमारी की जाँच करने को कहा था। किसी को लगता है कि पड़ोस वाली बुढ़िया चुड़ैल है जिसने टोटका कर दिया, तो किसी को लहसुन के गुण याद आने लगते हैं। डायग्नोसिस सामने है, इलाज सोचना है, पर लोगों की जिद है कि पहले बंगाली बाबा की ताबीज बांधकर देखेंगे। दाहिने हाथ में बांधने से फायदा नहीं हुआ तो बाएँ हाथ में बांधेंगे। पर सर्जरी, कीमोथेरेपी ना, उसके तो साइड इफेक्ट्स होते हैं। पर भइया, कैंसर के साइड इफ़ेक्ट्स तो कीमोथेरेपी से ज्यादा ही हैं।

बेंगलुरू की आतंकी हिंसा कोई नई बीमारी नहीं है। अगर इलाज मंजूर हो तो बीमारी लाइलाज भी नहीं है। बस, इलाज का कलेजा चाहिए। मोहम्मद को कुछ भी बोलते ही मुस्लिम आक्रामक हो जाते हैं। क्योंकि उन्हें भी पता है कि यही उनकी सबसे कमजोर कड़ी है। मोहम्मद के जीवन और चरित्र का सही विश्लेषण अगर कर दिया जाए तो इस्लाम भरभरा कर गिर जाएगा। यह उन्हें भी मालूम है। इसीलिए वे इस मोर्चे पर पूरी ताकत लगा देते हैं। पर अगर यह चीन या इजराइल में हो रहा हो तो क्या वहाँ भी वे यही प्रतिक्रिया देते? क्या इसी बात के लिए किसी इसरायली को भी वे वैसे ही मारने की धमकी देते? उन्हें इस्लाम प्यारा है, पर यह भ्रम निकाल दीजिये कि अपनी जान से ज्यादा प्यारा है। वे मोहम्मद के नाम पर हिंसा करने उतर आते हैं क्योंकि उन्हें इसकी कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती। अगर हमारी प्रतिक्रिया इजराइल जैसी हो तो विश्वास कीजिये, एक भी बन्दा घर से नहीं निकलेगा।

जब तक मोहम्मद के जीवन और चरित्र की सच्चाई बताने की आजादी नहीं होगी, उनका यह किला सुरक्षित है। यह अरबी तुर्की भेड़ियों का झुंड अपने आपको एक धर्म बताकर धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर सुरक्षा लेता रहेगा। इस किले पर वार किए जाने की जरूरत है, पर इससे पहले यह सुनिश्चित किये जाने की जरूरत है कि उनकी ओर से होने वाली हिंसा का सही जवाब दिया जाए। हमारे शासन और समाज, दोनों को यह इच्छाशक्ति दिखानी होगी जो इस स्वतंत्र देश के नागरिकों को सच बोलने की स्वतंत्रता सुनिश्चित कर सके। जब हम इस्लाम का सच दुनिया के सामने बोलने की क्षमता पा लेंगे, हम यह लड़ाई जीत लेंगे। यह लड़ाई जीतने लायक है, क्योंकि इस्लाम सच के वार नहीं झेल सकता।

(जाने-माने विचारक राजीव मिश्रा का लेख)

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