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संतों की हत्या पर अर्णब गोस्वामी ने क्यों कहा- रिपोर्ट इटली भेजेंगी सोनिया गांधी

महाराष्ट्र के पालघर में संत कल्पवृक्ष गिरी, सुशील गिरी और उनके ड्राइवर की हत्या का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। रिपब्लिक चैनल ने जब इस मामले को उठाने की कोशिश की और हत्याकांड में ईसाई मिशनरियों के हाथ की तरफ़ इशारा किया तो उसके संपादक अर्णब गोस्वामी पर हमला हुआ है। आरोप है कि हमलावर युवा कांग्रेस के सदस्य थे। अर्णब गोस्वामी ने एक दिन पहले ही अपने कार्यक्रम में हत्याकांड के लिए सीधे तौर पर सोनिया गांधी को जवाबदेह ठहराया था। उन्होंने पूछा था कि बटला हाउस एनकाउंटर और तबरेज नाम के चोर की मौत पर कई दिन तक हंगामा करने वाली सोनिया गांधी इस मामले पर चुप क्यों हैं? अर्णब गोस्वामी ने यह भी बोला कि “सोनिया गांधी उर्फ़ एंतोनिया माइनो इस घटना की रिपोर्ट इटली भेजेंगी और बोलेंगी कि देखो जहां पर मेरी सरकार बनी वहाँ पर मैंने हिंदुओं के साथ ये काम किया। इससे उन्हें वाहवाही मिलेगी।” यह बात भले ही तंज जैसी लग रही है, लेकिन काफ़ी गहरी है। आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियों में हमारे सूत्रों के अनुसार भारत में ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ सोनिया गांधी की देखरेख में ही चलती हैं। पालघर हत्याकांड का कनेक्शन भी इसी धर्मांतरण नेटवर्क के साथ जुड़ रहा है। यह भी पढ़ें: महाराष्ट्र में पुलिस के आगे साधुओं की हत्या, मॉब लिंचिंग का दिया नाम

सरकार बनते ही धर्मांतरण शुरू

महाराष्ट्र का पालघर-डहाणु के इलाक़े में बड़ी संख्या में जनजातीय लोग रहते हैं। ये लोग अपनी परंपराओं के हिसाब से चलते हैं। लेकिन 2010 के आसपास महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार की शह पर यहाँ एक के बाद एक ईसाई मिशनरियाँ सक्रिय होनी शुरू हुईं। देखते ही देखते कई चर्च भी खड़े हो गए। बीजेपी की सरकार आने के बाद ये काम कुछ कम हुआ था, लेकिन 2019 में जैसे ही उद्धव ठाकरे के नाम पर कांग्रेस दोबारा सत्ता में आई उसने यहाँ पर ईसाई मिशनरियों को एक बार फिर से सक्रिय कर दिया। दुनिया भर में ईसाई धर्मांतरण की रिपोर्ट वेटिकन सिटी को भेजी जाती है जो वास्तव में इटली के अंदर ही है। यह बात कई बार सामने आ चुकी है कि सोनिया गांधी ही भारत में ईसाई धर्मांतरण की धुरी हैं। महाराष्ट्र ही नहीं, कांग्रेस जिन-जिन राज्यों में सत्ता में आई वहाँ पर ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ अचानक कई गुना बढ़ जाती हैं। आगे हम आपको बताएँगे सोनिया गांधी के वो काम, जिनके कारण अर्णब गोस्वामी ने इटली रिपोर्ट भेजने वाली बात कही। यह भी पढ़ें: एक श्राप जो राहुल गांधी को कभी पीएम नहीं बनने देगा

सोनिया गांधी का ‘सीक्रेट मिशन’

सोनिया गांधी के कार्यकलापों पर नज़र डालें तो समझ में आ जाता है कि वो वास्तव में किस मिशन पर जुटी हैं। राजीव गांधी की हत्या तक सोनिया की पकड़ सिस्टम पर उतनी मज़बूत नहीं थी। उसके बाद पीवी नरसिंहराव आ गए जो सोनिया गांधी को नज़रअंदाज़ करके अपना काम करते रहे। 1999 से 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री रहे और इस दौरान भी सोनिया एक तरह से लाचार रहीं। लेकिन 2004 में दिल्ली की सत्ता हाथ आते ही सोनिया ने वो मिशन शुरू कर दिया जिसके इंतज़ार में वो तब से थीं, जब से भारत आईं। 2005 में सोनिया गांधी के दबाव में मनमोहन सरकार ने संविधान में 93वां संशोधन किया। इस संशोधन का मतलब था कि सरकार किसी हिंदू के शिक्षा संस्थान को कब्जे में ले सकती है, लेकिन अल्पसंख्यकों और हिंदुओं की अनुसूचित जाति और जनजाति के संस्थानों को छू भी नहीं सकती। दलितों और आदिवासियों को हिंदू धर्म से अलग करने की सोनिया गांधी की ये सबसे बड़ी चाल थी। इसका असर यह हुआ कि किसी हिंदू के लिए शिक्षण संस्थान चलाना बहुत कठिन हो गया। चर्च की सलाह पर ही 2009 में सोनिया ने शिक्षा के अधिकार का कानून बनवाया। इसके जरिए आम शिक्षण संस्थानों में 25 फीसदी गरीब छात्रों को दाखिला देना जरूरी कर दिया गया, जबकि अल्पसंख्यक संस्थानों पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। यहां तक कि उन्हें अनुसूचित जाति और जनजातियों को आरक्षण देने से भी छूट दे दी गई। यह भी पढ़ें: हिंदू धर्म के ख़ात्मे के लिए सोनिया गांधी का गेमप्लान

सोनिया के दांव का घातक असर

पहले संविधान का 93वां संशोधन और फिर शिक्षा के अधिकार (RTE) के कानून के चलते ईसाई और मुस्लिमों के लिए शैक्षिक संस्थान चलाना बहुत सस्ता हो गया। दूसरी तरफ हिंदुओं के शिक्षण संस्थान बंद होने लगे। कर्नाटक में लिंगायत समुदाय के लोगों के कई मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज चलते हैं। उनके आगे जब संकट खड़ा हुआ तो उन्होंने लिंगायत को हिंदुओं से अलग धर्म की मान्यता देने की मांग शुरू कर दी। ऐसी ही मांग साईं भक्त समुदाय से भी उठने लगी। दरअसल ये सोनिया गांधी का दांव था जिससे देखते ही देखते हिंदू धर्म के अलग-अलग समुदाय खुद को अलग धर्म का दर्जा देने की मांग करने लगे। प्लान तो यहां तक था कि आगे चलकर कबीरपंथी, नाथ संप्रदाय, वैष्णव जैसे समुदायों को भी अलग धर्म की मान्यता देने की मांग को हवा दी जाए। इसी तरह के दांव से आजादी के समय कांग्रेस ने जैन, सिख और बौद्धों को हिंदू धर्म से अलग किया था। यह भी पढ़ें: हमेशा से हिंदू विरोधी है कांग्रेस, जानें 10 सबूत

दरअसल 2004 के बाद से सोनिया गांधी के इशारे पर कांग्रेस की सरकारों ने ऐसे कई फ़ैसले लिए जो वास्तव में हिंदू धर्म की रीढ़ पर हमला थे। हैरानी की बात यह रही कि इन सभी में मीडिया ने कांग्रेस को पूरा सहयोग किया।

राम सेतु पर हलफनामा: 2007 में कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि चूंकि राम, सीता, हनुमान और वाल्मीकि वगैरह काल्पनिक किरदार हैं इसलिए रामसेतु का कोई धार्मिक महत्व नहीं माना जा सकता है। जब बीजेपी ने इस मामले को जोरशोर से उठाया तब जाकर मनमोहन सरकार को पैर वापस खींचने पड़े।

हिंदू आतंकवाद शब्द गढ़ा: इससे पहले हिंदू के साथ आतंकवाद शब्द कभी इस्तेमाल नहीं होता था। मालेगांव और समझौता ट्रेन धमाकों के बाद कांग्रेस सरकारों ने बहुत गहरी साजिश के तहत हिंदू संगठनों को इस धमाके में लपेटा और यह जताया कि देश में हिंदू आतंकवाद का खतरा मंडरा रहा है। जबकि ऐसा कुछ था ही नहीं। कोर्ट में कांग्रेस की इन साजिशों की धज्जियां उड़ चुकी हैं।

सेना में फूट डालने की कोशिश: सोनिया गांधी के वक्त में भारतीय सेना को जाति और धर्म में बांटने की बड़ी कोशिश हुई थी। तब सच्चर कमेटी की सिफारिश के आधार पर सेना में मुसलमानों पर सर्वे की बात कही गई थी। बीजेपी के विरोध के बाद मामला दब गया, लेकिन इसे देश की सेनाओं को तोड़ने की गंभीर कोशिश के तौर पर आज भी देखा जाता है।

चर्च को सरकारी मदद: यह बात कम लोगों को पता होगी कि जहां कहीं भी कांग्रेस की सरकार बनती है वहाँ पर चर्च को सीधे सरकार से आर्थिक मदद पहुँचाई जाती है। इसका खुलासा कर्नाटक में RTI से हुआ था, जहां सिद्धारमैया सरकार ने चर्च को मरम्मत और रखरखाव के नाम पर करोड़ों रुपये बांटे थे। (पढ़ें रिपोर्ट)

शंकराचार्य को गिरफ्तार कराया: 2004 में कांग्रेस ने सत्ता में आते ही कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को दिवाली की रात गिरफ्तार कराया था। तब इसे तमिलनाडु की तत्कालीन जयललिता सरकार का काम माना गया था। लेकिन बाद में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब में इस घटना का ज़िक्र किया, जिससे यह पता चला कि वास्तव में ये खेल केंद्र सरकार की तरफ़ से रचा गया था। शंकराचार्य धर्मांतरण में ईसाई मिशनरियों के लिए रोड़ा बन रहे थे। लिहाज़ा कांग्रेस ने उन्हें फँसाया था। (पढ़ें रिपोर्ट)

केंद्रीय विद्यालय की प्रार्थना पर एतराज़: ये 2019 का मामला है जब एक वकील के ज़रिए केंद्रीय विद्यालयों में होने वाली प्रार्थना के तौर पर ‘असतो मा सदगमय’ को बदलवाने की अर्ज़ी कोर्ट में दाखिल की गई थी। दावा किया जाता है कि इसके पीछे सोनिया गांधी का ही दिमाग़ था। 2014 से पहले अपने कार्यकाल में भी उन्होंने इसकी कोशिश की थी लेकिन कामयाब नहीं हो पाई थीं। (पढ़ें रिपोर्ट)

देखें अर्णब गोस्वामी का वो वीडियो, जिसमें उन्होंने ख़ुद पर हमले की जानकारी दी।

(न्यूज़लूज़ टीम)

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