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झारखंड में नक्सलियों के ख़िलाफ़ आदिवासियों की बग़ावत, ‘सेंदरा’ का एलान

नक्सली सुरेश मरांडी का मकान, जिसे लोगों ने जला दिया।

झारखंड में इन दिनों नक्सली माओवादियों के लिए मुश्किल वक़्त चल रहा है। राज्य के कई इलाक़ों में आदिवासियों ने नक्सलियों पर हमले शुरू कर दिए हैं। ताज़ा घटना गिरिडीह ज़िले की है, जहां पीरटांड़ गांव में गांववालों ने CPI-ML के नक्सली कमांडर सुरेश मरांडी को तीर-कमान से मौत के घाट उतार दिया। लोगों ने उसके घर को बाहर के बंद करके आग भी लगा दी, जिसमें उसके 7 साथी बाल-बाल बचे। परिवार की महिलाओं को भी आदिवासियों ने जमकर मारा-पीटा। दरअसल एक सप्ताह पहले गांव के एक युवक हीरालाल किस्कू की हत्या हो गई थी। पता चला कि हत्या माओवादियों ने कराई है। इसके बाद आदिवासियों की पंचायत हुई, जिसमें तय हुआ कि दोषियों का ‘सेंदरा’ किया जाएगा। दरअसल सेंदरा एक परंपरा है जिसमें किसी दुश्मन का शिकार किया जाता है। आम तौर पर सेंदरा में जंगली जानवरों का शिकार होता है। लेकिन आदिवासियों के लिए नक्सली पिछले कुछ साल में जंगली जानवरों से भी बदतर हो चुके हैं। यह भी पढ़ें: जानिए क्यों भारत के टुकड़े-टुकड़े चाहते हैं शहरी नक्सली

सेंदरा की घटना से नक्सलियों में दहशत

बताया जा रहा है कि 500 से ज़्यादा लोग तीर-धनुष और हथियारों से लैस होकर नक्सली सुरेश मरांडी के घर पहुंचे। ग्रामीणों को देख सुरेश भागने लगा लेकिन ग्रामीणों ने तीर चलाकर उसे मार डाला। और उसके घर में आग लगा दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने घर में बंद लोगों को बड़ी मुश्किल से बाहर निकालकर उनकी जान बचाई। पुलिस को 10 राउंड गोलियां भी चलानी पड़ीं। फ़िलहाल माओवादी सुरेश मरांडी के रिश्तेदार पुलिस के पहरे में हैं। क्योंकि आदिवासियों ने धमकी दी है कि वो उन्हें भी नहीं छोड़ेंगे। आदिवासियों का कहना है कि माओवादी हथियारों के दम पर उन्हें डरा-धमकाकर ज़मीनों पर क़ब्ज़ा कर रहे हैं। आए दिन इस चक्कर में आदिवासियों की हत्याएँ भी नक्सलियों के हाथों होती हैं। लेकिन अब ग्रामीणों ने इसे और बर्दाश्त नहीं करने का एलान किया है। इस घटना से पूरे झारखंड ही नहीं, दिल्ली में रहने वाले शहरी नक्सलियों में भी दहशत है। यह भी पढ़ें: क्या आप भी नक्सली हैं? जानिए इस भूतपूर्व वामपंथी से

नक्सलियों के ख़िलाफ़ भड़की बग़ावत

दरअसल पिछले कुछ समय से आदिवासियों ने नक्सलियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी शुरू की है। ईसाई मिशनरियों की शह पर नक्सली अब तक भोले-भाले गाँव वालों को न सिर्फ़ परेशान करते थे, बल्कि उनको धर्मांतरण के लिए भी मजबूर किया करते थे। लेकिन अब लोगों ने एकजुट होकर इन कोशिशों का जवाब देना शुरू किया है। इसी साल 26 जनवरी को ओड़िशा के मल्कानगिरी में गणतंत्र दिवस का बायकॉट कराने आए 2 माओवादियों को गाँववालों ने पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया था। माओवादियों के हाथ में बंदूक़ थी, लेकिन गाँववाले नहीं डरे और उन्होंने नक्सलियों से मोर्चा लिया। हालाँकि इस घटना के बाद नक्सलियों ने बदला लेने की नीयत से गाँव पर हमला करके कई घरों में आग लगा दी। आदिवासियों की ऐसी बढ़ती हिम्मत से न सिर्फ़ माओवादियों बल्कि दिल्ली में बैठे शहरी नक्सलियों में भी डर का माहौल है। यही कारण है कि हमले की ऐसी घटनाओं को मीडिया में ज़्यादा तूल नहीं दिया जाता। यह भी बढ़ें: क्या आपके इर्द-गिर्द भी कोई शहरी नक्सली रहता है?

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