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मुसलमानों में कैसे आई ‘अरब से शिकायत’ वाली सोच?, जानिए कारण

कोलकाता में तीन तलाक़ पर पाबंदी के ख़िलाफ़ रैली की तस्वीर। (फाइल फोटो)

अरविंद केजरीवाल के करीबी और दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जफर उल इस्लाम के बयान को लेकर विवादों का दौर जारी है। जफर उल इस्लाम ने कहा था कि “जिस दिन भारत के मुसलमानों ने अरब देशों से ख़ुद पर हो रहे अत्याचारों की शिकायत कर दी तो तूफान आ जाएगा”। प्रश्न उठता है कि इस सोच का कारण क्या है? इसे समझने के लिए हमें पहले समस्या के इतिहास को जानना होगा। यह पहली बार नहीं है कि कोई भारतीय मुसलमान यह कहे कि वो अपने ही देश की शिकायत अरब से कर देगा। वास्तव में ऐसी शिकायतों का लंबा इतिहास है। आठवीं शताब्दी में भारत पर इस्लामी आक्रमणों की शुरुआत से लेकर आज तक ऐसा कई बार हुआ है जब भारतीय मुसलमानों ने ‘अरब से शिकायत’ वाली सोच जाहिर की है। दरअसल, मुसलमानों के ‘अरबीकरण’ की जो प्रक्रिया आठवीं शताब्दी में शुरू हुई थी वो आज भी जारी है। रमज़ान को रमदान कहना हो या खुदा हाफ़िज़ की जगह अल्लाह हाफ़िज़ बोलना ये सब उसी ‘अरबीकरण’ का हिस्सा है। आज़ादी के बाद उम्मीद की जाती थी कि भारत में इसे रोकने के लिए कुछ ठोस किया जाएगा, लेकिन दुर्भाग्य से आज़ाद भारत की सरकारों ने भी इस समस्या की ओर कोई ध्यान नहीं दिया।

अरब से शिकायत की मानसिकता का जन्म

आठवीं शताब्दी में मुहम्मद बिन क़ासिम की सेना ने बलोचिस्तान और सिंध के इलाक़ों पर हमला किया था। उस समय वहाँ हिंदू राजा हुआ करते थे। मुहम्मद बिन क़ासिम की सेना में कुल 10 से 15 हज़ार सैनिक ही थे। इस जीत के बाद उसने हिंदुओं और बौद्धों का बड़ी संख्या में धर्मांतरण कराया। 715 ईस्वी में जब मुहम्मद बिन क़ासिम हिंदुस्तान से वापस लौटा, तब एक बार फिर से भारतीय राजाओं का क़ब्ज़ा हो गया। लेकिन तब तक जिन लोगों ने तलवार के डर से इस्लाम क़बूल लिया था, उनको न तो हिंदू और न ही बौद्ध समाज अपनाने को तैयार हुआ। समय के साथ ये सभी उन अरबी ख़लीफ़ाओं के साथ जुड़ते चले गए जिनके कारण उन्हें अपना धर्म बदलना पड़ा था। कुछ तो अरबी हमलावरों को ही अपना मसीहा भी मानने लगे। इसे हम उस मानसिकता की शुरुआत मान सकते हैं जिसके कारण कोई मुसलमान यह सोचता है कि वो अरब देशों से भारत की शिकायत कर सकता है।

आज़ादी की लड़ाई के दौरान भी शिकायत

जब अंग्रेज आए और भारतीय मुसलमानों के अंदर अपना शासन न होने के कारण सताए जाने का भाव पैदा हुआ तो एक बार फिर से उन्होंने अरब की तरफ़ ही देखा। इसका सबसे बड़ा नमूना ख़िलाफ़त आंदोलन है। साल 1920 में हुए ख़िलाफ़त की पूरी विचारधारा ही अरब से आयातित थी। तुर्की में ख़लीफ़ा को बचाने के लिए भारतीय मुसलमानों का उद्वेलित हो उठना उसी ‘अरबीकरण’ की एक और अवस्था थी। कहने को नाराज़गी ब्रिटिशराज से थी, लेकिन केरल के मोपला में 20 हज़ार से अधिक हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया गया और लगभग इतने को ही इस्लाम कबूलने के लिए मजबूर कर दिया गया था। ख़िलाफ़त आंदोलन के खलनायक और कांग्रेस नेता मोहम्मद अली जौहर ने उस दौर में अफ़ग़ानिस्तान के शाह अमानुल्ला को तार भेजा था कि वो ब्रिटिश भारत पर हमला करके इसे इस्लामी देश बना दें। इतना ही नहीं, वो अपने भाई शौक़त अली के साथ फ़रियाद लेकर सऊदी अरब के शाह अब्दुल अज़ीज़ के पास भी जा पहुँचे थे। वहाँ पर शाह ने उन्हें तीन दिन तक मिलने का समय ही नहीं दिया। चौथे दिन जब किसी तरह मुलाक़ात हुई तो उनकी बात सुनकर शाह अब्दुल अज़ीज़ ने उन्हें भरे दरबार से डांटकर भगा दिया था। यहाँ यह बताना भी ज़रूरी है कि मोहम्मद अली जौहर वही सज्जन हैं, जिनके नाम पर समाजवादी पार्टी नेता आज़म खान ने रामपुर में जौहर यूनिवर्सिटी बनवाई है।

इस्लामी सोच को पहचाने थे डॉक्टर अंबेडकर

भारतीय समाज में इस अरबी प्रभाव को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने बहुत अच्छे तरीक़े से पहचाना था। उन्होंने अपनी किताब ‘पाकिस्तान ऑर द पार्टिशन ऑफ इंडिया’ में लिखा है “भारत जब तक मुस्लिम शासक के अधीन नहीं होगा, वो दार-उल-हर्ब है। इस्लाम के अनुसार मुसलमानों को ऐसी जगह पर जिहाद करने का हुक्म है। इसके लिए वो किसी विदेशी मुस्लिम शक्ति या किसी मुस्लिम राष्ट्र से सहायता भी ले सकते हैं। ठीक इसी तरह यदि कोई मुस्लिम देश जिहाद की घोषणा करता है तो भारतीय मुसलमान भी उसमें उसकी सहायता कर सकते हैं।” यही नहीं डॉक्टर अंबेडकर ने ही इस बात को भी रेखांकित किया कि “मुसलमान भारत को अपनी मातृभूमि नहीं मानते।” जब डॉक्टर अंबेडकर यह बात कहते हैं तो समझना मुश्किल नहीं है कि उनका मतलब क्या है। वो स्पष्ट रूप से यही कह रहे हैं कि भारतीय मुसलमान अपनी मातृभूमि से ज़्यादा अरब के प्रति समर्पित है।

ज़रूरत पर काम नहीं आएँगे 57 मुस्लिम देश

आज की दुनिया में व्यावहारिकता यही है कि आप जिस देश के नागरिक हैं वही आपकी पहचान हो। अगर भारत में रहने वाला कोई व्यक्ति अमेरिकी तौर-तरीकों और बोलचाल को अपनाए तो वो हंसी का पात्र ही बनेगा। ठीक उसी तरह जब कोई भारतीय मुसलमान अरबी बनने की कोशिश करता है तो वो न सिर्फ़ मज़ाक़ का पात्र बन जाता है, बल्कि उसकी बातों का वैसे ही विरोध होता है जैसा दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जफरुल इस्लाम का हो रहा है। जफरुल इस्लाम ने अपने बयान में ‘पर्स्क्यूशन’ शब्द का भी इस्तेमाल किया है। इसका मतलब होता है एक योजनाबद्ध तरीके से किसी धार्मिक समुदाय को प्रताड़ित करना। सताए जाने का यह स्थायी भाव भी उसी अरबीकरण का एक लक्षण है। अरबीकरण के कारण ही भारतीय मुस्लिम समुदाय में यह भावना पैदा हुई है कि “हमारे तो 57 मुल्क हैं”। इसी मानसिकता के कारण हाल के दिनों में कुछ भारतीय मुसलमानों ने अरब देशों में भारत विरोधी भावनाएँ भड़काने की कोशिश की। इसी सोच के कारण कुछ भारतीय मुसलमानों ने अभियान चलाया कि लॉकडाउन के दौरान दुबई में फँसे गायक सोनू निगम को वहाँ गिरफ्तार कर लिया जाए और उनको ईशनिंदा क़ानून के तहत दंड दिया जाए। ये वो बचकानी बातें हैं जिनका समाजों पर बहुत गहरा और दीर्घकालिक असर पड़ता है।

खाड़ी का पैसा बदल रहा मुसलमानों का चेहरा

भारत से 32 लाख से अधिक मुस्लिम विदेशों में रह रहे हैं। इनमें से अधिकांश की पहली पसंद खाड़ी के देश होते हैं। 2010 में अमेरिकी प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे के अनुसार विदेशों में रह रहे भारतीयों में 27 प्रतिशत मुस्लिम हैं। जबकि भारत की कुल जनसंख्या में उनका प्रतिशत 14 के आसपास है। निश्चित रूप से इसका कारण आर्थिक है। इसी कारण बहुत सारे ग़ैर-मुस्लिम भारतीय भी खाड़ी देशों में जाते हैं। लेकिन मुसलमानों के मामले में धार्मिक कारण ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। देखा जाता है कि खाड़ी देशों में रहने वाले कई मुसलमानों पर वहाँ की जीवनशैली का गहरा असर पड़ता है। जब वो वापस आता है तो अरब देशों का शरिया कानून अपने घर परिवार और समाज में लागू करना शुरू कर देता है। आमिर खान की फ़िल्म ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ की कहानी इसी समस्या के इर्द-गिर्द है। सऊदी अरब में काम करने वाले एक पिता ने अपनी बेटी का म्यूज़िक बैंड बनाने का सपना इसलिए पूरा नहीं होने दिया, क्योंकि शरीयत इसकी मनाही करता है। यह समस्या कई मुस्लिम परिवारों में जन्म ले रही है। अगर कहें कि खाड़ी देशों का पैसा भारतीय मुसलमानों का चेहरा बदल रहा है तो इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है।

बहुत महँगा पड़ सकता है ‘उम्मा’ का झाँसा

बरसों से भारतीय मुसलमानों की एक देसी पहचान रही है, जो अब तेज़ी से बदल रही है। यह बदलाव उनके जीवन के हर क्षेत्र में है। अरबी शैली के नामों से लेकर पहनावे और खानपान तक। कुछ साल पहले तक भारत में मुस्लिम महिलाओं का पूरा चेहरा ढंकना आम चलन में नहीं था। लेकिन यह अब कई परिवारों में रोजमर्रा की बात है। छोटे शहरों में ही नहीं, महानगरों में भी हिजाब या स्कार्फ़ जैसे पहनावे का चलन बढ़ा है। यह बात हर कोई अनुभव कर सकता है। इसका सीधा संबंध उस मानसिकता से है जिसमें कोई यह सोचना शुरू कर देता है कि अरब उसके पीछे अरब है, जो हर मुश्किल में उसके साथ खड़ा रहेगा। इस्लाम की कट्टरपंथी विचारधाराओं ने भारतीय मुसलमानों को भी उम्मत या उम्मा का झाँसा दे रखा है। उम्मत वह विचार है, जिसके तहत यह जताया जाता है कि मुसलमान दुनिया में जहां कहीं भी हों वो एक इस्लामी राष्ट्र के नागरिक हैं। लेकिन इस विचार की असलियत समय-समय पर देखने को मिलती रहती है। चीन ने जब उइघुर मुसलमानों को निशाना बनाया या रूस ने चेचेन मुसलमानों को, तब उम्मत कहां गई कोई नहीं जानता। खाड़ी के इस्लामी देश भी आपस में भाईचारे के साथ रहने में अक्षम हैं। उनके बीच षड्यंत्रों और युद्धों का इतिहास कोई आज का नहीं है। खाड़ी देशों में रहने वाले मुसलमानों पर जब-जब कोई संकट आया उम्मत उनके काम न आई। उन्हें बचाने के लिए हमेशा वही देश पहुँचा, जो वास्तव में उनके पुरखों का है और जिसे कट्टरपंथियों ने दार-उल-हर्ब या काफिरों की जगह करार रखा है।

उनके लिए ‘अल हिंदी मुस्कीन’ हैं भारतीय

यह बात भी ध्यान रखने की है कि भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों को लेकर अरब देशों की राय क्या है। हो सकता है कि मोटे तौर पर कुछ मुद्दों पर लेकर उन्हें अरब का सांकेतिक समर्थन मिल जाता हो, लेकिन व्यावहारिक तौर पर अरब देशों की मानसिकता भारतीय मुसलमानों के लिए क़तई सकारात्मक नहीं मानी जा सकती। अरबी देशों के मुसलमान स्वाभाविक तौर पर ख़ुद को बेहतर नस्ल का मानते हैं। यह बहुत पुरानी बात नहीं है जब सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सुलेमान ने पाकिस्तान को “अरब का गुलाम” बोला था। प्रिंस सुलेमान ने यहाँ तक कहा था कि वो पाकिस्तान को इस्लामी देश भी नहीं मानते, क्योंकि वहाँ के मुसलमान कन्वर्टेड हैं। प्रिंस सुलेमान ही नहीं, अरब देशों में यह मानसिकता आम है। इन देशों में भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमानों को ‘अल हिंदी मुस्कीन’ कहा जाता है। जोकि एक तरह की गाली है। हालाँकि पिछले कुछ साल में भारत की बढ़ती आर्थिक और सामरिक ताक़त के चलते अरब देशों का रवैया भारतीयों के लिए काफ़ी हद तक बदला है। यानी यहाँ भी फ़ायदा भारतीयता की पहचान ही दिला रही है। यही कारण है कि जब कोई कहता है कि 130 करोड़ भारतीय हमारे अपने हैं और भौगोलिक पहचान के हिसाब से हिंदू हैं, तो इस बात में कोई विवाद नहीं ढूँढा जाना चाहिए।

वास्तव में देखें तो भारतीयता की पहचान यहाँ के मुसलमानों के लिए कई तरह से फ़ायदेमंद भी है। ये वो फ़ायदे हैं जो पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमानों को भी उपलब्ध नहीं हैं। भारतीय पासपोर्ट होने के कारण अमेरिकी और यूरोपीय देशों में उन्हें उस तरह से संदेह की नज़रों से नहीं गुजरना पड़ता जिस तरह बाक़ी दुनिया के मुसलमानों को। यह भारतीय मुसलमानों की ज़िम्मेदारी है कि वो भारतीयता की पहचान से जुड़े इस विशेषाधिकार का महत्व समझें और उसे सँभालकर रखें। यह कोई मजबूरी नहीं, बल्कि व्यावहारिकता है।

(सिंडिकेट लेख)

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