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सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की कहानी, जानिए कैसे नेहरू ने लगाया था अड़ंगा

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग एक मुस्लिम शासक जूनागढ़ के नवाब के रियासत के अंतर्गत आता था। जूनागढ़ का नवाब कट्टर मुस्लिम था और दिल्ली के मुगल सल्तनत को खुश करने के लिए कई बार सोमनाथ मंदिर को लुटवाया। सोमनाथ मंदिर पर अंतिम सबसे बड़ा हमला औरंगजेब के समय में हुआ, जब मंदिर को आधा तोड़ दिया गया था मतलब मंदिर का शिखर गुंबद सब तोड़ दिया गया। उसके पहले भी मुगलों ने कई बार थोड़ा लेकिन हर बार कभी महाराजा विक्रमादित्य तो कभी जामनगर के महाराजा तो कभी अहिल्याबाई होलकर यानी उन दौर के हिंदू राजाओं ने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवा दिया। लेकिन मंदिर का निर्माण होते ही कोई न कोई मुगल शासक उसे फिर से तोड़ देता था।

आजादी के बाद जूनागढ़ का नबाब जूनागढ़ रियासत को भारत में नहीं मिलाना चाहता था, बल्कि वह मोहम्मद अली जिन्ना के साथ मिलकर जूनागढ़ रियासत को पाकिस्तान में शामिल करना चाहता था। सरदार पटेल को भनक लग गई और उन्होंने जूनागढ़ पर कार्रवाई का फ़ैसला किया। दोनों पक्षों के करीब 1200 लोग मारे गए और जूनागढ़ का अंतिम नवाब महावत खान बॉबी एक विमान में बैठकर अपनी एक कुतिया को लेकर पाकिस्तान भाग गया। मजे की बात है कि उसने अपनी तमाम बीवियों, तमाम बच्चों को यहीं छोड़ दिया और अपने साथ सिर्फ एक अपनी कुतिया लेकर गया था। फिल्म अभिनेत्री परवीन बाबी उसी महावत खान बॉबी की पोती थी।

जूनागढ़ को भारत में मिलाने के बाद सरदार बल्लभ भाई पटेल, कन्हैयालाल मुंशी, महाराजा जामनगर जाम साहेब, सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री यूएन ढेबर यह सब लोग सोमनाथ मंदिर पर गए और टूटे हुए सोमनाथ मंदिर पर तिरंगा फहराया गया। जिसे आप नीचे एक तस्वीर में देख सकते हैं और वहीं पर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कसम खाई कि मैं सोमनाथ मंदिर का भव्य निर्माण करराऊंगा। उसके बाद सोमनाथ मंदिर का एक प्रस्ताव बनाया गया। यह प्रस्ताव जब महात्मा गांधी के पास गया तब महात्मा गांधी मंदिर के पुनर्निर्माण पर तो सहमत थे लेकिन उनका यह कहना था कि यह काम सरकारी खजाने से नहीं होना चाहिए। सोमनाथ मंदिर का निर्माण का प्रस्ताव जब जवाहरलाल नेहरू के पास गया तब वो किसी भी बात से सहमत नहीं थे उनका यह कहना था सोमनाथ जिस अवस्था में है उसी अवस्था में रहने दिया जाए सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण नहीं होना चाहिए।

A picture of the old somnath temple . [Photo credit Somnath Temple Trust]

नीचे एक तस्वीर में जवाहरलाल नेहरू का लिखा हुआ पत्र भी है जिसमें उन्होंने साफ-साफ सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से असहमति दिखाई थी और कहा था कि किसी भी हालत में मंदिर का निर्माण नहीं होना चाहिए मंदिर जिस अवस्था में है उसी अवस्था में रहने दिया जाए। उसके बाद दूसरे पत्र में सरदार पटेल नेहरु से पूछते हैं ट्रस्ट बनाकर ट्रस्ट को मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी दे दी जाए वापस नेहरू लिखते हैं नहीं सोमनाथ जिस अवस्था में है उसी अवस्था में रहने दिया जाए हमें भारत के किसी भी मंदिर को छेड़ना नहीं चाहिए। लेकिन सरदार पटेल जी का एक सपना था सोमनाथ में एक भव्य मंदिर का निर्माण हो सरदार पटेल ने नेहरू की बात को नहीं मानते हुए मंदिर निर्माण का आदेश दे दिया। नेहरू जानते थे कि सरदार पटेल का राजनीतिक कद उनसे कहीं ज्यादा है और यदि उन्होंने ज्यादा विरोध किया तब कांग्रेस पार्टी में विद्रोह हो जाएगा। नीचे देखें मंदिर को लेकर नेहरू और पटेल के बीच पत्र व्यवहार।

सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री ढेबर भाई से लेकर गुजरात से आने वाले नेहरू मंत्रिमंडल में मंत्री केएल मुंशी और यहां तक कि उस समय की विपक्षी पार्टियां जैसे जनसंघ भी मंदिर निर्माण के पक्ष में थी इसीलिए नेहरू मन मसोस कर रह गए।
उसी दरम्यान सरदार पटेल जी का दुखद निधन हो गया लेकिन मुंशी जी और ढेबर भाई ने मंदिर निर्माण का कार्य जोर-शोर से जारी रखा। सरदार पटेल जी का एक सपना था कि जब यह मंदिर बने तब भारत का सर्वोच्च पद पर आसीन यानी राष्ट्रपति इसका उद्घाटन करें। मंदिर निर्माण के बाद जब नेहरू को पता लगा सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री और कन्हैयालाल मुंशी ने डॉ राजेंद्र प्रसाद को मंदिर के उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया है तब जवाहरलाल नेहरू ने इसका विरोध किया। नीचे आप सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के मौक़े पर डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की तस्वीर देख सकते हैं।

नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद जी को जो पत्र लिखा उस पत्र की कॉपी तारा सिन्हा की किताब “राजेंद्र बाबू पत्रों के आईने” में विस्तार से लिखी गई है और तारा सिन्हा ने नेहरू और राजेंद्र बाबू के बीच में सारे पत्र व्यवहार को हासिल करके यह किताब लिखी और इस किताब में उन्होंने तमाम पत्रों को भी प्रकाशित किया है। राजेंद्र बाबू ने नेहरू जी को पत्र लिखा कि मैं मंदिर का उद्घाटन करने जाऊंगा आप निश्चिंत रहिए मैं इसमें सरकारी खजाने से एक रुपया भी खर्च नहीं करूंगा। उसके बाद राजेंद्र प्रसाद अपने पैसे से रिजर्वेशन कराकर दिल्ली से ट्रेन से बड़ोदरा उतरे और बड़ोदरा से जाम साहब द्वारा भेजी गई कार में बैठकर वह सोमनाथ मंदिर पहुँचे और उसका उद्घाटन किया। इस तरह से हिंदुओं के गौरव सोमनाथ मंदिर का दोबारा निर्माण हुआ।

इस मंदिर के पुनर्निर्माण में जिन्होंने सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी वह थे सरदार वल्लभभाई पटेल, कन्हैयालाल मुंशी, सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री ढेबर भाई जामनगर के महाराजा जाम साहब और भारत के राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद अगर इन सभी लोगों का एक गठजोड़ नहीं होता तब जवाहरलाल नेहरू हिंदू धर्म के प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर का कभी निर्माण नहीं होने देते। सरदार पटेल चाहते थे कि आने वाली पीढ़ियां सोमनाथ मंदिर के टूटे हुए अवशेषों को भी देखें और सोचें कि उसके हिंदुत्व पर कितने हमले हुए। इसलिए टूटे हुए सोमनाथ मंदिर को उस वक्त ब्रिटेन और अमेरिका से इंजीनियरों को बुलाकर मंदिर से कुछ दूर खिसका दिया गया है आप अगर सोमनाथ जाए तब आप उस पुराने टूटे हुए मंदिर के अवशेष को भी देख सकते हैं।

(जितेंद्र प्रताप सिंह के फ़ेसबुक पेज से साभार)

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