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आसमान में मत ताको मौलवी साहब, हिंदू पंचांग से जानो चाँद कब दिखेगा

दुनिया भर में हर साल ईद के मौक़े पर चाँद के लिए सस्पेंस बनाया जाता है। मस्जिदों के मौलवी आसमान पर नज़र टिकाए रखते हैं कि चाँद कब दिखेगा। चाँद दिखने के बाद ही ईद की तारीख़ तय होती है। जैसे कि इस साल पहले यह कहा गया कि 23 मई को ईद मनाई जाएगी। शनिवार शाम को देशभर के मौलवी आसमान में ताकते रहे लेकिन चाँद नज़र नहीं आया। चाँद नहीं दिखा इसलिए अगले पूरे दिन यानी 24 मई को भी ईद नहीं मनाई जा सकती क्योंकि दिन में चाँद नहीं दिखेगा। अब यह उम्मीद है कि 24 मई दिन रविवार की शाम को चाँद दिख गया तो 25 मई को ईद मनाई जाएगी। आज के आधुनिक ज़माने में यह बात न सिर्फ़ अवैज्ञानिक है बल्कि हास्यास्पद है। यह स्थिति तब है जब भारत में ही रहने वाले हिंदू प्राचीन काल से ही चांद के दिखने-छिपने की बिल्कुल सटीक जानकारी अपने पंचांगों से रखते हैं।

चाँद के नाम पर ये कैसा चक्कर?

इस्लाम का जन्म अरब देशों में हुआ था। उस दौर में वहाँ ज्ञान और विज्ञान विकसित नहीं हुआ था। इस्लाम पनप तो गया, लेकिन उसके साथ वैज्ञानिक सोच नहीं आई। आक्रमणकारियों की शक्ल में इस्लाम भारत आया, लेकिन उसने यहाँ के प्राचीन ज्योतिष और पंचांग विज्ञान से कुछ नहीं सीखा। अरब देशों में चाँद का निकलना एक तरह का संयोग हुआ करता था। हालाँकि उनका हिजरी कैलेंडर चाँद पर ही आधारित है, लेकिन वहाँ के लोग कभी इसके विज्ञान को पूरी तरह नहीं समझ पाए। क्योंकि सूर्योदय चंद्रोदय जिन वैज्ञानिक गणनाओं से पता लगाए जाते हैं उनके मूल में है पृथ्वी का गोलाकार होना। जबकि इस्लाम में पृथ्वी को चपटा माना गया है। यही कारण है कि ईद का चाँद भी रहस्य की तरह आता है। इस्लाम छठी शताब्दी में पैदा हुआ था। इसके सदियों पहले से हिंदू चाँद ही नहीं दूसरे ग्रहों और तारों के उदय और अस्त होने की पूरी जानकारी रखते थे। यहाँ तक कि पश्चिमी देशों को भी बहुत बाद में यह विज्ञान पता चला।

हज़ारों साल पुराना है पंचांग विज्ञान

भारतीय पंचांग के अनुसार हर एक महीने अमावस्या के बाद आने वाले पहले दिन को चंद्र दर्शन कहा जाता है। इसके दिन और समय की गणना जब चाहे तब की जा सकती है। उदाहरण के लिए 500 साल बाद किसी दिन चाँद कब दिखेगा यह भी आज ही बताया जा सकता है। भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदू पंचांग का प्राचीन काल से प्रयोग होता आ रहा है। आज भी भारत और नेपाल के अलावा कंबोडिया, लाओस, थाइलैंड, बर्मा, श्रीलंका जैसे देशों में यह तरीक़ा प्रचलित है। न सिर्फ़ हिंदू बल्कि सनातन धर्म की दूसरी शाखाओं जैसे बौद्ध, सिख और जैन भी अपने त्यौहार पंचांग गणना के आधार पर ही मनाते हैं।

शनिवार देर शाम जब देशभर के मस्जिदों में मौलवी शाम से दूरबीन लगाकर आसमान पर नज़र टिकाए बैठे थे, उससे पहले ही ज्योतिष के कई जानकारों ने ट्वीट करके बता दिया था कि आज चाँद नहीं दिखने वाला।

ईद पर चाँद की खोज का यह तरीक़ा इसलिए भी हास्यास्पद है क्योंकि इस काम के लिए बाक़ायदा कमेटियाँ बनाई जाती हैं, जिनमें तथाकथित मुस्लिम धर्मगुरु और विद्वानों को रखा जाता है। शियाओं की कमेटी अलग होती है और सुन्नियों की अलग। वो छतों पर दूरबीन लेकर निकलते हैं कि चाँद दिख जाए। चाँद दिख गया तो ठीक वरना ऐन मौक़े पर ईद की तारीख़ बदल जाती है। अरब के मुसलमानों के लिए तो यह तरीक़ा फिर भी ठीक है, लेकिन भारत के मुसलमान तो कुछ साल पहले तक हिंदू ही हुआ करते थे। आख़िर उन्हें अपने पूर्वजों के ज्ञान के इस्तेमाल को लेकर इतनी शर्म क्यों है? यह भी पढ़ें: मैंने इस्लाम क्यों छोड़ा? पढ़ें एक पूर्व-मुस्लिम का पत्र

 

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