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इंडोनेशिया में जो ‘रामलीला’ से हुआ, भारत में वही ‘रामकथा’ में हो रहा है!

दायीं तरफ़ इंडोनेशिया की रामलीला का एक दृश्य। बायीं तरफ़ विवादित कथावाचक मोरारी बापू को तो आप पहचानते ही हैं।

मोरारी बापू और कुछ कथावाचक पिछले कुछ दिनों से विवादों में हैं, क्योंकि वो अपनी कथाओं में इस्लाम का महिमामंडन कर रहे थे। जब विरोध हुआ तो कुछ ने माफ़ी माँग ली और कुछ ने कहना शुरू कर दिया कि ईश्वर और अल्लाह में कोई अंतर नहीं है और उनकी नीयत में कोई खोट नहीं। लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं उनके मुताबिक पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही है। इस पूरे मामले में अरब के पैसे या ‘गल्फ मनी’ की बात शुरू से ही आ रही है। सवाल उठता है कि आखिर अरब की संस्थाओं को ऐसे कथावाचकों में क्या दिलचस्पी हो सकती है? दरअसल मोरारी बापू और उनके जैसे कथावाचक इस्लाम के प्रचार के ‘इंडोनेशिया मॉडल’ का हिस्सा हैं। ‘इंडोनेशिया मॉडल’ यानी वो तरीका जिससे इंडोनेशिया को इस्लामी देश में बदला गया था। यह एक तरह की धार्मिक घुसपैठ है जिससे चुपचाप इस्लाम का प्रचार किया जाता है। ‘इंडोनेशिया मॉडल’ के पीछे सऊदी अरब की कुछ वहाबी संस्थाओं का हाथ है।यह भी पढ़ें: राम, लक्ष्मण, हनुमान के अस्त्र-शस्त्र भी उतरवा चुके हैं मोरारी बापू

इंडोनेशिया के बाद अब इंडिया का नंबर?

इंडोनेशिया में 15वीं शताब्दी में अरब और भारत से इस्लाम के कदम पड़े थे। शुरू में जावा, सुमात्रा और बाली द्वीपों पर इनका आना हुआ था। 16वीं शताब्दी तक इंडोनेशिया में ज़्यादातर आबादी हिंदुओं की थी। राजा भी हिंदू थे। लेकिन बाद के मात्र 100 साल में इंडोनेशिया की आबादी का रूप बिल्कुल बदल गया। इस काल में बड़ी संख्या में लोगों ने हिंदू देवी-देवताओं की पूजा को जारी रखते हुए इस्लाम को अपना लिया। आज रामकथा के नाम पर जो काम भारत में हो रहा है, वही इंडोनेशिया में रामलीला के नाम पर हुआ था। अरबी कारोबारियों के पास पैसा बहुत था। उन्होंने रामलीला के ज़रिए इस्लाम का प्रचार शुरू किया। रामलीला के मंचन के दौरान राम की कथा के बीच इस्लाम की महिमा के बारे में बताया जाता था। रामलीलाएँ तो होती रहीं, लेकिन हिंदू धर्म का देखते ही देखते सफ़ाया हो गया। आज भी इंडोनेशिया में ऐसे रामलीला मंडल हैं, जिनको सऊदी अरब की वहाबी संस्थाओं से फंड मिलता है। बहुत प्लानिंग के साथ यह मॉडल अब भारत पर लागू किया गया है, जिसके मोहरे अली मौला गाने वाले कथावाचक बने। हालांकि हम आपको बता दें कि इंडोनेशिया में कई रामलीला मंडल ऐसे भी हैं, जो अभी तक इस्लामी संक्रमण से खुद को दूर रखने में सफल रहे हैं। यह भी पढ़ें: बापू से मोरारी बापू तक, हिंदू धर्म के इस्लामीकरण की कोशिश जारी है

वहाबी इस्लाम की राह पर इंडोनेशिया

सरकारी तौर पर इंडोनेशिया ‘बहुधार्मिक देश’ है। यहाँ कुल छह धर्मों के मानने वाले बड़ी संख्या में रहते हैं। ये धर्म हैं- इस्लाम (87%), कैथोलिक ईसाई (7%), प्रोटेस्टेंट ईसाई (2%), हिंदू (1.7%), बौद्ध (0.7%) और कन्फ़्यूशियस (0.05%)। आपको यह देखकर हैरानी हो रही होगी कि बहुसंख्यक होने के बावजूद मुसलमानों ने दूसरे धर्मों के लोगों को जीने कैसे दिया? क्योंकि कहीं भी उनकी आबादी जैसे ही 30 प्रतिशत के ऊपर होती है वो दूसरे धर्मों के लोगों का जीना हराम कर देते हैं। लेकिन इंडोनेशिया इसका अपवाद रहा। क्योंकि यहाँ के लोगों ने इस्लाम भले ही स्वीकार कर लिया था लेकिन हिंदू देवी-देवताओं और त्यौहारों के लिए आस्था ख़त्म नहीं हुई। लेकिन अब यह स्थिति तेज़ी से बदल रही है। जो मुसलमान आज भी हिंदू आस्था से जुड़े हुए हैं अब उन्हें वहाबी इस्लाम और कट्टरपंथ की तरफ़ मोड़ा जा रहा है। आज यहाँ सिर्फ़ बाली में हिंदू आबादी कुछ ठीकठाक संख्या में बची है।

इंडोनेशिया मॉडल की ज़रूरत क्यों पड़ी?

भारत पर इस्लाम की गिद्धदृष्टि बहुत पहले से है। शुरू में तलवारों के दम पर या धोखे से धर्मांतरण कराए गए। बाद में इसके लिए सूफ़ियों का सहारा लिया गया। इसके बावजूद आज भी भारत में 80 फ़ीसदी के क़रीब जनसंख्या हिंदुओं की है। अब तलवार और सूफ़ी का तरीक़ा बहुत कारगर नहीं रहा है। उनके ज़रिए धर्मांतरण अगर हो भी रहा है तो बहुत धीरे-धीरे। लिहाज़ा हिंदुओं के धार्मिक कार्यों में घुसपैठ का तरीक़ा अपनाया गया। बीएचयू के धर्म विद्या विभाग में मुस्लिम प्रोफ़ेसर फ़िरोज़ खान की नियुक्ति को भी कई लोग इसी प्रोजेक्ट का हिस्सा मानते हैं। क्योंकि तब भी यह बात आई थी कि प्रोफ़ेसर की नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालय के अधिकारियों को मोटी रिश्वत दी गई थी। यह भी पढ़ें: भागवत कथा के नाम पर अली मौला क्यों जप रहे हैं कथावाचक

(न्यूज़लूज़ टीम)

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