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धरती से इंसानों के ख़त्म होने का कारण बन सकते हैं चमगादड़!

क्या चमगादड़ों के कारण धरती से इंसानों का सफ़ाया हो सकता है? दुनिया भर में इन दिनों इस बात पर चर्चा चल रही है कि चमगादड़ किस तरह से हर साल बड़ी संख्या में लोगों की मौत का कारण बन रहे हैं। इंसानों ही नहीं, बल्कि जानवरों की कई नस्लों के लिए भी चमगादड़ ख़तरा पैदा कर रहे हैं। दरअसल यह बात शुरू हुई है चीन में फैली कोरोनावायरल महामारी से। माना जा रहा है कि ये बीमारी इंसानों में चमगादड़ों से ही आई है। शुरुआती जाँच में इस बात की पुष्टि हुई है कि कोरोनावायरस चीन में आम तौर पर पाए जाने वाले हॉर्सशू प्रजाति के चमगादड़ों से शुरू हुआ है। चमगादड़ों से ये वायरस सुअर, भेड़, बकरी, गाय, पैंगोलिन और मुर्ग़ी जैसे जानवरों में पहुँच जाता है। जिन्हें खाने से इंसानों में इसके पहुँचने का ख़तरा रहता है। चीन में ये बीमारी ज़्यादा तेज़ी से फैली क्योंकि वहाँ पर कुछ इलाक़ों में लोग सीधे चमगादड़ों को भी खाते हैं। चीन के वुहान प्रांत में जो शुरुआती 99 मरीज़ पाए गए उनमें से 49 ऐसे थे ऐसे बाज़ारों से मांस ख़रीदा था जहां इसे खुला हुआ बेचा जाता है। इसमें खाने के लिए बेचे जा रहे चमगादड़ भी शामिल थे।

चमगादड़ मानवता के लिए ख़तरा कैसे?

कोरोनावायरस का इलाज अभी तक ढूँढा नहीं जा सका है। चीन से जो अपुष्ट जानकारियाँ सामने आ रही हैं उनके मुताबिक़ अब तक 25 हज़ार के क़रीब लोग इसके कारण मौत के घाट उतर चुके हैं। बीमारी की फैलने की रफ़्तार इतनी अधिक है कि चीन के अधिकारियों के लिए इसे नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा है। इसके कारण प्रभावित इलाक़ों में करोड़ों लोगों को उनके घरों में बंद कर दिया गया है। सार्वजनिक स्थानों पर सन्नाटा छाया हुआ है और काम-धंधे सब पूरी तरह से ठप हैं। कहा जा रहा है कि अगर बीमारी जल्द क़ाबू नहीं हुई तो चीन में इसके कारण महज़ कुछ दिन में लाखों लोगों की मौत हो सकती है। दरअसल कोरोनावायरस पहला मामला नहीं है। इससे पहले 2002 में सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम यानी सार्स (SARS) नाम की महामारी फैली थी, उसके पीछे भी चमगादड़ ही थे। सार्स के कारण दुनिया भर में 774 लोगों की जान गई थी। यह खुशकिस्मती थी कि इसकी दवा समय रहते ढूंढ ली गई थी। वैज्ञानिक यह सोचकर परेशान हैं कि अगर ऐसी किसी महामारी की दवा नहीं बन पाई तो क्या होगा?

ख़तरनाक विषाणुओं का घर चमगादड़

पाया गया है कि चमगादड़ों में अकेले कोरोनावायरस की 200 से ज़्यादा क़िस्में पाई जाती हैं। यानी ऐसी दवाएँ ढूँढनी होंगी जो इन सभी 200 प्रकार के विषाणु को ख़त्म कर सकें। चमगादड़ ऐसे कई विषाणुओं के प्राकृतिक वाहक होते हैं। उनमें मरबर्ग, हेंड्रा, निपाह, इबोला और रेबीज़ जैसे ख़तरनाक वायरस भी पाए जाते हैं। केरल में कुछ साल पहले निपाह वायरस फैला था। उसमें भी केले के पेड़ों पर घर बनाने वाले चमगादड़ों को ज़िम्मेदार पाया गया था। चमगादड़ों की ख़ुद की प्रतिरोधक क्षमता बहुत अधिक होती है। इन विषाणुओं से उनको कोई नुक़सान नहीं होता है। अंटार्कटिका को छोड़ दें तो चमगादड़ धरती के हर इलाक़े में पाए जाते हैं। ये जंगलों और ख़ाली पड़े मकानों या पुरानी इमारतों में रहते हैं, जिससे इंसानों और जानवरों के साथ जल्दी संपर्क में आते हैं। एक चमगादड़ का जीवन 20 से लेकर 40 साल तक होता है। आकार में छोटा होने के बावजूद एक अकेला चमगादड़ अपने जैसे ढेरों स्तनधारी जीवों में अपने वायरस पहुँचा सकता है।

चीन के वुहान के एक रेस्टोरेंट की ये तस्वीर दुनिया भर में सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। इस तस्वीर में एक लड़की चमगादड़ का सूप पीती देखी जा सकती है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि चमगादड़ों पर पाए जाने वाले ख़तरनाक विषाणु अपना रूपरंग बदलते रहते हैं। अब तक इनमें जो भी बदलाव हुए उनका इलाज मेडिकल साइंस ने समय रहते ढूँढ निकाला। इसके अलावा ज़्यादातर वायरस एक ख़ास तापमान में ही सक्रिय रहते हैं। जैसे कि कोरोनावायरस 30 डिग्री के आसपास निष्क्रिय होने लगता है। गर्म इलाक़ों में इसके फैलने का ख़तरा नहीं है। लेकिन अगर किसी दिन कोई ऐसा वायरस आ गया जिसका इलाज नहीं ढूँढा जा सका और उसमें सारे तापमान में ख़ुद को सुरक्षित रखने की क्षमता भी हो तब क्या होगा उसकी सिर्फ़ कल्पना ही की जा सकती है। यही कारण है कि दुनिया के कई शोधकर्ता अभी से कहने लगे हैं कि चमगादड़ों से इंसान जितना दूर ही रहे अच्छा है।

(न्यूज़लूज़ टीम)

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