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जानिए कैसे फिल्म ‘गोल्ड’ के बहाने भारत के गौरव को दिया गया मज़हबी रंग

देश की अविस्मरणीय स्वर्णिम विजय की ऐतिहासिक विरासत से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों और उनसे जुड़े महानायकों का साम्प्रदायीकरण नहीं, बल्कि मुसलमानीकरण की कोशिश चल रही है। ताकि उसे हमेशा के लिए लोगों के दिलोदिमाग़ से मिटाया जा सके। इस बात का सबसे घिनौना उदाहरण है जावेद अख्तर के लड़के फरहान अख्तर द्वारा बनाई गई फिल्म ‘गोल्ड’। यह फिल्म इस देश में दो ढाई दशक पहले शुरू हुए फिल्म जिहाद के सबसे घातक प्रहारों में से एक थी। 2018 में आयी फिल्म ‘गोल्ड’ आज़ादी के बाद किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पहली जीत की कहानी थी। 1948 के ओलिम्पिक में इस जीत के जरिए पूरी दुनिया में भारतीय राष्ट्रगान ज़न गण मन पहली बार गूंजा था। वैश्विक मंच पर भारतीय तिरंगा पहली बार लहराया था। अतः आप इस विजय के मायने समझ सकते हैं। इस विजय के नायक तो भारतीय हॉकी टीम के सभी खिलाड़ी थे लेकिन उन विजेता खिलाडियों के नायक उस टीम के कप्तान किशनलाल थे। यह भी पढ़ें: हिंदुओं के खिलाफ ज़हर फैला रहा है बॉलीवुड, IIM का अध्ययन

हीरो नायक को बनाया मुसलमान!

फरहान अख्तर ने फिल्म में उस हॉकी टीम के कप्तान का नाम किशनलाल नहीं, बल्कि इश्तियाक बताया। फिल्म में उसने ध्यानचंद, रूप सिंह, केडी सिंह बाबू और बलबीर सिंह जैसे महान हॉकी खिलाड़ियों की वास्तविक पहचान की हत्या करते हुए उनको उल्टे सीधे काल्पनिक नाम दे दिए। उस भारतीय टीम के कोच थे एनएन मुखर्जी, जो हाबुल दादा के नाम से मशहूर थे। फरहान अख्तर ने अपनी फिल्म में उनका नाम रखा तपन दास। फिल्म में उनके चरित्र को नशे में धुत्त होकर सड़क पर पड़ा रहने वाले ऐसे शराबी के रूप में दिखाया था जिसकी पत्नी उसे रोज बेइज्जत करती थी। जबकि सच यह है कि हाबुल दादा ने शादी ही नहीं की थी। वो आजीवन अविवाहित ही रहे थे। उन्होंने अपने पूरे जीवन में कभी शराब को हाथ नहीं लगाया। यह इतने विश्वास से इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि हाबुल दादा लखनऊ में ही रहते थे। हॉकी के अलावा 1969 में मृत्यु तक उत्तर प्रदेश में फ़ुटबॉल के भी कर्ताधर्ता वही रहे थे। संयोग से उसी दौरान 1960 से 1970, लगातार 11 वर्ष तक उत्तर प्रदेश की सर्वश्रेष्ठ फुटबॉल टीम, उत्तर रेलवे के लखनऊ मंडल (डीएस ऑफिस, अब डीआरएम ऑफिस) के सेक्रेटरी मेरे पिता थे। इस कारण हाबुल दादा से लगातार 8-9 सालों तक उनका संपर्क रहा था। उनकी चर्चा वो अक्सर करते रहते थे। उस दौर में लखनऊ के खेल जगत से जुड़े अनेक ऐसे लोगों से पिता जी की ही वजह से मेरा संपर्क मेरी युवावस्था तक रहा जिन्होंने हाबुल दादा को बहुत करीब से देखा और जाना था। यह भी पढ़ें: जानिए क्यों आतंकवादियों के एजेंडे पर काम कर रहा है बॉलीवुड

जावेद अख़्तर ने निकाली दुश्मनी?

सवाल उठता है कि फ़रहान अख़्तर ने ऐसे सम्मानित और महान व्यक्तित्व को सड़कछाप शराबी के तौर पर दिखाने का फ़ैसला क्यों किया होगा? अब इसका कारण भी जान लीजिए। दरअसल हाबुल दादा के तनबदन में पाकिस्तान के नाम से ही आग लग जाती थी। 1948 और 1952 की ओलिंपिक स्वर्ण पदक विजेता टीमों का प्रशिक्षक रहने के बाद अपनी बढ़ चुकी उम्र के कारण उन्होंने स्वेच्छा से पद छोड़ दिया था। लेकिन 1960 के ओलिम्पिक में भारतीय हॉकी टीम की पाकिस्तान के हाथों हार से वह बूढ़ा शेर तिलमिला गया था। 1964 के ओलिम्पिक से पहले उन्होंने सार्वजनिक रूप से मांग की थी कि टीम मुझे सौंपो, गारंटी देता हूं कि गोल्ड मेडल भारत की जेब में होगा। हुआ भी यही था। टीम उनके हवाले कर दी गई थी और भारतीय हॉकी टीम 1964 के टोक्यो ओलिम्पिक में पाकिस्तान को पराजित कर गोल्ड मेडल के साथ लौटी थी। लेकिन हाबुल दादा उस टीम के साथ नहीं लौटे थे क्योंकि उनकी आयु और शारीरिक अवस्था के कारण डाक्टरों ने उन्हें हवाई यात्रा करने से मना कर दिया था इसलिए हाबुल दादा टीम के साथ टोक्यो नहीं गए थे। लेकिन उस अवस्था में भी टीम के साथ वो साल भर पहले से इसलिए जूझते रहे थे क्योंकि पाकिस्तान को हराना है। पाकिस्तानपरस्त लोगों के साथ हाबुल दादा सार्वजनिक रूप से कैसे पेश आते थे, इसके बहुत मनोरंजक किस्सों का भंडार है। उन्हें यहां लिख नहीं सकता। उल्लेख आवश्यक है कि उस दौर में जावेद अख्तर लखनऊ में ही रहा करता था। वो भी उन किस्सों को भलीभांति जानता है शायद। इसीलिए अपने लड़के के जरिए उसने भारतीय खेल जगत की सर्वाधिक मूल्यवान निधि के साथ ही साथ भारतीय खेल जगत की महान हस्ती हाबुल दादा को भी फिल्म जिहाद का शिकार बनवा दिया।

फ़रहान अख्तर को जवाब देना चाहिए कि क्या जावेद अख्तर के जीवन पर बनने वाली किसी फिल्म में जावेद अख्तर की पहचान लेखक शायर रामलोटन के रूप में दिखाया जा सकता है? अंत में यह भी बता दूं कि इस फिल्म को 5-6 दिन पहले एक चैनल पर देखने के बाद लगभग सवा साल पुरानी मेरी एक गुत्थी सुलझ गई। 2019 में दोबारा बनी मोदी सरकार के मंत्रिमंडल से राज्यवर्धन सिंह राठौर को बाहर किए जाने की गुत्थी मुझे समझ में नहीं आ रही थी। लेकिन फिल्म देखने के बाद वो गुत्थी इसलिए सुलझ गई क्योंकि देश की ऐतिहासिक विरासत से जुड़े तथ्य तथा उससे जुड़े महानायकों की धज्जियां उड़ाने वाली इस फिल्म को जब हरी झंडी दिखायी गयी थी उस समय देश के सूचना प्रसारण मंत्री की कुर्सी राज्यवर्धन राठौर के पास ही थी। ऐसी गलतियां अक्षम्य होती हैं, विशेषकर देश के प्रधानमंत्री का पसंदीदा खेल जब हॉकी ही रहा हो।

अतिरिक्त: फिल्म ‘गोल्ड’ में मुख्य भूमिका अक्षय कुमार ने निभाई थी। फ़िल्म 15 अगस्त, 2018 को रिलीज़ की गई थी ताकि लोग इसे देशभक्ति वाली फ़िल्म समझें। इस रणनीति का फ़ायदा भी हुआ और ‘गोल्ड’ ने लगभग 160 करोड़ का बिज़नेस किया। जिहादी एजेंडा भी चल गया और फ़िल्म भी सुपरहिट हो गई।

(सतीशचंद्र मिश्रा की फ़ेसबुक टाइमलाइन से साभार)

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