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राम, लक्ष्मण, हनुमान के अस्त्र-शस्त्र और जनेऊ भी उतरवा चुके थे मोरारी बापू!

मशहूर राम कथावाचक मोरारी बापू को लेकर विवाद गहराते जा रहे हैं। यह बात सामने आ रही है कि मोरारी बापू पिछले कुछ समय से हिंदू धर्म के प्रतीकों और देवी-देवताओं के प्रचलित स्वरूपों में बदलाव कर रहे थे। सोशल मीडिया पर एक फोटो वायरल हो रही है, जिसे गुजरात में भावनगर के तलगाजरडा महुआ के मंदिर का बताया जा रहा है। यहाँ मोरारी बापू का आश्रम है। मंदिर की विशेषता है कि इसमें राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और हनुमान जी में से किसी के भी हाथ में कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं है। न राम के हाथ में तीर-धनुष और न ही हनुमान के हाथों में गदा। इतना ही नहीं, उनके शरीर पर जनेऊ भी नहीं है। किसी भी राम मंदिर में अस्त्र-शस्त्र और जनेऊ ज़रूर होते हैं। क्योंकि इनका एक धार्मिक महत्व होता है। यह साफ़ नहीं है कि ऐसा क्यों किया गया है। यह भी पढ़ें: भागवत कथा के नाम पर अली मौला क्यों जप रहे हैं कथावाचक?

मंदिर की मूर्ति या षड्यंत्र?

दुनिया में कहीं भी आपको धनुष के बिना राम नहीं दिखेंगे। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि मैं शस्त्रधारियों में राम हूँ। अर्थात शस्त्र के बिना राम की कल्पना नहीं की जा सकती। रामायण के अनुसार लक्ष्मण ने राम की रक्षा का प्रण लिया था और कहा था कि जब भी आप पूजा या ध्यान में लीन रहेंगे तब मैं वहां धनुष लेकर आपकी रक्षा करूंगा। इसलिए धनुष उनका एक तरह का प्रतीक है, जिसे अलग नहीं किया जा सकता। इसी तरह हनुमान के हाथों से गदा ग़ायब है। माता सीता के गले में उनका मंगलसूत्र भी नहीं है। मंदिर में हनुमान की एक विशाल मूर्ति भी है जिसमें उन्हें योगी की तरह पद्मासन में बैठे दिखाया गया है। इसमें भी उनके शरीर पर जनेऊ और बग़ल में गदा नहीं है। सवाल उठता है कि क्या यह मात्र संयोग है या कोई प्रयोग? क्योंकि देश में शायद ही कोई ऐसा मंदिर होगा जहां ऐसा राम दरबार देखने को मिले। मंदिरों में मूर्तियाँ शास्त्रों के अनुसार होती हैं। हालाँकि इसी मंदिर में कुछ जगहों पर हनुमान के साथ गदा है।

भगवान के अस्त्र क्यों छीने?

हिंदू देवी-देवताओं के हाथों में अस्त्र-शस्त्र ज़रूर होते हैं। ये उनकी पहचान हैं। यही बात सेकुलर ब्रिगेड को खटकती है। इस पहचान को मिटाने की कोशिश महात्मा गांधी ने ही शुरू कर दी थी जिन्होंने गीता की पंक्ति ‘अहिंसा परमो धर्म: धर्म हिंसा तथैव च:’ के पहले तीन शब्दों को प्रचारित किया और कहा कि अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है। जबकि बाद के हिस्से का अर्थ है कि जब धर्म पर आंच आए तो उसकी रक्षा करने के लिए की गई हिंसा उचित है। अर्थात अहिंसा का मार्ग अपनाना चाहिए परंतु धर्म पर और राष्ट्र पर कोई आंच आए तो हमें अहिंसा का मार्ग त्याग कर हिंसा का रास्ता अपनाना चाहिए। इन्हीं सब का नतीजा हुआ कि हिंदू समुदाय आसानी से मज़हबी हिंसा का शिकार होता रहा। बँटवारे के समय भी जो हिंसा हुई थी उसका सबसे बड़ा शिकार हिंदू ही बने थे, क्योंकि उन्होंने अपने हथियार गांधी जी के कहने पर फेंक दिए थे। दूसरी तरफ़ एक मज़हब विशेष के लोगों के पास तलवार, गंडासे और चाकू का भंडार था। जिसका उन्होंने समय-समय पर दंगों में भी जमकर इस्तेमाल किया। सवाल बस यह है कि मोरारी बापू के ऐसा करने के पीछे दिमाग़ किसका है? यह भी पढ़ें: बापू से मोरारी बापू तक… हिंदू धर्म के इस्लामीकरण की कोशिश जारी है

मोरारी बापू के आश्रम की वेबसाइट से ही हमें यह तस्वीर मिली है, जिसमें उन्हें सैम पित्रोदा के साथ देखा जा सकता है। सैम पित्रोदा सोनिया गांधी के बेहद करीबी हैं और अक्सर हिंदू विरोधी गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं। ऐसा व्यक्ति अगर मोरारी बापू से मिलता है और कार्यक्रमों में हिस्सा लेता है तो इसका कुछ न कुछ प्रयोजन ज़रूर होगा। इसी तरह दो साल पहले मोरारी बापू ने एक कार्यक्रम में बोलने के लिए विवादित पत्रकार रवीश कुमार को बुलाया था और उन्होंने यहाँ लंबा-चौड़ा भाषण भी दिया था। रवीश कुमार भी कांग्रेस के करीबी हैं और अपने हिंदू विरोधी रवैये के लिए बदनाम हैं।

मोरारी बापू भगवान राम की कथा सुनाते हैं। लाखों लोग उनको पसंद करते हैं। लेकिन हाल के दिनों में उनकी गतिविधियों के बारे में जो जानकारियाँ सामने आ रही हैं वो लोगों में चिंता पैदा करती हैं। भगवान राम के स्वरूप में बदलाव करना हो या व्यास पीठ से अली मौला और अल्ला-अल्ला का जाप करना, उससे करोड़ों हिंदुओं की आस्था को गहरी ठेस पहुँची है। उम्मीद की जा रही है कि मोरारी बापू ख़ुद आगे आकर सफ़ाई देंगे। उनके आश्रम की तरफ़ से अभी तक ताज़ा विवाद पर कोई औपचारिक बयान नहीं आया है।

(न्यूज़लूज़ टीम)

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