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‘आत्मनिर्भर भारत’ बनाने में आएंगी ये मुसीबतें, क्या आप तैयार हैं?

कोरोनावायरस से जूझ रहे देश को उबारने की कोशिशों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ नाम से अभियान का एलान कर दिया है। इसके तहत उन्होंने अपील की है कि लोग लोकल यानी स्थानीय तौर पर बनने और बिकने वाले सामान ही ख़रीदें। हालाँकि पीएम मोदी ने ऐसा कुछ नहीं कहा कि विदेशी सामान का बहिष्कार करना है या सरकार ऐसी नीतियाँ बनाएगी, जिससे विदेशी सामान भारत में न आने पाएं। लेकिन ज़ाहिर है कि अगर लोग भारत में बने सामान ही ख़रीदने लगेंगे तो ख़ुद ही विदेशी सामान बाज़ार से बाहर हो जाएँगे। साथ ही 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज का एलान किया गया, जो लोकल उत्पादकों और कारोबारियों की सहायता के लिए है। लेकिन क्या वाक़ई भारत को आत्मनिर्भर बनाना इतना आसान है? अगर पिछले अनुभवों पर नज़र डालें तो यह बहुत जोखिम वाला काम है। क्योंकि कांग्रेस के लंबे दौर में भारत के अंदर चीन समर्थक इतनी बड़ी लॉबी बन चुकी है जो इस अभियान को तहस-नहस करने के लिए पूरी ताक़त लगा देगी। जानते हैं कि वो क्या तरीक़े हो सकते हैं, जिससे अभियान को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश हो सकती है:

1. औद्योगिक दुर्घटनाएँ बढ़ सकती हैं

पिछले दिनों विशाखापत्तनम और रायपुर में एक ही दिन गैस लीक की दो बड़ी घटनाएँ हुईं। इन दोनों को देसी-विदेशी मीडिया ने खूब प्रचारित किया। हो सकता है कि ये दुर्घटना ही हो, लेकिन यह संयोग है कि ऐसी किसी भी कोशिश से पहले ऐसी दुर्घटनाएँ खूब होती हैं। जैसे कि मेक इन इंडिया अभियान के समय मुंबई में एक कार्यक्रम का पंडाल जल गया था। ऐसी रहस्यमय घटनाएँ किसी षड्यंत्र का भी इशारा करती हैं। यह भी एक तथ्य है कि साल 2000 के बाद जब भारत ने बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश के लिए ज़ोर लगाया था तब भी ऐसी छोटी-बड़ी कई घटनाएँ होती हैं। ये देश की छवि को बिगाड़ने वाली होती हैं। क्रायोजेनिक इंजन के क्षेत्र में भारत जब आत्मनिर्भरता की तरफ़ बढ़ रहा था तब इसरो जासूसी कांड के नाम पर वैज्ञानिकों को जेलों में बंद कर दिया गया था। वैज्ञानिक नंबी नारायण ऐसी ही एक साज़िश का शिकार बने थे। इसी तरह देश के कई परमाणु वैज्ञानिकों की भी रहस्यमय हालात में मौत भी हो चुकी है। इस बारे में रिपोर्ट आप पढ़ सकते हैं: किसने कराई देश के परमाणु वैज्ञानिकों की हत्याएं

2. मज़दूर हिंसा भड़काने की कोशिश

आत्मनिर्भर भारत अभियान पर मोदी सरकार ने जितना ज़ोर दिया, मज़दूर आंदोलन भड़काने की कोशिशें भी उतनी ही तेज़ होंगी। यह किसी से छिपा नहीं है कि दिल्ली से सटे मानेसर, गुरुग्राम, ग्रेटर नोएडा में पिछले कुछ सालो में मज़दूर आंदोलन भड़काने की कितनी कोशिशें हो चुकी हैं। मारुति और हीरो होंडा के प्लांट में हिंसा, ग्रेटर नोएडा में सीईओ की हत्या जैसी घटनाएँ हो चुकी हैं। यह शक हमेशा से जताया जाता रहा है कि वामपंथी ट्रेड यूनियनों की मदद से चीन भारत में औद्योगिक अराजकता और हिंसा की स्थिति पैदा कर सकता है। वो समय-समय पर इसकी झलक भी दिखा चुका है। लिहाज़ा आगे इसे लेकर बेहद सतर्क रहने की ज़रूरत है।

3. पर्यावरण के नाम पर होंगे आंदोलन

आपको याद होगा कि मुंबई में मेट्रो के लिए बन रहे शेड के लिए कितना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया गया था। कहा गया कि उसके बनने से पेड़ कट जाएँगे। ठीक इसी तरह 2018 में तमिलनाडु के तूतीकोरिन में स्टरलाइट के कॉपर प्लांट के विरोध में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। इन सबके पीछे कहीं न कहीं चीन से जुड़े वामपंथी संगठनों का हाथ माना जाता है। आने वाले समय में ऐसे नक़ली पर्यावरण आंदोलनों की बाढ़ आ सकती है।

4. क़ीमतों और क़िल्लत का खेल बढ़ेगा

विदेशी सामानों के लिए दबाव बनाने के लिए एक जाना-पहचाना तरीक़ा है किसी सामान की अचानक कमी पैदा करके उसकी क़ीमतें बढ़ा देना। यह जमाख़ोरों की मदद से होता है। बाक़ी भूमिका मीडिया निभाता है जो इसे इतना प्रचारित करता है कि लोगों में घबराहट पैदा हो जाए और वो जमाख़ोरी करने लगें। आने वाले समय में ऐसी घटनाएँ बढ़ेंगी। लोगों को इनके लिए सतर्क और समझ पैदा करनी होगी।

5. भारतीय उत्पादों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार

भारतीय कंपनियों के उत्पादों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार बढ़ेगा। सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक में लोकल कंपनियों और कारोबारियों के सामान के घटिया होने का झूठा प्रचार होगा। आपको याद होगा कि सोशल मीडिया पर एक वीडियो आया था जिसमें दावा किया गया था कि अमूल दूध के पैकेट से केमिकल जैसा कुछ निकला। बाद में जाँच में पता चला कि वो फ़र्ज़ी वीडियो जानबूझकर कंपनी को बदनाम करने के लिए बनाया गया था और उसके पीछे एक मल्टीनेशनल कंपनी पर शक है। इसी तरह पतंजलि के घी में फफूँद का झूठ भी फैलाने की कोशिश हुई थी। जैसे ही स्थानीय कारोबारियों के उत्पादों को बढ़ावा देने का काम शुरू होगा उनके सामान को घटिया बताने वाला प्रचार भी तेज़ होगा। ऐसे में लोगों के लिए ज़रूरी होगा कि वो सोच-समझकर फ़ैसला लें।

‘आत्मनिर्भर भारत’ देश के लिए एक बड़ा अवसर बन सकता है। क्योंकि कोरोना संकट के कारण अभी कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था किसी पर विदेश से आयात का दबाव नहीं बना सकती। इसी का फ़ायदा उठाते हुए भारत ने पीपीई (पर्सनल प्रोटेक्शन एक्विपमेंट) बनाने में आत्मनिर्भरता पा ली। जबकि कुछ महीने पहले तक ये भारत में बनता ही नहीं था। इससे छोटे कारोबारियों और दुकानदारों को सबसे ज़्यादा फ़ायदा होगा। नौकरी और रोज़गार के अवसर पैदा होंगे। विदेशी से सामान मंगाने की ज़रूरत नहीं होगी तो विदेशी मुद्रा भी बचेगी। सबसे ख़ास बात कि पलायन और ज़रूरत से ज़्यादा शहरीकरण के संकटों से भी मुक्ति मिलेगी। यही कारण है कि यह कहा जा रहा है कि कोरोना महामारी ने एक अवसर भी दिया है। पीएम मोदी ने इसी अवसर की तरफ़ कदम बढ़ाए हैं और अगर पूरी सतर्कता और समर्पण के साथ देश ने इसमें हाथ बँटाया तो आने वाले समय में भारत वाक़ई उस ऊँचाई को छू सकेगा, जिसका सपना अभी देखा जा रहा है।
(आशीष कुमार की रिपोर्ट)

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