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जेएनयू छाप वामपंथियों… चीन का तियानमेन चौक नरसंहार भूल न जाना!

तियानमेन चौक की तरफ़ बढ़ते चीन सेना के टैंक को एक अकेले प्रदर्शनकारी ने रोकने की कोशिश की थी। ये तस्वीर उस हत्याकांड की सबसे यादगार मानी जाती है।

बहुत लोगों को आज भी याद होगा जब 1989 में 4 जून को चीन की राजधानी में हज़ारों छात्र-छात्राओं को गोलियों और टैंकों से मौत के घाट उतार दिया गया था। ये नौजवान चीन में लोकतंत्र स्थापित करने की माँग कर रहे थे। इस प्रदर्शन की तत्कालीन वजह बनी थी कम्युनिस्ट पार्टी के उदारवादी माने जाने वाले नेता हू याओबैंग की मौत। माना जाता है कि उनका वामपंथी तानाशाही से मोहभंग हो गया था। जैसे ही उन्होंने लोकतंत्र का समर्थन शुरू किया चीन के वामपंथी शासकों की आंखों में वो खटकने लगे। अप्रैल 1989 में पोलित ब्यूरो की बैठक में ही उन्हें हार्ट अटैक आया, जिसके बाद उनकी मौत हो गई। कई लोग मानते हैं कि मौत का कारण हार्ट अटैक नहीं बल्कि कुछ और ही था। इस घटना से भड़के हज़ारों लोकतंत्र समर्थकों ने बीजिंग के तियानमेन चौक पर डेरा डाल लिया और माँग करने लगे कि देश में लोकतांत्रिक तरीक़े से सरकार चुनी जाए। करीब 7 सप्ताह तक यह प्रदर्शन चलता रहा। 3 और 4 जून की रात को चीनी सेना ने प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग की और उन पर टैंक चढ़ा दिए।

10 हज़ार नौजवानों का नरसंहार

हाल के इतिहास में ये दुनिया का सबसे बड़ा नरसंहार माना जाता है, जब किसी देश ने अपने ही नागरिकों को इस तरह से घेरकर मारा हो। चीन की सरकार कहती है कि फ़ौजी कार्रवाई में 200 से 300 लोग मारे गए। उस वक़्त वहाँ मौजूद कई अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों ने कम से कम 3000 लोगों के मरने की जानकारी दी थी। लेकिन बाद में सामने आए इंटेलिजेंस इन्पुट्स के अनुसार मरने वालों की सही संख्या 10 हज़ार से भी अधिक थी। उस वक़्त ब्रिटिश राजदूत एलन डोनाल्ड ने लंदन भेजे टेलीग्राम में कहा था कि कम से कम 10,000 आम नागरिक मारे गए हैं। उस दौर के अमेरिकी दूतावास के दस्तावेज भी इसी आँकड़े की पुष्टि करते हैं। कहा जाता है कि लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे छात्रों के परिवारों को भी चीन की सेना ने नहीं छोड़ा था और बाद में चुन-चुनकर उनकी भी हत्या कर दी गई थी।

चीन सेना की कार्रवाई से एक दिन पहले तियामेन चौक की तस्वीर।

लोकतंत्र के लिए वो अधूरी क्रांति

प्रदर्शनकारी छात्रों ने 30 मई को तियानमेन चौक पर लोकतंत्र की एक प्रतीकात्मक मूर्ति की स्थापना की। धीरे-धीरे क्रांति की लपटें पूरे चीन में फैलने लगीं। यह देखकर कम्युनिस्ट शासक घबरा गए और उन्होंने 2 जून की रात को मार्शल लॉ लागू कर दिया। 3 जून की रात से ही छात्रों को चौक से हटने के लिए धमकियाँ दी जाने लगीं। लेकिन जब असर नहीं हुआ तो 4 जून की रात को सेना को आदेश दिया गया कि चौक को पूरी तरह खाली करा‌ लिया जाए। प्रदर्शकारियों ने चौक छोड़ने को मना कर दिया। जब प्रदर्शकारी चौक से नहीं हटे, तब सेना ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। छात्रों की बड़ी संख्या देखते हुए रात में ही टैंक मंगाए गए और उन्हें छात्रों की भीड़ पर चढ़ा दिया गया।

चीन आज भी छिपाता है सबूत

इस घटना के दौरान तियानमेन चौक की ओर बढ़ रहे पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के टैंकों को रोकते हुए एक शख्स की तस्वीर 4 जून 1989 को एक फोटोग्राफर ने खींच ली थी। इस तस्वीर को गॉडेस ऑफ डेमोक्रेसी (लोकतंत्र की देवी) भी कहा जाता है। इस तस्वीर को ‘टैंकमैन’ नाम से भी जाना जाता है। उसका क्या हुआ यह भी आज तक एक रहस्य है। माना जाता है कि चीन की सेना ने उसे भी बाद में टैंक से रौंद दिया था। नरसंहार के तीन दशक से भी अधिक समय बाद भी चीन की कम्युनिस्ट सरकार इस विषय पर किसी भी तरह के बहस या चर्चा की मंज़ूरी नहीं देती। पाठ्यपुस्तकों और मीडिया में भी इस बारे में बात करने पर रोक है। इतना ही नहीं चीन इस बारे में इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री को भी डिलीट कराने का आरोपी है।

दुनिया के सबसे नृशंस हत्याकांडों में से एक इस घटना पर भारत के वामपंथी कभी कुछ नहीं बोलते। जब यह घटना हुई थी तब कई ने दबी ज़ुबान में इसका समर्थन भी किया था। कुछ ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि ये चीन का अंदरूनी मामला है।  भारत में जेएनयू, केरल या ऐसी इक्का-दुक्का जगहें जहां वामपंथी विचारधारा बची हुई है उन्हें यह तस्वीर हर दम याद दिलाने की ज़रूरत है ताकि उन्हें पता रहे कि जनता को उनका असली चेहरा अभी भूला नहीं है।

(न्यूज़लूज़ टीम)

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