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भारत-नेपाल दोस्ती, पशुपतिनाथ मंदिर और एक परिवार का ‘बदला’

नेपाल और भारत के रिश्ते पिछले काफ़ी समय से ठीक नहीं चल रहे हैं। सांस्कृतिक और धार्मिक तौर पर इतनी मज़बूती के साथ जुड़े दो देशों के बीच यह दूरी कई लोगों को चौंकाती है। लेकिन आप इसके पीछे के ऐतिहासिक कारणों को जानेंगे तो समझ जाएँगे कि इसे लेकर कितने तरह के षड्यंत्र लगातार चल रहे हैं। बहुत कम लोगों को पता होगा कि नेपाल से भारत के रिश्ते ख़राब होने के पीछे सोनिया गांधी की बड़ी भूमिका रही है। 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ सोनिया गांधी नेपाल के दौरे पर गई थीं। तब के अधिकारियों के अनुसार कुछ रहस्यमय कारणों से सोनिया की भारत के विदेश और कूटनीतिक मामलों में बहुत रुचि लिया करती थीं। राजीव गांधी के इसी नेपाल दौरे में कुछ ऐसा हुआ जिसने भारत और नेपाल के रिश्तों में हमेशा-हमेशा के लिए गांठ डाल दी। हालांकि इसके लिए सीधे तौर पर सोनिया गांधी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह भी पढ़ें: भारत-नेपाल सीमा विवाद और कोरोना वाले चीन की कुटिल चाल

पशुपतिनाथ मंदिर में सोनिया को रोका गया

इतिहास का ये वो अध्याय है जिसे रॉ के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर अमर भूषण ने अपनी किताब ‘इनसाइड नेपाल’ में दर्ज किया है। राजीव गांधी ने सत्ता में आते ही नेपाल को लेकर भारत की परंपरागत नीति में बदलाव कर दिया। उन्होंने राज परिवार की बजाय नेपाल में लगभग मृतप्राय वामपंथी संगठनों को समर्थन देना शुरू किया। राजीव गांधी का मानना था कि ऐसा करके वो नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना करना चाहते हैं। राजीव गांधी को ऐसा करने की सलाह देने वाला कौन था यह भी रहस्य है अगर किसी अधिकारी या विदेश नीति से जुड़ी संस्था ने ऐसा करने को कहा होता तो यह आधिकारिक दस्तावेज़ों में दर्ज होता। राजीव सरकार की इस नीति से नेपाल के राजा वीर वीरेंद्र विक्रम शाह बहुत नाराज़ हुए। इसी दौरान 1985 में राजीव गांधी अपनी पत्नी सोनिया के साथ नेपाल दौरे पर गए। वहाँ पर राजा और महारानी से उनकी मुलाक़ात की तस्वीर आप ऊपर देख सकते हैं। साथ ही सोनिया की असहजता भी समझी जा सकती है। इस दौरे में सोनिया की दिलचस्पी हिंदुओं के पवित्र पशुपतिनाथ मंदिर में प्रवेश करने की भी थी। लेकिन मंदिर प्रशासन ने उन्हें अनुमति देने से मना कर दिया। क्योंकि मंदिर में ग़ैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। नेपाल नरेश ने पुजारियों को समझाया, लेकिन वो नहीं माने।

प्रवेश पर रोक से बौखलाए सोनिया-राजीव

अमर भूषण ने अपनी किताब में ज़िक्र किया है कि “राजीव गांधी ने सोनिया को रोके जाने को अपने व्यक्तिगत अपमान की तरह लिया। लौटकर वो दिल्ली आए तो ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ को ज़िम्मेदारी सौंपी कि वो नेपाल से राजशाही को समाप्त करने का अभियान चलाए।” इस सीक्रेट ऑपरेशन की कमान अमर भूषण को दी गई। वो जीवनाथन की नक़ली पहचान के साथ नेपाल में रहने लगे और प्लान पर काम शुरू हो गया। राजीव गांधी का मन इतने से भी नहीं भरा। उन्होंने कुछ समय बाद नेपाल की आर्थिक नाकेबंदी शुरू कर दी। परेशान होकर नेपाल नरेश चीन से मदद माँगने पहुँच गए। राजीव के हटने के बाद भी रॉ का ऑपरेशन जारी रहा। जब नरसिंह राव पीएम बने तब जाकर ये बंद हुआ। इस समय तक दोनों देशों के रिश्ते सामान्य दिखने लगे। लेकिन चीन को अब नेपाल के मामलों में घुसने का मौक़ा मिल चुका था। उसने माओवादी वामपंथी गिरोहों को खड़ा किया जिन्होंने 1996 में नेपाल सरकार के ख़िलाफ़ छापामार युद्ध शुरू कर दिया। जिसका नतीजा 1 जून 2001 को नेपाल नरेश की हत्या के रूप में निकला। कहने को यह पारिवारिक विवाद था, लेकिन सच कोई नहीं जानता। नेपाल नरेश भारत समर्थक माने जाते थे। उनके रास्ते से हटते ही नेपाल राजनीतिक रूप से अस्थिर हो गया।

नीचे रॉ के अधिकारी अमर भूषण की किताब का कवर देखा जा सकता है, जिसमें उन्होंने नेपाल को लेकर राजीव गांधी सरकार की ग़लतियों को उजागर किया है।

2004 में फिर शुरू हुआ रॉ का ऑपरेशन

वाजपेयी सरकार के बाद जैसे ही मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने एक बार फिर से रॉ को अपना काम आगे बढ़ाने को कह दिया गया। यह अनुमान लगाना बहुत कठिन नहीं है कि कौन 1986 से लगातार इस काम पर नज़र रखे हुए था/थी। इधर भारत में यूपीए की सरकार बनी और उधर नेपाल में दो साल के अंदर ही सशस्त्र क्रांति हो गई। उस दौर में नेपाल के घटनाक्रम पर मनमोहन सरकार की नीतियों को ध्यान से देखें तो समझ में आता है कि वास्तव में क्या खेल चल रहा था। नेपाल के पूरे राज परिवार की हत्या से लेकर माओवादी क्रांति तक भारत की भूमिका अजीबोग़रीब थी। ऐसा लग रहा था मानो नेपाल की ये बर्बादी भारत में किसी की ख़ुशी के लिए हो रही है। अब चीन की सत्ता पर पूरी तरह से वामपंथियों का क़ब्ज़ा है जो वास्तव में चीन की कठपुतलियाँ हैं। दावा किया जाता है कि नेपाल के माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड को भी वास्तव में रॉ ने ही पैदा किया था। तब यह नहीं सोचा गया कि प्रचंड माओवादी है और कुछ भी हो जाए वो भारत के बजाय चीन का ही साथ देगा।

नेपाल में ईसाई मिशनरियों का बोलबाला

नेपाल में माओवादियों के सत्ता में आते ही सबसे पहला काम यह हुआ कि उसे सेकुलर देश घोषित कर दिया गया। इसके बाद वहाँ पर ईसाई मिशनरियों और पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI को भी पैर पसारने का मौका मिल गया। बीते कुछ साल में नेपाल के अंदर बाहर से आकर बसे मुसलमानों की संख्या तेजी से बढ़ी है। साथ ही ईसाई मिशनरियां नेपाल के समाज में जाति और क्षेत्र जैसे टकराव पैदा करके तेजी के साथ धर्मांतरण भी करवा रही हैं। इसी का परिणाम है कि आज नेपाल में मुसलमानों की आबादी 5 प्रतिशत और ईसाइयों की 2 प्रतिशत के आसपास हो चुकी है। नीचे की तस्वीर नेपाल के दार्चुला कस्बे की है जो भारत के उत्तराखंड के धारचूला से सटा हुआ है। यहां बीते कुछ साल में ईसाई आबादी तेजी से बढ़ी है। मिशनरियां लोगों को रोजगार और अनाज का लालच देकर ईसाई बना रही हैं। इस तस्वीर में दुकान पर बने क्रॉस का निशान आप देख सकते हैं। ऐसी दुकानें बीते कुछ साल में बहुत तेजी से बढ़ी हैं।

राजीव और सोनिया की जोड़ी ने जो काम नेपाल में शुरू किया था वो आज भी जारी है। कथित तौर पर उनके कारण ही राजशाही का सफाया हो चुका है और अब कभी दुनिया के इकलौते हिंदू राष्ट्र रहे इस देश से हिंदुओं के सफाये का काम धीरे-धीरे ही सही लेकिन चल रहा है।

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