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चीन से ‘डील’ में कांग्रेस ने लुटवा दिया था देश का 60 लाख करोड़ का थोरियम?

प्रतीकात्मक चित्र

कांग्रेस पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच समझौते की ख़बर तो सबको पता चल चुकी है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस समझौते से देश को कितना नुक़सान उठाना पड़ा है? सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले पर हैरानी जता चुका है और पूछ चुका है कि क्या यह संभव है कि देश की कोई राजनीतिक पार्टी दूसरे देश की सत्ताधारी पार्टी के साथ किसी तरह का एमओयू करे? ट्विटर यूज़र रेणुका जैन ने इस मामले में एक प्रमुख परमाणु वैज्ञानिक के हवाले से बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने दावा किया है कि इस समझौते का ही नतीजा था कि थोरियम से परमाणु ऊर्जा पैदा करने के प्रोजेक्ट का खात्मा हो गया। थोरियम टेक्नोलॉजी पर्यावरण के हिसाब से सबसे साफ-सुथरी मानी जाती है। आगे जो बातें हम आपको बताने जा रहे हैं उनसे आप खुद ही समझ जाएंगे कि ये कितना बड़ा घोटाला था। यह भी पढ़ें: किसने कराई देश के परमाणु वैज्ञानिकों की हत्याएं?

थोरियम का सबसे बड़ा भंडार भारत

भारत दुनिया के सबसे बड़े थोरियम उत्पादक देशों में से एक है। तमिलनाडु में समुद्र तटीय इलाक़ों में इसका भंडार पाया जाता है। दुनिया के कुल थोरियम भंडार का लगभग 30 प्रतिशत यहाँ होने का अनुमान है। यूपीए सरकार के समय यहाँ पर बड़ी मात्रा में रेत की अवैध खुदाई हुई। आम तौर पर माना जाता है कि ये रेत माफ़िया का काम होगा, जो निर्माण कार्यों के लिए इसकी सप्लाई करते हैं। 2004 में कांग्रेस के सत्ता में आने से पहले तक थोरियम बेस्ड फ़ास्ट ब्रीडर टेक्नोलॉजी (Thorium based Fast Breeder, FBT) में भारत का स्थान दुनिया में नंबर एक था। एक प्रमुख वैज्ञानिक (जिनकी पहचान जाहिर नहीं की गई है) के अनुसार, मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक अलिखित और अघोषित नीति बन गई कि थोरियम टेक्नोलॉजी के देसी कार्यक्रम में कटौती की जाएगी। जाहिर है इससे न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी के मामले में भारत की विदेशों पर आश्रितता बढ़ गई। यह भी पढ़ें: इसरो के वैज्ञानिक नंबी नारायण की कहानी आपका दिल दहला देगी

देसी थोरियम प्रोजेक्ट से हुई साज़िश

जिन परमाणु वैज्ञानिक के हवाले से ये दावे किए गए हैं वो डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी (DAE) से जुड़े रहे हैं। उनका कहना है कि 2013 तक भारत इस तकनीक में महारत पा लेता और कम से कम 1 गीगावॉट (Gigawatt) का रिएक्टर तैयार किया जा चुका होता। इसी क्षमता का रिएक्टर चीन अब पाकिस्तान को दे रहा है। दूसरी तरफ तमिलनाडु और केरल के समुद्री तटों पर अवैध खनन और तस्करी कई गुना बढ़ गई। यहां की रेत में इलमेनाइट (Ilmenite) नाम का खनिज पाया जाता है, जिससे थोरियम निकाला जाता है। मनमोहन सरकार ने 2007 में इसे प्रतिबंधित सूची से बाहर कर दिया। जिसका नतीजा हुआ कि ये बेशकीमती पत्थर तस्करी करके भारत से बाहर भेजा जाने लगा। इसके अलावा मोनैजाइट (Monazite) भी यहीं पाया जाता है जिसमें थोरियम सबसे बड़ा घटक होता है।

चीन पहुँचा दिया भारत का थोरियम

वैज्ञानिक के दावे के मुताबिक सबसे ज्यादा थोरियम चीन पहुंचाया गया। उनका अनुमान है कि जितना थोरियम चीन के हाथ लग चुका है उससे उसका अगले 24 हजार साल का काम चल जाएगा। चीन आज थोरियम टेक्नोलॉजी का अग्रणी देश बन चुका है और वो थोरियम मोल्टेन साल्ट रिएक्टर (MSR) भी विकसित कर रहा है। दूसरी तरफ भारत में यह प्रोजेक्ट ठप हो चुका है। दावे के अनुसार ये सारा खेल यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी के इशारे पर हुआ। अनुमान के अनुसार जितना थोरियम भारत से बाहर पहुंचाया गया, उसकी कीमत आज के हिसाब से 60 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक होगी। नीचे देखें भारत का थोरियम मैप।

चीन-कांग्रेस के समझौते का नतीजा?

ध्यान देने वाली बात है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और भारत की कांग्रेस पार्टी के बीच 2008 में जब एमओयू हुआ था तब यह लूट शुरू हो चुकी थी। कहा जाता है कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के समझौते में दोनों के बीच उच्चस्तरीय सूचनाओं के आदान-प्रदान और आपसी सहयोग की बात है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या थोरियम की ये लूट उसी डील का नतीजा थी? यह मामला 2014 के लोकसभा चुनाव के समय भी उछला था। हालाँकि इन दावों की सच्चाई की हम स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सकते, लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि मामला सामने आया है तो मौजूदा केंद्र सरकार इस बारे में तथ्य जनता के सामने रखेगी।

(न्यूज़लूज़ ब्यूरो)

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