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ब्राह्मणों के ख़िलाफ़ नस्लवादी नफ़रत के पीछे क्या है असली साज़िश

देश में बात-बात पर ब्राह्मणों को कोसने का फ़ैशन चल पड़ा है। एक पूरी लॉबी है जो हर बात में ब्राह्मणों के लिए घृणा फैलाने में लगी रहती है। ऐसे जताया जाता है मानो ब्राह्मण कोई ऐसी जमात हो जिसने पूरे देश को गुलाम बना रखा हो। लेकिन आप ध्यान से देखें तो इस कथित ‘ब्राह्मण विरोधी अभियान’ में कई ऐसे लोग भी शामिल हैं जो ख़ुद जाति से ब्राह्मण हैं। सवाल यह है कि आखिर ब्राह्मणों ने ऐसा क्या किया है जिसके लिए उन्हें ‘अपराधी’ ठहराया जाता है। जहां तक जाति प्रथा की बात है उसके लिए भी आज की पीढ़ी के ब्राह्मणों को दोषी कैसे ठहराया जा सकता है? वह भी तब जब ब्राह्मणों में अंतरजातीय विवाह तेज़ी से बढ़ रहे हैं। वो भी उन्हीं चुनौतियों को झेलते हुए आगे बढ़ते हैं जो हर किसी के लिए हैं। अगर जातिवाद को कारण मानें तो यह समस्या लगभग सभी जातियों के बीच पाई जाती है। फिर खास तौर पर ब्राह्मणों के खिलाफ इस ‘नस्लीय घृणा’ के पीछे मंशा क्या है? यह भी पढ़ें: हिंदू धर्म के खात्मे के लिए सोनिया गांधी का गेमप्लान

ब्राह्मणों को यहूदी बनाने की कोशिश

यूरोप में यहूदियों के साथ लंबे समय तक अत्याचार का इतिहास रहा है। वो एक तरफ़ हिटलर के निशाने पर रहे, दूसरी तरफ़ इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन्हें अपना शिकार बनाया। एक समय था जब पश्चिमी देशों में ‘यहूदी’ शब्द गाली की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा। ठीक वही काम ब्राह्मणों के साथ हो रहा है। कुछ समय पहले ट्विटर का मालिक जैक डोरसी भारत दौरे पर आया था, यहाँ पर उसने एक तख्ती लेकर फ़ोटो खिंचवाई, जिस पर लिखा था ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को कुचल डालो!’ देखा जाए तो यह एक तरह की हेटस्पीच है। कुछ लोग इसे वामपंथी, जिहादी और मिशनरियों की कारस्तानी मानते हैं। एक हद तक यह बात सही भी है। उनका असली निशाना ब्राह्मण नहीं, बल्कि पूरा हिंदू धर्म है। उनकी थ्योरी के हिसाब से ब्राह्मण हिंदू धर्म का सिर है, जिसे धड़ से अलग किया जाना सबसे ज़रूरी है। सवाल ये है कि यह सब जानते बूझते हुए भी हिंदू चुप क्यों हैं? यह भी पढ़ें: केरल में वापस हिंदू बन रहे हैं दलित ईसाई परिवार

हिंदुओं से नस्लवादी नफ़रत पर चुप्पी

देश की सरकारें तो दूर की बात, हिंदू संगठनों के नेता भी अक्सर ब्राह्मणों को निशाना बनाए जाने पर चुप्पी साध लेते हैं। इसके पीछे बड़ा कारण एक फ़र्ज़ी नैरेटिव है जिसने लोगों के दिलोदिमाग़ में यह झूठ बिठा दिया है कि कभी इस देश में ब्राह्मणों ने लोगों पर बहुत अत्याचार किया। स्कूली किताबों में ‘वेदों के वर्चस्व’ और ‘ब्राह्मणवाद’ का ज़िक्र हमेशा नकारात्मक रूप से हुआ है। जबकि जिन वेदों के हवाले से यह बात कही जाती है उनके अनुसार ब्राह्मण जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि कर्म के आधार पर होता है। फिर भी ईसाई मिशनरियों ने बहुत सोची-समझी साज़िश के तहत ‘ब्राह्मणवाद’ और ‘मनुवाद’ जैसे कुछ शब्द गढ़े। ये दोनों शब्द धड़ल्ले से इस्तेमाल होते हैं और कोई इनका विरोध भी नहीं करता। सवाल उठता है कि ब्राह्मणों के ख़िलाफ़ इतनी संस्थागत घृणा क्यों? जबकि 800 साल तक देश को रौंदने वाले मुसलमानों और 200 साल तक अत्याचार करने वाले ईसाइयों के ख़िलाफ़ कुछ भी बोलना सांप्रदायिक करार दिया जाता है। यह भी पढ़ें: क्या आर्य वाक़ई भारत के मूलनिवासी नहीं हैं?

क्या वास्तव में अत्याचारी थे ब्राह्मण?

भारत में ज़्यादातर समय क्षत्रियों, जाटों, यादवों, मराठों और मध्य जातियों के राजाओं का शासन रहा। कुछ ब्राह्मण भी शासक रहे हैं, लेकिन वो कभी इतने मज़बूत नहीं रहे। ब्राह्मणों का काम हमेशा से वैदिक ज्ञान का संरक्षण करना, शिक्षा देना और धर्म संस्कृति का प्रचार था। प्राचीन इतिहास में ऐसा कोई समय नहीं था जब ब्राह्मणों ने लोगों पर अत्याचार किए हों। हां धर्म के नाम पर आडंबर और कर्मकांड समय-समय पर हावी होते रहे। जिनके कारण समाज के दूसरे घटकों को दिक़्क़त उठानी पड़ी। लेकिन हर बार हिंदू धर्म के अंदर से ही सामाजिक सुधार हुए। यह भी पढ़ें: सटीक… वो बहादुर जिनसे मुग़लों की रुह काँपती थी

अंग्रेजों के काल में घोला जातीय जहर

मुग़लों के समय में सभी हिंदुओं पर समान अत्याचार हुए। उस काल में कई क्षत्रिय जिन्हें युद्ध में गुलाम बना लिया जाता था उन्हें अपमानित करने के लिए सफ़ाई जैसे काम कराए जाते थे। और समय के साथ-साथ उन्हें एक तरह का अछूत बना दिया गया। वरना उस समय तक हिंदू धर्म में अछूत शब्द भी नहीं हुआ करता था। लेकिन अंग्रेजों के समय में हिंदू धर्मग्रंथों का अनुवाद कराया गया। ये काम ज़्यादातर ईसाई मिशनरियों ने करवाया। एक सोची-समझी साज़िश के तहत इन अनुवादों में ऐसी बातें जोड़ दी गईं, जिनका इस्तेमाल अब हिंदू धर्म में जाति के नाम पर बँटवारे के लिए हो रहा है। उदाहरण के लिए मैक्समूलर ने वेदों का जो अनुवाद कराया उसमें यह कह दिया कि शूद्र अगर वेद सुनते हैं तो उनके कान में पिघला शीशा डाल दिया जाना चाहिए, जबकि किसी वेद में ऐसा कहीं नहीं लिखा है। इसी तरह मनुस्मृति को तो पूरी तरह भ्रष्ट कर दिया गया। आज उन्हीं झूठों के आधार पर ब्राह्मणों को नस्लवादी घृणा का शिकार बनाया जा रहा है। यह भी पढ़ें: मुस्लिम वोट बैंक के लिए केजरीवाल ने गुर्जरों को बदनाम किया

(सिद्धार्थ शर्मा)

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