Home » Loose Top » क्या अमेरिका को देने से भारत में HCQ दवा की कमी हो जाएगी?
Loose Top

क्या अमेरिका को देने से भारत में HCQ दवा की कमी हो जाएगी?

सरकार पहले ही साफ़ कर चुकी है भारत अपनी ज़रूरत की दवा का स्टॉक बनाए रखेगा।

भारत ने अमेरिका, इज़राइल समेत कई देशों को कुनैन की दवा के नाम से मशहूर हाइड्रोक्लोरोक्वीन (HCQ) और पैरासिटामॉल का निर्यात शुरू कर दिया है। पिछले तीन दिन में इस दवा की 20 से ज्यादा खेप अलग-अलग देशों में रवाना की गई है। कुछ लोग यह चिंता जता रहे हैं कि अगर आगे चलकर भारत में कोरोना वायरस की स्थिति गंभीर हो जाती है तो कहीं ऐसा न हो कि हमारे पास ही यह दवा न बचे। दवा उद्योग के जानकार इस आशंका को गलत बता रहे हैं। उनके मुताबिक महामारी फैलने की खबर आने के बाद जनवरी में ही भारत सरकार ने इस दवा के एक्सपोर्ट पर पाबंदी लगा रखी है। लिहाजा भारी मात्रा में इसका स्टॉक मौजूद है। साथ ही दवा कंपनियां इसके उत्पादन को लगातार जारी रखे हुए हैं। दवा कंपनियों ने सरकार को भरोसा दिलाया है कि वो हर समय अपने पास कम से कम 10 करोड़ टेबलेट्स का सुरक्षित स्टॉक रखेंगी। भारतीय दवा निर्माता संघ (IDMA) के अनुसार भारतीय कंपनियां एक महीने में 20 करोड़ HCQ गोलियां बनाने की क्षमता रखती हैं। इसमें इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल (रॉ मैटीरियल) भी भारत में पूरी तरह से उपलब्ध है। यह अफवाह उड़ाई गई थी कि कच्चा माल चीन से आता है।

ज़रूरत के लिए पर्याप्त है दवा

भारत में IPCA लैब्स, एलेंबिक, टोरेंट, वालेस फार्मा और ज़ाइडस कैडिला हाइड्रोक्लोरोक्वीन बनाने वाली कुछ सबसे बड़ी कंपनियां हैं। IPCA ही इसका रॉ मैटीरियल भी बनाती है। भारत ही नहीं विदेशों में भी HCQ बनाने वाली कंपनियां IPCA से कच्चा माल लेती हैं। भारत में हर महीने 20 करोड़ HCQ की गोलियां बनाने की क्षमता है, लेकिन इनकी खपत सिर्फ 5 से 6 करोड़ के बीच में है, वो भी पीक सीजन में। बारिश में जब मलेरिया का सीजन आता है तब यह दवा अधिक बिकती है। इस हिसाब से भारत की जरूरत के लिए 10 करोड़ गोलियां होना पर्याप्त माना जाता है। कोरोना वायरस के एक मरीज के इलाज में 5 से 6 दिन लगते हैं। अगर एक दिन में 2 गोली खाई जाएं तो 10 लाख मरीजों पर 2.1 करोड़ गोली की जरूरत होगी। अब तक के प्रचार से लोगों को लग रहा है कि ये कोरोना वायरस की कोई रामबाण दवा है, लेकिन ऐसा नहीं है। डॉक्टर लगातार कह रहे हैं कि HCQ एहितायत के तौर पर सिर्फ मेडिकल स्टाफ को दी जानी चाहिए। आम मरीजों को इसे देने के खतरनाक परिणाम हो सकते हैं।

अमेरिका इतना उतावला क्यों है?

अमेरिका ने हाइड्रोक्लोरोक्वीन के लिए जिस तरह की उतावली दिखाई उससे कई लोग हैरान हैं। यह सवाल उठ रहा है कि जब यह दवा है ही नहीं तो अमेरिका इतना परेशान क्यों है। दरअसल इसका कारण है इटली का अनुभव। इटली में पिछले एक महीने के दौरान इलाज कर रहे डॉक्टरों, नर्सों और दूसरे मेडिकल स्टाफ़ की बड़ी संख्या में मौत हुई है। हालत ये है कि इटली में डॉक्टरों और नर्सों की कमी पैदा हो गई है। अब जब ये वायरस अमेरिका को चपेट में ले चुका है अमेरिका नहीं चाहता कि यह स्थिति उसके यहाँ पैदा हो। सितंबर तक कोरोना वायरस की दवा आ जाने की भी उम्मीद है। अमेरिका फ़िलहाल उस पर फ़ोकस करना चाहता है और साथ ही बीच के छह महीनों के लिए इंतज़ाम रखना चाहता है। लिहाज़ा उसने भारत से मदद माँगी। बदले में उसने भारतीय दवा कंपनियों पर लगी तरह-तरह की पाबंदियाँ हटानी शुरू कर दी हैं। यह भी पढ़ें: जानिए अमेरिका को दवा देने के बदले में भारत को क्या फ़ायदा हुआ?

कितने काम की हाइड्रोक्लोरोक्वीन?

सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि यह दवा वास्तव में मलेरिया में इस्तेमाल होती है। हृदय रोग वालों के लिए यह दवा नुक़सानदेह भी साबित हो सकती है। फिर ऐसा क्यों है कि कोविड 19 को लेकर अचानक इस दवा में पूरी दुनिया की दिलचस्पी जाग उठी। दरअसल इसके पीछे अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मार्सेली (University of Marseille) के डॉक्टर डीडियर रौल्ट (Didier Raoult) का अध्ययन है। जिन्होंने दावा किया था कि हाइड्रोक्लोरोक्वीन से शरीर में इन्फेक्शन के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है। उनका ये अध्ययन International Journal of Antimicrobial Agents में छपा भी। इसके बाद ही दुनिया भर में इस दवा की खोज शुरू हुई। तब पता चला कि भारत में यह दवा बड़े पैमाने पर बनती है, क्योंकि यहां पर मलेरिया एक बड़ी समस्या है। हालांकि यह स्टडी भी कई सवालों के घेरे में है। कई वैज्ञानिक इसे सही नहीं मान रहे हैं, क्योंकि इसको लेकर कोई ट्रायल नहीं हुआ है। इसके असर पर अभी दो ट्रायल चल रहे हैं। एक तो WHO का ट्रायल है, जिसमें भारत समेत कई देश शामिल हैं। दूसरा ट्रायल बिल एंड मेलिंडा गेट्स ट्रस्ट, वेलकम ट्रस्ट और मास्टरकार्ड की तरफ से संयुक्त रूप से कराया जा रहा है। दोनों ट्रायलों के परिणाम अप्रैल के अंत या मई की शुरुआत में आने की उम्मीद है। इसके बाद भी यह तय है कि हाइड्रोक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल मरीजों पर नहीं, बल्कि डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के लिए ही होगा। जिसके लिए भारत के पास जरूरत से भी अधिक स्टॉक है और अगर भविष्य में जरूरत बढ़ती है तो उसके लिए उत्पादन की पूरी क्षमता भी है। यह भी पढ़ें: 70 साल में मलेरिया खत्म नहीं कर पाने का क्रेडिट चाहती है कांग्रेस

विपक्ष के आरोपों के कारण फैला भ्रम

दरअसल कांग्रेस, वामपंथी दलों और मीडिया के एक तबके ने इस बारे में ग़लतफ़हमी पैदा करने की पूरी कोशिश की। ऐसी ख़बरें उड़ाई गईं कि अगर भारत ने अमेरिका या किसी दूसरे देश को यह दवा बेची तो भारत में इसकी कमी हो जाएगी। जबकि तथ्य इसके बिल्कुल उलट हैं। ऐसी ख़बरें भी छपवाई गईं कि भारत में दवाओं में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल चीन से आता है। माना जाता है कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ रही इस करीबी से चीन और उससे जुड़ी ताक़तें चिंतित है। यही कारण है कि आए दिन अफ़वाहें फैलाने की कोशिश हो रही है ताकि आम लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हो सके।

(न्यूज़लूज़ टीम)

एक अपील: न्यूज़लूज़ के जरिए हम राष्ट्रवादी पत्रकारिता को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। इस वेबसाइट पर होने वाला खर्च बहुत ज्यादा है और हमारी आमदनी काफी कम। हम अपने काम को जारी रख सकें इसके लिए हमें आर्थिक मदद की जरूरत है। ये हमारे लिए ऑक्सीजन का काम करेगी। डोनेट करने के लिए क्लिक करें:

कृपया लेख कॉपी-पेस्ट न करें। कई लोग पोस्ट कॉपी करके फेसबुक और व्हाट्सएप पर शेयर कर देते हैं, जिससे वेबसाइट की आमदनी काफी कम हो गई है। राष्ट्रवाद की विचारधारा पर आधारित यह वेबसाइट बंद हो जाएगी तो क्या आपको खुशी होगी? कृपया खबरों का लिंक शेयर करें।

comments

Polls

क्या नरेंद्र मोदी सरकार इसी कार्यकाल में जनसंख्या कानून लाएगी?

View Results

Loading ... Loading ...
Don`t copy text!