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तिब्बत को स्वतंत्र देश की मान्यता देगा अमेरिका!, चीन को घेरने की तैयारी

कैलाश मानसरोवर के देश तिब्बत की स्वतंत्रता की बातें फिर से होने लगी हैं। अमेरिकी कांग्रेस में एक बिल पेश किया गया है जिसमें तिब्बत को एक अलग देश के तौर पर मान्यता देने की बात कही गई है। अगर यह बिल पास हुआ तो अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार मिल जाएगा कि वो चाहे तो तिब्बत को आज़ाद देश के तौर पर मान्यता प्रदान कर दें। इस बिल को पेश करने वाले स्कॉट पैरी (Scott Perry) डोनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के ही सांसद हैं। पैरी अमेरिकी सेना के अधिकारी रह चुके हैं। उन्होंने ही हॉन्गकॉन्ग की आजादी का बिल भी पेश किया था। फिलहाल ये दोनों बिल अमेरिकी कांग्रेस की विदेश मामलों की समिति के पास विचाराधीन हैं। यह भी पढ़ें: भारत-नेपाल सीमा विवाद और कोरोना वाले चीन की कुटिल चाल

चीन पर बढ़ाया गया दबाव

कूटनीतिक जानकार इस कदम को चीन को सबक़ सिखाने की लंबी अवधि की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं। अमेरिका यह चाहता है कि उन देशों की मदद होनी चाहिए जिन पर चीन के अवैध क़ब्ज़े का इतिहास रहा है। फ़िलहाल यह बिल अमेरिकी कांग्रेस और सीनेट से पास कराना होगा। जिसके बाद यह राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए जाएगा। हालाँकि ऐसे किसी बिल से चीन मान जाएगा यह उम्मीद करना बेकार है। लेकिन इतना तय है कि पहले से ताइवान और हॉन्गकॉन्ग के मसले पर बुरी तरह घिरा चीन तिब्बत मामले पर भी मुश्किलों में आ जाएगा। इससे पूरी दुनिया का ध्यान इस तरफ़ जाएगा कि चीन ने इस विशाल देश को हड़प रखा है। तिब्बत की निर्वासित सरकार हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में है। यह भी पढ़ें: नेहरू की गलती से आज चीन में है कैलाश मानसरोवर

पंचेन लामा को छोड़ने की माँग

तिब्बत को अलग देश की मान्यता देने के साथ अमेरिका ने चीन से कहा है कि वह बौद्ध धर्म गुरु 11वें पंचेन लामा को तुरंत रिहा करे। पंचेन लामा दरअसल मौजूदा दलाई लामा के प्रतिनिधि हैं। 1995 में जब वो छह साल के थे, तभी चीन सरकार ने उन्हें कैद कर लिया था। उनके बदले में चीन ने अपनी तरफ़ से दलाई लामा का उत्तराधिकारी तय कर दिया। पिछले 25 साल से पंचेन लामा का कोई अता-पता नहीं है। यह आशंका जताई जाती है कि चीन ने संभवत: उनकी हत्या करवा दी है। पश्चिमी देशों के मानवाधिकार संगठन समय-समय पर पंचेन लामा का मुद्दा उठाते रहे हैं, लेकिन चीन की बढ़ती ताक़त के चलते ये आवाज़ें हमेशा दबा दी जाती रहीं। अमेरिका के अलावा ऑस्ट्रेलिया के संसदीय ग्रुप ने भी चीन से पंचेन लामा के बारे में जानकारी देने को कहा है।

1950 में चीन ने किया क़ब्ज़ा

तिब्‍बत को लेकर चीन हमेशा से ही काफी चौकस रहता है। कारण यह है कि उसने तिब्‍बत को धोखे से क़ब्ज़ाया था। क्षेत्रफल के हिसाब से देखें तो तिब्‍बत और चीन का इलाक़ा लगभग बराबर है। 1950 में चीन और तिब्बत के बीच तनाव शुरू हुआ था। मौका देखकर चीन ने तिब्बत पर हमला कर दिया। दलाई लामा उस वक्त सिर्फ 15 साल के थे, इसलिए वह कोई भी निर्णय नहीं ले पाते थे। तिब्बत की सेना में मात्र 8,000 सैनिक थे और वो चीन की ताक़त का मुक़ाबला करने में सक्षम नहीं थे। तिब्बत पर हमले के बाद चीन की सेना वहां की जनता पर बहुत ही अत्याचार किए। 1959 तक तिब्बत और वहां के लोगों की स्थिति बिगड़ती चली गई। यहां तक कि अब दलाई लामा के जीवन पर भी खतरा मंडराने लगा था। 17 मार्च, 1959 की रात दलाई लामा तिब्बत से निकल गए और अपने कुछ समर्थकों के साथ पैदल चलकर भारत की सीमा में दाखिल हो गए। भारत सरकार ने उन्हें शरण दी। इस समय दलाई लामा की उम्र 24 साल थी।

(न्यूज़लूज़ टीम)

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