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दिल्ली में क्या वाक़ई दूसरे राज्यों के मरीज़ भीड़ बढ़ा रहे हैं? जानिए सच

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस बात को लेकर हंगामा मचाए हुए हैं कि दिल्ली में दूसरे राज्यों से आने वाले मरीज़ों के कारण परेशानी हो रही है और दिल्ली के निवासियों को इलाज नहीं मिल पा रहा है। क्या यह दावा सही है? दिल्ली के सरकारी और निजी अस्पतालों में इस समय भर्ती मरीजों के दस्तावेजों के हिसाब से देखें तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। दरअसल दो महीने के लॉकडाउन के कारण दिल्ली आकर इलाज कराने वालों की संख्या लगभग नहीं के बराबर हो चुकी है। ट्रेन और बसें बंद होने के कारण लोग नहीं आ पा रहे हैं। यहां तक कि एंबुलेंस से लाए जाने वाले मरीज भी बहुत कम हैं। जो लाए भी जा रहे हैं वो एम्स और सफदरजंग जैसे केंद्र सरकार के अस्पतालों या सेना के अस्पतालों में लाए जा रहे हैं। दिल्ली सरकार के कोरोना डैशबोर्ड के अनुसार लगभग आधे बेड और इतने ही वेंटिलेटर खाली पड़े हैं। सवाल है कि फिर बाहरी राज्यों के मरीजों को लेकर इतना कोहराम क्यों? यह भी पढ़ें: क्या कोरोना का नाटक कर रहे हैं केजरीवाल, जानिए शक के 5 बड़े कारण

भर्ती मरीज़ों में बाहरी राज्यों के लोग नहीं

दिल्ली में कोविड-19 मरीज़ों के इलाज के लिए सबसे बड़े लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल (LNJP) ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वो किसी भी मरीज को उसके निवास प्रमाणपत्र के आधार पर भर्ती से मना नहीं कर रहा है। अस्पताल ने कहा है कि “हमारे यहां भर्ती लगभग सभी मरीज दिल्ली के ही रहने वाले हैं। हमने किसी के डॉक्यूमेंट तो चेक नहीं किए, लेकिन जो दस्तावेज जमा किए जा रहे हैं वो सभी दिल्ली के लोगों के ही हैं।” 8 जून को यहां 148 मरीजों को एडमिशन दिया गया। द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक सुरक्षा और एंबुलेंस स्टाफ ने भी पुष्टि की है कि दूसरे राज्यों से मरीज नहीं आ रहे। हालांकि पास के ही जीबी पंत हॉस्पिटल के डॉक्टर ने बताया कि अगर कभी-कभार कोई बाहरी राज्य के मरीज का केस आ रहा है तो उसे हम केंद्र सरकारों के अस्पतालों में रेफर कर देते हैं। ध्यान देने वाली बात है कि ऐसे मरीज भी बाहर से आने वाले नहीं, बल्कि दिल्ली में रह रहे ऐसे लोग हैं जिनके पास दिल्ली का कोई निवासी प्रमाणपत्र नहीं है। यह भी पढ़ें: पिता के लिए मदद मांगती रही बेटी, हेयरकट के मजे लेते रहे केजरीवाल

केंद्रीय अस्पतालों में भी बाहरी बहुत कम

एम्स, सफ़दरजंग, राममनोहर लोहिया जैसे अस्पतालों में भी ज़्यादा संख्या उन्हीं मरीज़ों की है जो दिल्ली के ही रहने वाले हैं। हालाँकि इसका सही-सही आँकड़ा हमें नहीं मिल सका। राम मनोहर लोहिया अस्पताल के एक मेडिकल स्टाफ़ ने हमें बताया कि हमारे पास भर्ती ज़्यादातर मरीज़ वो हैं जिनका पहले से कोई इलाज चल रहा था। बाहर से आने वाले भी कुछ लोग हैं लेकिन उनमें बड़ी संख्या केंद्रीय कर्मचारियों की है। अगर दिल्ली के प्राइवेट अस्पतालों की बात करें तो वहाँ भी स्थिति कमोबेश यही है। क्योंकि दो महीने से बाहरी राज्यों से लोग नहीं आ पाए। लोगों के न आने का एक बड़ा कारण दिल्ली में ठहरने के लिए होटल वग़ैरह का इंतज़ाम न होना भी है।

यूपी, हरियाणा में दिल्ली के मरीज़ बढ़े

केजरीवाल सरकार के दावे के उलट दिल्ली से सटे नोएडा, ग़ाज़ियाबाद, गुड़गाँव और फ़रीदाबाद के अस्पतालों में दिल्ली के मरीज़ों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है। नोएडा में एक न्यूज़ चैनल में कई कर्मचारी कोरोना संक्रमित पाए गए थे। उनमें से कई दिल्ली के रहने वाले थे और उनके ज़रिए ही संक्रमण यहाँ पहुँचा था। ऐसे ज़्यादातर मरीज़ों का इलाज नोएडा में ही हुआ, क्योंकि दिल्ली के अस्पतालों में उन्हें बेड नहीं मिल पाया। नोएडा के निजी अस्पतालों में भी दिल्ली के मरीज़ बड़ी संख्या में भर्ती हैं।

पहले लॉकडाउन और फिर दिल्ली की सीमाएँ सील होने के कारण बाहरी राज्यों से मरीज़ों का आना लगभग न के बराबर है।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आख़िर केजरीवाल बाहरी राज्यों के मरीज़ों को लेकर इतना हंगामा क्यों खड़ा कर रहे हैं? दरअसल दिल्ली में बेड की उपलब्धता के जो आँकड़े दिखाए जा रहे हैं वो फ़र्ज़ी हैं। अब जब इस बात की पोल खुल रही है तो केजरीवाल सरकार ने दूसरे राज्यों के मरीज़ों पर ठीकरा फोड़ने की कोशिश शुरू कर दी।

(न्यूज़लूज़ टीम)

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