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कोरोना वायरस का ‘केरल मॉडल’, कम्युनिस्टों का एक और फर्जीवाड़ा

बायीं तस्वीर केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन की है जबकि दायीं तस्वीर स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा की।

आपने ध्यान दिया होगा कि पिछले कुछ दिनों से अख़बारों में केरल मॉडल की चर्चा ज़ोरों पर है। देशभर के अख़बारों और चैनलों पर भी केरल की तारीफ़ों के पुल बांधे जा रहे हैं कि वहाँ की सरकार ने बड़ी ही कामयाबी के साथ कोरोनावायरस पर नियंत्रण पा लिया है। भारत ही नहीं, दुनिया भर की मीडिया में केरल की इस कथित कामयाबी से जुड़ी खबरें छप रही हैं। इसके पीछे की सच्चाई हैरान करने वाली है। केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार है। उसका काम करने का तरीका भी लगभग वही है जो चीन के कम्युनिस्टों का। केरल से बड़ी संख्या में संक्रमित लोगों को राज्य से बाहर भेजा गया, जबकि दूसरे राज्यों के लोगों को राज्य में घुसने नहीं दिया गया। साथ ही केरल उन कुछ राज्यों में से है जिसने सबसे कम टेस्ट किया। स्थानीय सूत्रों के अनुसार बड़ी संख्या में ऐसे लोगों की जान गई है, जिनका कोई टेस्ट ही नहीं हुआ। भले ही केरल की वाहवाही हो रही हो, लेकिन सच यह है कि असम और ओड़िशा जैसे कई राज्यों ने केरल के मुकाबले काफी अच्छा काम किया है।

‘केरल मॉडल’ के झूठ को समझिए

केरल उन कुछ राज्यों में से है जो दूसरे राज्यों से अपने सबसे कम लोगों को लेकर आया है। आसपास के राज्यों से भी बस भेजकर लोगों लोगों को नहीं लाया गया। कोई श्रमिक ट्रेन भी अब तक केरल नहीं पहुँची। जबकि केरल दूसरा राज्य है जहां से सबसे ज्यादा श्रमिक स्पेशल ट्रेनें लोगों को बाहर लेकर गई हैं। दिल्ली में हज़ारों की संख्या में केरल के छात्र रहते हैं। वो भी अभी तक फँसे हुए हैं। केरल ने तमिलनाडु और कर्नाटक से लगी अपनी सीमा को सील कर रखा है। दूसरे राज्य के लोग ही नहीं, केरल के लोगों को भी अंदर आने नहीं दिया जा रहा। उनसे कहा जा रहा है कि पहले ख़ुद को ऑनलाइन रजिस्टर कराए। जिस वेबसाइट पर रजिस्टर करना था वो अक्सर बंद रहती है। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जब बॉर्डर पर फँसे लोगों की सहायता करने की कोशिश की तो उन्हें ये कहते हुए क्वारंटाइन में डाल दिया गया कि वो संक्रमित हो सकते हैं। जिन लोगों ने भी बाहर से केरल के लोगों को लाने की माँग की, उनका विरोध किया गया। कम्युनिस्ट पार्टी के काडर ने यह प्रचार शुरू कर दिया कि ये लोग केरल के दुश्मन हैं और चाहते हैं कि महामारी फैल जाए। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि कोई राज्य अपने ही लोगों को बाहर से आने न दे? बाहर के लोगों को आने देने के कारण ही झारखंड, बिहार, ओड़िशा और यूपी में ज़्यादा कोरोना रोगी दिखाई देते हैं। केरल उन राज्यों में से है जिसने सबसे कम टेस्ट किए हैं। यहाँ क़रीब 40 हज़ार कोरोना टेस्ट कराए गए हैं, जबकि केरल के मुक़ाबले बहुत कम आबादी वाले हरियाणा जैसे राज्यों ने कहीं ज़्यादा टेस्ट किए।

केरल से अच्छा है असम का रिकॉर्ड

केरल और असम, दोनों की जनसंख्या लगभग बराबर 3.5 करोड़ के आसपास है। इन दोनों के आँकड़ों की तुलना करें तो सच्चाई सामने आ जाती है। असम ने बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों में काम करने वाले अपने लोगों आने की अनुमति दी। 14 मई तक केरल में कुल संक्रमित लोगों की संख्या 561 थी, जबकि असम में मात्र 87 मरीज़ हैं। केरल में कोरोना से 4 लोगों की जान गई, जबकि असम में 2 लोगों की जान गई। मृत्यु दर के हिसाब से केरल बेहतर दिखता है। लेकिन ज़मीनी हालात पर नज़र डालें तो आपको समझ में आएगा कि असम की कामयाबी कितनी बड़ी है। यहाँ पहला केस क़रीमगंज ज़िले में आया था। जहां दिल्ली से लौटे एक जमाती में संक्रमण की पुष्टि हुई थी। इससे पहले कि महामारी फैलती राज्य सरकार ने एक-एक संदिग्ध व्यक्ति की पहचान करके उसे क्वारंटाइन सेंटर में डाला। यह काम कितना मुश्किल था आप इसी से समझ सकते हैं कि अकेले असम में 681 जमाती लौटे थे। असम सरकार ने अप्रैल के मध्य तक क़रीब एक लाख लोगों को क्वारंटाइन सेंटरों में डाल दिया था। जबकि केरल इस काम में पूरी तरह नाकाम रहा। असम ने लोगों को बाहर से आने से नहीं रोका, बल्कि जो आए उनका सही ढंग से इंतज़ाम करवाया। नतीजा यह है कि आज यहाँ कुल मरीज़ों में से क़रीब आधे ठीक होकर घर जा चुके हैं। असम की कामयाबी का ही नतीजा था कि उसने एक दीवार का काम किया और नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में महामारी नहीं फैलने पाई। गोवा, हिमाचल, उत्तराखंड, त्रिपुरा और लद्दाख के आँकड़े भी केरल से बेहतर हैं।

‘केरल मॉडल’ की ही वाहवाही क्यों?

आज चीन, उत्तर कोरिया, क्यूबा और वियतनाम जैसे कुछ गिनेचुने देशों में ही कम्युनिस्ट शासन बचा है। दुनिया भर में जनता ने वामपंथ को भले ही नकार दिया हो, लेकिन आज भी वो मीडिया और यूएन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में बड़ी तादाद में भरे पड़े हैं। केरल भारत का एकमात्र राज्य है जहां वामपंथी सरकार है। ऐसे में दुनिया भर के कम्युनिस्टों की उस पर नज़र रहती है और वो उसकी झूठी तारीफ़ से भी बाज नहीं आते। 2018 में केरल में जब भयानक बाढ़ आई थी और राज्य सरकार पूरी तरह पस्त हो गई थी, तब भी देश-विदेश की मीडिया में लेख छपे थे कि केरल सरकार ने बहुत अच्छा काम किया। ठीक उसी तरह अब केरल मॉडल का प्रचार हो रहा है। ऐसे लेख छापने वाले कुछ अमेरिकी संस्थान भी हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि वो इस तरह का पेड न्यूज़ यानी पैसे लेकर रिपोर्ट छापते हैं। नीचे आप ऐसे ही कुछ उदाहरण देख सकते हैं जिनमें केरल जैसे छोटे राज्य की वाहवाही हो रही है। इनमें से ज़्यादातर पिछले सप्ताह ही छपवाए गए हैं। इनमें जो आँकड़े और तथ्य दिए गए हैं उनकी आप जाँच करें तो पाएँगे कि ज़्यादातर या तो पुराने हैं या मनगढ़ंत हैं।

नीचे आप अंतरराष्ट्रीय पत्रिका द इकोनॉमिस्ट में छपी ख़बर का स्क्रीनशॉट देख सकते हैं। इसमें वियतनाम और केरल की प्रशंसा की गई है और बताया गया है कि इन दोनों ने बहुत सस्ते में कोविड-19 पर नियंत्रण पा लिया।

अमेरिका में हालात सबसे ज़्यादा ख़राब हैं, लेकिन वहाँ के सरकारी मीडिया संस्थान वायस ऑफ अमेरिका को भी लगता है केरल की ज़्यादा चिंता है। इस लेख में बताया गया कि कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ केरल दुनिया को रास्ता दिखा रहा है। निश्चित रूप से यह वहाँ बैठे किसी कम्युनिस्ट के दिमाग़ का आइडिया होगा या फिर इसे छापने के बदले मोटी रक़म दी गई होगी।

ब्रिटिश अख़बार द गार्जियन तो केरल सरकार की सफलता से इतना प्रभावित हो गया कि वहाँ की स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा को रॉकस्टार तक बता डाला। ऐसे समय में जब केरल जैसे आँकड़े दुनिया के कई देशों और भारत के कई राज्यों के भी हैं, ख़बर की इस भाषा से पता चलता है कि ये पैसे देखकर छपवाई गई है।


जब गंगा बह रही है तो बीबीसी पीछे कैसे रह सकता था। कोरोना वायरस फैलने के बाद भारत में सबसे ज़्यादा फेक न्यूज फैलाने वाले बीबीसी ने भी केरल की कथित कामयाबी पर लंबा चौड़ा लेख प्रकाशित किया। इससे बीबीसी को अपने मौजूदा आर्थिक संकट से उबरने में ज़रूर सहायता मिली होगी।

अमेरिका में फेक न्यूज की फ़ैक्ट्री कहे जाने वाले सीएनएन ने केरल की कामयाबी पर बाक़ायदा वीडियो रिपोर्ट दिखाई। रिपोर्टर को नहीं पता था कि केरल में इंडिया गेट नहीं है, इसके बावजूद उसने केरल की की कम्युनिस्ट सरकार के बारे में वो-वो बातें भी बता डालीं जो केरल के लोगों को भी नहीं पता होंगी।

केरल तेज़ी से इस्लामीकरण की तरफ़ से बढ़ रहा राज्य है। वहाँ की वामपंथी सरकार भी मुसलमानों के तुष्टीकरण में कोई कसर नहीं छोड़ती। ऐसे में उसकी तारीफ गल्फ़ न्यूज़ में न छपे ऐसा तो हो नहीं सकता था। नीचे आप उसका स्क्रीनशॉट भी देख सकते हैं। यह लेख भी कांग्रेस नेता शशि थरूर ने लिखा है जबकि केरल में कांग्रेस के कार्यकर्ता लगातार कह रहे हैं कि केरल सरकार कोरोना के नाम पर धोखाधड़ी कर रही है।

नीचे विवादित पत्रकार शेखर गुप्ता की वेबसाइट द प्रिंट के लेख का स्क्रीनशॉट है। इसमें राजस्थान और केरल को पूरी दुनिया के लिए एक सबक़ बताया गया है। जबकि राजस्थान में हालात बेक़ाबू हैं और केरल की सच्चाई ऊपर हम आपको बता ही चुके हैं।

वामपंथियों के अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस ने लेख छापा जिसमें बताया कि केरल ने सामाजिक क्षेत्र में जो भारी पैसा लगाया उसके कारण कोविड19 पर नियंत्रण में सहायता मिली। जबकि यह सरासर झूठ है। ऐसा कोई आँकड़ा नहीं है जो बताता हो कि केरल सरकार ने स्वास्थ्य पर कोई ज़्यादा खर्च किया हो।

 

ये तो कुछ उदाहरण भर हैं। भारत का शायद ही कोई अख़बार या चैनल बचा हो जिसमें केरल की इस कथित सफलता का स्तुतिगान न हुआ हो। यह देखकर बस यही कहा जा सकता है कि वामपंथी भले ही सत्ता से बाहर हों, लेकिन मीडिया में उनकी ही सत्ता है। सिर्फ़ भारत नहीं बल्कि दुनिया भर के वामपंथी आपस में भरपूर भाईचारा निभाते हैं।

(आशीष कुमार की रिपोर्ट)

 

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