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70 साल में मलेरिया ख़त्म नहीं करने का क्रेडिट चाहती है कांग्रेस!

देश में कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ चल रही लड़ाई के बीच भी कांग्रेस पार्टी लगता है अपनी राजनीति चमकाने में जुटी है। इसी चक्कर में मध्य प्रदेश कांग्रेस ने एक ट्वीट किया है, जिसमें दावा किया गया है कि आज अगर पूरी दुनिया भारत से मलेरिया की दवाई मांग रही है तो इसका श्रेय 70 साल के कांग्रेस शासन को जाता है। दरअसल इसी बहाने कांग्रेस ने अपनी एक बड़ी नाकाम को भी कबूल लिया है। दरअसल देश की आजादी के पहले से ही मलेरिया भारत की सबसे जानलेवा बीमारियों में से एक है। हर साल इससे लाखों लोगों की मौत होती थी। लेकिन आजादी के बाद भी कांग्रेस की सरकारों ने इसके खात्मे पर कुछ खास जोर नहीं दिया। नतीजा यह कि आज भी हर साल लाखों की संख्या में लोग मलेरिया के कारण मरते हैं। यही कारण है कि भारत में मलेरिया की दवा हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वाइन (HCQ) का उत्पादन आज भी होता है। कुनैन वाली दवाई के नाम से मशहूर यह दवा दुनिया के कई देशों में बंद हो चुकी है, क्योंकि वहां मलेरिया का लगभग पूरी तरह से खात्मा हो चुका है।

कांग्रेस ने क़बूली अपनी नाकामी

मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम कांग्रेस की दुखती रगों में से एक है। आजादी के क़रीब 10 साल बाद 1958 में पहली बार राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम (National Malaria Eradication Programme) लॉन्च किया गया था। जबकि इससे हर साल लाखों लोग मरते थे। शुरू में इस कार्यक्रम के चलते भारत में मलेरिया में भारी कमी आई। 1965 में मात्र एक लाख लोगों को इस बीमारी का संक्रमण हुआ और किसी की भी मृत्यु इससे नहीं हुई। इसके बाद माना गया कि मलेरिया के खिलाफ युद्ध में भारत ने जीत हासिल कर ली है। लेकिन असली कारण कुछ और ही था। दरअसल 1960 के बाद मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के तहत देशभर में जगह-जगह जमकर डीडीटी नाम के कीटनाशक (Dichlorodiphenyltrichloroethane DDT) का छिड़काव कराया गया। इसका नतीजा हुआ कि मलेरिया प्रभावित इलाकों में मच्छरों की संख्या में भारी गिरावट आई और बीमारी पर भी लगाम लगी। लेकिन 1970 के दशक की शुरुआत में ही मलेरिया के मच्छरों ने डीडीटी के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली। 1975 में मलेरिया ने जोरदार वापसी की और लगभग 65 लाख लोग इसकी चपेट में आए। चूंकि मलेरिया की दवा बना ली गई थी, इसलिए इसका इलाज होने लगा। लेकिन इसका संक्रमण जारी रहा। इसके बाद कभी इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए गए। जबकि इसी दौरान दुनिया के कई देश पूरी तरह से मलेरिया मुक्त होने में सफल हुए।

2015 में दोबारा अभियान शुरू

1958 के बाद दूसरी गंभीर कोशिश नवंबर 2015 में शुरू हुई, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्ष्य रखा कि 2027 तक देश से मलेरिया को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया जाएगा। इसके लिए भारत ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 17 देशों के साथ मिलकर एक रोडमैप तैयार किया गया है। टीकाकरण और दूसरे आधुनिक तौर-तरीकों से मलेरिया के सफ़ाये का काम शुरू किया गया है। 2017 के सरकारी आँकड़ों के अनुसार भारत में मलेरिया के कुल 842,095 केस रिपोर्ट हुए, जिनमें 104 लोगों की मौत हुई। हालाँकि WHO का दावा है कि मरने वालों की वास्तविक संख्या इससे काफी अधिक है। हालांकि इस संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। साल 2018 और 2019 में मलेरिया के मामलों में भारी गिरावट देखी जा रही है। भारत में मलेरिया के 70 फीसदी मामले सिर्फ 5 राज्यों से आते हैं। ये राज्य हैं- ओडिशा (36 फीसदी), छत्तीसगढ़ (12 फीसदी), झारखंड (9 फीसदी), मध्य प्रदेश (9 फीसदी) और महाराष्ट्र (5 फीसदी)। इनके अलावा उत्तर-पूर्व के राज्यों में भी समस्या बेहद गंभीर है। हालांकि धीरे-धीरे हालात पर काबू पाया जा रहा है।

नीचे आप कांग्रेस का वो ट्वीट देख सकते हैं, जिसमें उसने मलेरिया की दवा बनाने का क्रेडिट लेने की कोशिश की है।

भारत में मलेरिया का इतिहास

भारत में ब्रिटिश सेना के डॉक्टर रोनॉल्ड रॉस ने इस पर काफ़ी काम किया था। उन्होंने 1897 में यह पता लगाया था कि यह बीमारी मच्छरों के काटने से फैलती है। इसके बाद ही मलेरिया से बचने और इसकी दवा ढूँढने के काम शुरू हुए थे। 1935 में भारत में क़रीब एक करोड़ लोगों को इसके संक्रमण ने अपनी चपेट में लिया था, जिनमें से 10 लाख लोगों की जान जाने का अनुमान जताया जाता है। इसके बाद के सालों में भी भारत में हर साल लाखों लोगों की मौत मलेरिया से होती रही। अंग्रेजों के जाने और आज़ादी के बाद भी सरकार ने मलेरिया को कभी गंभीरता से नहीं लिया और इसकी रोकथाम के लिए कोई रणनीति नहीं बनाई गई।

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