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धरती पर आज भी सशरीर मौजूद हैं हनुमान, जानिए 5 चमत्कारी प्रमाण

कलयुग में हनुमान के रूप की एक काल्पनिक तस्वीर। अक्सर हनुमानभक्तों पर वानरों का स्नेह देखने को मिलता है। इन्हें हनुमान का रूप माना जाता है।

क्या आप जानते हैं कि हिंदू शास्त्रों के अनुसार हनुमान जी आज भी सशरीर धरती पर ही वास करते हैं? दरअसल हनुमान का ये वो रहस्य है जिसका वर्णन प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। मान्यता है कि हनुमान आज भी धरती पर रहते हैं और भगवान राम की तरफ़ से मिली ज़िम्मेदारी का वहन करते हैं। इनके अनुसार भगवान राम का अवतार जब पूरा हो गया और वो वापस अपने लोक में जाने की तैयारी करने लगे तब उन्होंने हनुमान को बुलाकर कहा- “अब तुम भूलोक में रहकर शांति, प्रेम, ज्ञान और भक्ति का प्रचार करो। द्वापर युग में जब मैं कृष्ण के रूप में अवतार लूंगा तब मेरी तुमसे फिर भेंट होगी। जहां भी मेरी कथा तथा कीर्तन हो तुम वहां उपस्थित रहना और मेरे भक्तों की सहायता करते रहना।” माना जाता है कि उसके बाद से ही हनुमान अपने अदृश्य रूप में धरती पर ही हैं और वो अलग-अलग समय पर अपने सूक्ष्म रूपों में कई जगह निवास करते हैं। अब तक कई भक्तों को वो साक्षात दर्शन भी दे चुके हैं। जानते हैं आज के युग में भी हनुमान की उपस्थिति से जुड़े 5 प्रमाण। यह भी पढ़ें: जोरावर सिंह, वो योद्धा जिसने कैलाश मानसरोवर को भारत में मिलाया था

1. हर 41वें साल आते हैं हनुमान

श्रीलंका में रहने वाली एक आदिम जाति है जहां पर यह दावा किया जाता है कि हनुमान उनसे मिलने हर 41वें साल आते हैं। यह कबीला ‘मातंग’ के नाम से जाना जाता है। यहाँ के लोगों के अनुसार आख़िरी बार 27 मई 2014 को हनुमान उनसे मिलने आए थे और अब वो 41 साल बाद फिर आएँगे। दरअसल इस कबीले का इतिहास रामायण काल से जुड़ता है। यहाँ के लोग मानते हैं कि भगवान राम के स्वर्ग चले जाने के बाद हनुमानजी दक्षिण भारत के जंगलों में लौट आए थे। वहाँ से वो एक बार फिर से समुद्र पार करके लंकावासियों से मिलने गए थे। हनुमान ने तब काफ़ी समय वहाँ के जंगलों में भी बिताया था। इस दौरान मातंग समुदाय के लोगों ने उनकी काफ़ी सेवा की थी। जाते-जाते हनुमान ने वहाँ के लोगों से यह वादा किया कि वो हर 41वें साल पर उनसे मिलने ज़रूर आया करेंगे। कबीले का मुखिया हनुमान से होने वाली बातचीत को एक पुस्तिका में लिखित रूप से दर्ज भी करता है। इस रहस्यमय कबीले के लोग बाहरी लोगों से बहुत ज़्यादा मिलते-जुलते नहीं हैं। यह भी पढ़ें: हिंदू मंदिरों के निर्माण का विज्ञान, जो आज भी रहस्य है

2. हनुमान का रहस्यमय पर्वत

प्राचीन ग्रंथों के अनुसार कैलाश पर्वत के उत्तर में एक गंधमादन पर्वत है। मान्यता है कि हनुमान इस पर्वत पर सशरीर विराजमान होते हैं। कैलाश की तरह यह भी तिब्बत में पड़ता है और मौजूदा समय में यह इलाक़ा चीन के क़ब्ज़े में है। इस पर्वत तक दो रास्तों से जाया जा सकता है। पहला नेपाल के रास्ते मानसरोवर से आगे और दूसरा भूटान की पहाड़ियों से आगे। हालाँकि अभी इस पर्वत के इलाक़े तक कोई यात्रा नहीं होती। प्राचीन कथाओं के अनुसार गंधमादन पर्वत पर अनोखी जड़ी-बूटियां और फल-फूल पाए जाते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि गंधमादन पर्वत पर ही महर्षि कश्यप ने तपस्या की थी। इस पर्वत पर गंधर्व, किन्नरों, अप्सराओं और सिद्घ ऋषियों का भी निवास है। इसके शिखर पर किसी सामान्य मनुष्य का पहुँचना असंभव माना जाता है। ओड़िशा और तमिलनाडु में भी गंधमादन पर्वत होने के दावे किए जाते हैं, लेकिन उनकी कथाएँ अलग हैं। यह भी पढ़ें: देश के 7 सबसे अजूबे मंदिर, जिनके रहस्य कोई समझ नहीं पाया

तिब्बत में कैलाश पर्वत के उत्तरी क्षेत्र में गंधमादन पर्वत का अनुमानित स्थान।

3. अयोध्या में प्रकटे थे हनुमान

बृहदसंहिता के अनुसार हनुमान अयोध्या नगरी की ईशान दिशा (पूर्व दिशा और उत्तर दिशा के मध्य भाग को ईशान कोण कहते हैं) में रहते हैं। उन्हें अयोध्या नगरी का रक्षक माना जाता है। यह जगह वही है जहां पर हनुमानगढ़ी का मंदिर है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हनुमानजी जीवन्मुक्त हैं, सर्वलोकगामी हैं, वे अपनी इच्छानुसार कभी भी जाकर अपने भक्तों को दर्शन देते रहते हैं। इसका मतलब यह कि अयोध्या में स्थायी निवास के बावजूद हनुमान आवश्यकता के अनुसार पूरी धरती और तीनों लोकों में विचरण करते हैं। वो अपने रूप बदल सकते हैं और अलग-अलग रूपों में अपने भक्तों को दर्शन भी देते रहते हैं। बड़ी संख्या में ऐसे लोग मिलते हैं जिन्होंने जीवन में कभी न कभी हनुमान की इस दिव्य उपस्थिति का अनुभव किया है। 6 दिसंबर 1992 को जब राम जन्मस्थान पर बने बाबरी ढाँचे को ढहाया गया था, तब भी कई लोगों ने हनुमान के दर्शनों का अनुभव प्राप्त किया था। वहाँ मौजूद कई कारसेवकों ने बताया था कि कैसे हनुमानगढ़ी की तरफ़ से आए एक तेज़ रफ़्तार ट्रक ने बाबरी ढाँचे के चारों तरफ़ बने बैरीकेड तोड़ दिए थे। उनका कहना है कि उस ट्रक में साक्षात बजरंगबली सवार थे। यह अपने आप में रहस्य है कि उस ट्रक को कौन चला रहा था? क्योंकि इतनी स्पीड में होने के बावजूद उसके नीचे दबकर किसी कारसेवक की मौत नहीं हुई थी। यह भी पढ़ें: जानिए हज़ारों साल से क्यों अमर और अडिग है काशी

4. हनुमान मंदिरों पर वानर सेना

क्या आपने सोचा है कि हनुमान मंदिरों के आसपास वानरों की पूरी सेना क्यों रहती है? यह अपने आप में एक रहस्य है। कुछ लोग कह सकते हैं कि ऐसा इसलिए होता होगा क्योंकि लोग हनुमान मंदिरों के आसपास बंदरों को खाने-पीने की चीजें देते हैं। लेकिन यह बात एक हद तक ही ठीक है। देश में कई ऐसे दूरदराज़ के मदिर भी हैं, जहां सालभर भक्तों की भीड़ नहीं जुटती। लेकिन वानरों की भीड़ वहाँ हर समय मिलेगी। छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में ऐसे कई मंदिर हैं, जहां आबादी बहुत कम होने के बावजूद सालभर वानरों का पहरा होता है। यह भी देखा जाता है कि अगर कहीं पर रामकथा का वाचन हो तो आसपास के बंदर वहाँ पहुँचकर डेरा डाल देते हैं। मान्यता है कि बंदरों के ऐसे झुंड वास्तव में हनुमान के ही रूप होते हैं। यह भी पढ़ें: जानिए केदारनाथ को क्यों कहते हैं जागृत महादेव?

5. तुलसीदास को हनुमान दर्शन

मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस हनुमान से सुनकर ही लिखी थी। इस पुस्तक में उन्होंने कई जगहों पर ऐसी लाइनें भी लिखी हैं जिनका मतलब यह निकाला जाता है कि हनुमान उन्हें सामने बैठकर ऐसा लिखने को कह रहे हैं। उदाहरण के तौर पर चित्रकूट के घाट पर भइ संतन की भीर, तुलसीदास चंदन घिसे तिलक देत रघुबीर। कहा जाता है कि यह बात हनुमान ने कही थी, जब भगवान राम ने बाल रूप में खुद प्रकट होकर तुलसीदास को दर्शन दिए थे। उस समय तुलसीदास को पता नहीं था कि ये राम ही हैं, तो हनुमान ने उन्हें इस दोहे के माध्यम से बताया कि वो जिसे चंदन दे रहे हैं वो कोई और नहीं बल्कि भगवान राम ही हैं। तुलसीदास की कृतियों में ऐसी कई आश्चर्यजनक पंक्तियां मिलती हैं जो उस वक्त के ज्ञान और विज्ञान से काफी आगे हैं। यह भी पढ़ें: जहां था रामसेतु, वहां अब बनेगा हनुमान सेतु

6. नीमकरौली बाबा का चमत्कार

उत्तराखंड में कैंचीधाम के नीमकरौली मंदिर को हनुमान की कथा से जुड़ा एक चमत्कारी स्थान माना जाता है। दरअसल इस आश्रम की स्थापना नीमकरोली बाबा के नाम से मशहूर एक संत ने की थी। उनका वास्तविक नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा था और वो उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में जन्मे थे। कहते हैं कि वो हनुमान के अनन्य भक्त थे और हनुमानजी उन्हें दर्शन दिया करते थे। बाबा ने अपने शरीर का त्याग 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में किया था। 17वीं शताब्दी के मशहूर संत समर्थ रामदास के बारे में भी प्रसिद्ध है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में हनुमानजी का दर्शन किया था। 18वीं शताब्दी के संत त्यागराज भी राम और हनुमान के भक्त थे और उन्हें भी ईश्वर के दर्शनों का अनुभव हुआ था। छत्रपति शिवाजी भी हनुमान के बड़े भक्तों में से एक थे और माना जाता है कि उन पर हनुमान की विशेष कृपा थी। 1836 में जन्मे रामकृष्ण परमहंस के बारे में कहा जाता है कि वो हनुमान के समर्पित भक्त थे। यह भी पढ़ें: दुनिया के लिए किसी अजूबे से कम नहीं हैं ये अग्नियोगी

उत्तराखंड के कैंचीधाम में नीम करौली बाबा का मंदिर। इनसेट में नीम करौली बाबा की तस्वीर।

7. कल्कि अवतार में भावी भूमिका

कलयुग में भगवान विष्णु के भावी कल्कि अवतार के समय भी हनुमान की भूमिका बताई गई है। इसके अनुसार इस कलयुग के अंत तक हनुमान अपने शरीर में ही रहेंगे। जब कल्कि रूप में भगवान विष्णु अवतार लेंगे तब हनुमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, विश्वामित्र, विभीषण और राजा बलि सार्वजनिक रूप से प्रकट हो जाएंगे। कल्कि जब धरती से दुष्टों और पापियों का नाश करेंगे तो हनुमान का भी उन्हें सहयोग मिलेगा। इसके बाद धरती पर सतयुग की स्थापना होगी और हनुमान ब्रह्म रूप में विलीन हो जाएँगे। यह भी पढ़ें: प्रेरक कहानी, राजा किसान और रास्ते का पत्थर

(न्यूजलूज़ धर्म टीम)

 

 

 

 

 

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