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POK का एक गाँव जहां लोग सोकर उठे तो हिंदुस्तानी बन चुके थे!

तुरतुक गाँव बेहद खूबसूरत है। ये श्योक नदी के दोनों तरफ़ बसा हुआ है और बीच में बना काठ का ये पुल गाँव की पहचान है।

पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले जम्मू कश्मीर के इलाक़ों को वापस लेने की चर्चाएँ इन दिनों तेज़ हैं। लगातार ऐसी ख़बरें आ रही हैं जो इशारा करती हैं कि भारत पीओके (POK), गिलगित और बल्टिस्तान के अपने इलाक़ों को दोबारा हासिल करने के लिए कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर कोशिशों में जुटा हुआ है। ऐसे में हम आपको एक गाँव की कहानी बताते हैं जो 1971 तक पाकिस्तान में रहा था। इस गाँव का नाम है तुरतुक। यह बल्टिस्तान के उन चार गाँवों में से एक है जो भारत के पास है। तुरतुक के अलावा बाकी तीनों गाँव उसी से सटे हुए हैं। इनके नाम हैं त्याक्सी, चालुनखा और धोथांग। यहाँ के लोग बल्टी भाषा बोलते हैं। तुरतुक फ़िलहाल लद्दाख का हिस्सा है। नूब्रा वैली से आगे यह गाँव बिल्कुल नियंत्रण रेखा से सटा हुआ है। तुरतुक को उत्तर में देश का पहला गाँव भी कहते हैं। इस गाँव की कहानी बेहद दिलचस्प है, जिसे आगे हम आपको सिलसिलेवार ढंग से बता रहे हैं।

1971 में भारत का हिस्सा बना

बँटवारे के समय ही पाकिस्तानी सेना ने इस इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया था। 1971 की लड़ाई के समय भारतीय सेना ने यहाँ से पाकिस्तानी सेना को खदेड़ दिया और रणनीतिक तौर पर इस बेहद महत्वपूर्ण गाँव पर कब्जा कर लिया। इसका श्रेय तब यहाँ तैनात ब्रिगेडियर उदय सिंह बंटी और उनके सेकेंड इन कमांड मेजर चेवांग रिनचेन को जाता है। सियाचिन ग्लेशियर इस गाँव से बेहद क़रीब है। इसी क़ब्ज़े के कारण 1986 में भारतीय सेना के लिए सियाचिन पर क़ब्ज़ा पाना संभव हो पाया। ये गाँव जिस जगह पर है उसके बायीं तरफ़ पाकिस्तान और दायीं तरफ़ चीन है। गाँव के बुजुर्ग बताते हैं कि एक सुबह जब वो सोकर उठे तो उन्होंने अपने चारों तरफ़ तिरंगे झंडे लगे भारतीय सेना की गाड़ियों को देखा। तुरतुक के एक राजा भी हैं, जिनका नाम मोहम्मद खान यब्गो है। सेना के एक अधिकारी ने गाँव में आकर राजा को यह सूचना दी कि “आज से आप हिंदुस्तानी हैं। हम अब यहाँ रहने आए हैं। हमारी आपसे कोई दुश्मनी नहीं है। अगर गाँव के लोग शांति से रहेंगे तो हम आपको तंग नहीं करेंगे।” इसके बाद भारतीय सेना ने गाँव के आगे अपनी चौकियाँ बना लीं।

सेना रखती है गाँववालों का ख़्याल

भारतीय सेना ने गाँववालों से किया अपना वादा निभाया और उनके अंदरूनी मामलों में कभी कोई दख़लंदाज़ी नहीं दी। जिस समय भारतीय सेना वहाँ पहुँची थी तब गाँव के कई लोग ऐसे भी थे जो पाकिस्तानी फ़ौज में नौकरी करते थे। कई लोगों के रिश्तेदार भी उधर हैं। दरअसल गिलगित बल्टिस्तान कश्मीर या लद्दाख से अलग एक क्षेत्र है। इनकी संस्कृति और भाषा भी अलग है। तुरतुक के राजा मुहम्मद खान यब्गो बताते हैं कि भारत में आ जाने से हमारा बस यह नुक़सान हुआ कि हमारे लोग उधर ही रह गए। वो चाहते हैं कि भारत चाहे जैसे भी गिलगित बल्टिस्तान के बाक़ी इलाक़े पर भी क़ब्ज़ा करे, ताकि वो लोग एक समुदाय के तौर पर साथ रह सकें। 1971 से लेकर अब तक तुरतुक के लोग काफ़ी हद तक भारतीय सेना पर आश्रित रहे। लेकिन 2010 से इसे पर्यटन के लिए खोल दिया गया। 1999 में करगिल युद्ध के दौरान तुरतुक की चौकियों पर भी भारी गोलाबारी हुई थी।

सरल स्वभाव के हैं तुरतुक के लोग

लद्दाख के रेतीले इलाक़ों से निकलकर जब आप तुरतुक पहुँचते हैं तो आपको हैरानी होती है। ये बेहद खूबसूरत और हराभरा गाँव है। यहाँ अखरोट और सेब खूब होता है। गाँव के लोग आम तौर पर बहुत सज्जन हैं। लेकिन पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI ने यहां भी जिहाद का जहर घोलने की पूरी कोशिश की थी। माना जाता है कि 1999 में करगिल में हुई पाकिस्तानी सेना के घुसपैठ में यहां के कुछ लोगों ने भी सहायता की थी। दरअसल गांव में कुछ लोग हैं जो पाकिस्तानी सेना में रहे हैं और उनकी निष्ठाएं अब भी वहीं पर हैं। हालांकि अब उन पर सेना हमेशा कड़ी नजर रखती है। तुरतुक के राजा ने हमें बताया कि “जब इंडियन आर्मी आई तो हमें लगा था कि अब हमें हिंदू धर्म स्वीकार करना होगा। हमें हैरानी हुई कि किसी ने हमें ऐसा करने को नहीं कहा।”

सेना की मराठा रेजीमेंट तुरतुक के आसपास की चौकियों पर तैनात है। यहाँ आने-जाने वालों पर कड़ी नज़र रखी जाती है।

राजा के मुताबिक उनका वंश बहुत पहले हिंदू ही था। बाद में उन्होंने बौद्ध धर्म भी स्वीकार कर लिया था। लेकिन मुगलों के दौर में उन्हें जबरन मुसलमान बनना पड़ा था। यहां परंपरा है कि राजा का जो भी धर्म होता है जनता भी उसी को स्वीकार कर लेती है। फिलहाल यहां के लोग इस्लाम को ही मानते हैं, लेकिन इनमें वैसे धर्मांधता और कट्टरता देखने को नहीं मिलती जैसी दूसरे इलाकों के मुसलमानों में। इनमें से कई के बच्चे अब देश के अलग-अलग इलाकों में पढ़ने के लिए आते हैं।

भारत में रहे तो बच गई संस्कृति

तुरतुक के लोग अक्सर माँग करते रहे हैं कि करतारपुर कॉरीडोर की तर्ज़ पर उन्हें एलओसी के आरपार जाने की इजाज़त दी जाए। लेकिन अब तक इसकी कोई उम्मीद नहीं दिखाई दे रही। फ़िलहाल पूरे गिलगित बल्टिस्तान को भारत में मिलाए जाने की ख़बरों से उन्हें फिर से उम्मीद जगी है। तुरतुक के राजा का कहना है कि “शुरू में हमें भी लगा था कि हम गुलाम हो गए। लेकिन अब लगता है कि जो हुआ ठीक ही हुआ। क्योंकि पाकिस्तान ने अपने इलाक़े के पूरे बल्टिस्तान को चीन को दे रखा है। वहाँ पर चीन वन बेल्ट वन रोड योजना पर काम कर रहा है। पाकिस्तान ने पहले ही पूरे इलाक़े में बल्टी भाषा की जगह उर्दू को लागू कर रखा था। अब नौकरी के चक्कर में नौजवान चाइनीज़ भाषा सीख रहे हैं।

पाकिस्तान में बल्टिस्तान के पूरे इलाक़े में वहाँ की मूल संस्कृति और खानपान के बजाय चीनी भाषा और चीन के खाने का बोलबाला हो चुका है।” तुरतुक के राजा बताते हैं कि अब तो वहाँ के लोग हैरान होते हैं कि हिंदुस्तान में बल्टी भाषा और संस्कृति फल-फूल रही है, लेकिन पाकिस्तान ने उसे नष्ट कर डाला।

तुरतुक गाँव में सेना द्वारा संचालित स्कूल।

आशीष कुमार की रिपोर्ट

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