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कोरोना के नाम पर भारत को घटिया माल बेचने के चक्कर में ‘चीन के सेल्समैन’

ये पीपीई किट IIT गुवाहाटी के छात्रों ने तैयार किया है। एक स्थानीय कंपनी की मदद से इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन जारी है। ये बेहद हल्का और आरामदेह है।

कोरोना वायरस के संकट के बीच मीडिया का एक वर्ग चीन के लिए सेल्समैन की तरह काम करता दिख रहा है। महामारी शुरू होने के बाद से पिछले दो महीने के घटनाक्रम पर नज़र डालें तो यह साफ़ हो जाएगा कि पहले टेस्टिंग किट, फिर वेंटिलेटर और अब पर्सनल प्रोटेक्टिव एक्विपमेंट (PPE) को लेकर जिस तरह की झूठी खबरें उड़ाई जा रही है उसके पीछे कोई गहरी साजिश है। दुनिया भऱ का मीडिया यह शक जता रहा है कि चीन ने जिस तरह से पहले से भारी मात्रा में वेंटिलेटर, दूसरे मेडिकल उपकरण, पीपीई और टेस्टिंग किट तैयार करके रखे थे उसका मतलब है कि वो जानता था कि महामारी फैलने वाली है। चीन के लिए ये डबल मुनाफा कमाने का मौका है, क्योंकि कोई दूसरा देश इस संकट के लिए तैयार नहीं था। लेकिन भारत के मामले में चीन की रणनीति बुरी तरह से नाकाम हुई है।

1. टेस्टिंग किट के नाम पर कोहराम

आपको याद होगा कि जब कोरोना वायरस शुरू हुआ था तब कई अख़बारों और चैनलों ने शोर मचाना शुरू कर दिया था कि देश में टेस्टिंग किट की भारी कमी है। एनडीटीवी चैनल ने एक फर्जी ख़बर तक दिखा दी कि दो महीने के अंदर 25 करोड़ लोग बीमार पड़ने वाले हैं। ताकि सरकार पर दबाव बने और वो विदेश से टेस्टिंग किट ख़रीदे। टेस्टिंग किट बस एक ही देश बेच रहा था और वो था चीन। ज़रूरत के हिसाब से रैपिड टेस्टिंग किट का थोड़ा बहुत आयात चीन से करना पड़ा, लेकिन उसमें भी ज़्यादातर ख़राब निकले। अभी देश में रोज़ क़रीब 1 लाख टेस्ट हो रहे हैं और ज़्यादातर टेस्टिंग किट भारतीय कंपनियाँ बना रही हैं। चीन का माल नहीं बिक पाया। जिन यूरोपीय देशों ने चीन के टेस्टिंग किट ख़रीदे उनमें भी कई ने माल लौटा दिया।

2. वेंटिलेटर को लेकर शोर मचाया

पिछले कुछ समय से वेंटिलेटर को लेकर शोर मचाया जा रहा है। शुरू में तो ऐसा लगा मानो इसके बिना आफ़त आ जाएगी। बताया गया कि देश में सिर्फ़ 45 हज़ार वेंटिलेटर है और मई तक 10 लाख और की ज़रूरत होगी। इतने वेंटिलेटर सिर्फ़ चीन ने पहले से बनाकर रखे हैं। बल्क डील में एक औसत वेंटिलेटर 5 से 6 लाख तक का आता है। चीन ने मौक़ा देखकर दाम लगभग डबल यानी 10 लाख रुपये कर दिया। इधर, जो भारतीय कंपनियाँ कल तक मशीनरी टूल्स बनाती थीं उन्होंने वेंटिलेटर बनाना शुरू कर दिया। राजकोट की कंपनी ज्योति सीएनसी ने 1 लाख रुपये का बेसिक वेंटिलेटर बनाकर लॉन्च भी कर दिया। पहले 100 सरकार को फ़्री में दिए। कहा कि कुछ पार्ट्स जापान से आने हैं उसके बाद इसे अपग्रेड कर देंगे। इसके अलावा मारुति, ह्यूंडई और महिंद्रा जैसी कार कंपनियाँ भी वेंटिलेटर बनाने लगीं। अब ‘अहमदाबाद मिरर’ अख़बार ने ख़बर छापी कि राजकोट की कंपनी का वेंटिलेटर नक़ली है। इसी बहाने ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की खिल्ली उड़ाई गई। जबकि वो फ़ौरन ज़रूरत के लिए बेसिक मॉडल था, जिसे कंपनी अपग्रेड कर रही है। भारतीय मीडिया जिस वेंटिलेटर को नक़ली बता रही है उसे स्पेन और कुछ यूरोपीय देशों से ऑर्डर मिलने शुरू हो चुके हैं। अभी की ज़रूरत के हिसाब से वेंटिलेटर की थोड़ी कमी पैदा हुई तो अमेरिका ने 200 मुफ़्त में दे दिए। अब भारतीय मीडिया में चीन के सेल्समैनों ने शोर मचाया कि अमेरिका फ़्री में नहीं दे रहा 20 करोड़ रुपये ले रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि ब्रिटेन और जिन यूरोपीय देशों ने चीन से वेंटिलेटर ख़रीदे हैं वो भी अब उसे वापस करना चाहते हैं क्योंकि ज़्यादातर ख़राब निकलेयह भी पढ़ें: किसके इशारे पर हो रहा है देसी वेंटिलेटर धमन के खिलाफ दुष्प्रचार

3. पीपीई को लेकर अब तमाशा शुरू

मात्र दो महीने में भारत पीपीई किट का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है। तो अब पीपीई किट की क्वालिटी को लेकर मीडिया का दुष्प्रचार शुरू हो गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने छापा है कि पीपीई किट चावल की बोरी जैसे हैं। जबकि ये वो किट हैं जो शुरू में बने थे। भारत में अब पीपीई किट उसी स्टैंडर्ड से बन रहे हैं जिससे दुनिया के दूसरे देशों में बनते हैं। इस मामले में भी चीन को बहुत नुक़सान हुआ है। यहाँ यह बताना भी ज़रूरी है कि चीन के पीपीई किट की क्वालिटी बेहद घटिया है और कई यूरोपीय देशों में इसके ऑर्डर कैंसिल तक कर दिए।

ये तीनों मामले बताते हैं कि भारतीय मीडिया में चीन के सेल्समैन कोशिश तो बहुत कर रहे हैं लेकिन कुछ ख़ास कर नहीं पा रहे।

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