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जानिए कन्हैया पर देशद्रोह केस की छूट के पीछे क्या है बिहार कनेक्शन?

जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार के ख़िलाफ़ देशद्रोह का केस चलाने की मंज़ूरी दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने दे दी है। क़रीब दो साल से इस मामले की फाइल दिल्ली सरकार ने अटका रखी थी और इस कारण देशभर में चर्चित हुए इस केस का मुक़दमा नहीं चल पा रहा था। यह सवाल उठ रहा है कि आख़िर अब जाकर ही केजरीवाल सरकार ने इसकी मंज़ूरी क्यों दी? क्योंकि अगर बात सिर्फ़ राजनीतिक फ़ायदे की थी तो वो यह काम दिल्ली चुनाव से पहले करके राजनीतिक फ़ायदा पा सकती थी। क्योंकि यही एक मामला था जिस पर दिल्ली चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी के नेताओं को जवाब देते नहीं बन रहा था। जहां तक मुस्लिम वोटों का मामला था कन्हैया के खिलाफ केस चलने की इजाज़त देने से उस पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि शाहीन बाग को लेकर पहले ही काफी ध्रुवीकरण हो चुका था। दरअसल इसके पीछे का खेल इससे काफ़ी बड़ा है। आम आदमी पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक “केजरीवाल की नज़र अब बिहार चुनाव पर है। साथ ही साथ उन्होंने एक तीर से दो शिकार कर लिए। क्योंकि दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में जिस तरह से आम आदमी पार्टी के नेताओं की भूमिका सामने आ रही है उन्होंने देश का ध्यान इस ओर से भटका दिया। 2016 के फरवरी महीने में जेएनयू में एक कार्यक्रम में देशद्रोही नारे लगे थे, कन्हैया उस कार्यक्रम का आयोजक था।

प्रशांत किशोर के कहने पर हुआ फ़ैसला

न्यूज़लूज़ को यह पक्की जानकारी मिली है कि कन्हैया कुमार के ख़िलाफ़ केस चलाने की छूट का फ़ैसला कुछ दिन पहले ही हो गया था। पार्टी के लिए रणनीतिकार का काम कर रहे प्रशांत किशोर ने केजरीवाल को सुझाव दिया था कि अगर वो फाइल क्लियर कर दी जाए तो बिहार चुनाव में उतरना आसान रहेगा। दरअसल प्रशांत किशोर और अरविंद केजरीवाल आपस में मिलकर बिहार चुनाव में दांव आज़माने की सोच रहे हैं। प्रशांत किशोर इस बारे में खुलकर संकेत दे चुके हैं कि वो केजरीवाल के साथ मिलकर बिहार में तीसरा मोर्चा खड़ा कर सकते हैं। बिहार में वोटरों के मिजाज़ को देखते हुए फैसला हुआ है कि कन्हैया से दूरी बनाकर रखी जाए। क्योंकि बिहार में कन्हैया के साथ नाम जुड़ने पर राजनीतिक तौर पर ज्यादा नुकसान हो सकता है। पिछले कुछ दिनों से कन्हैया बिहार में यात्रा निकाल रहा है। इस दौरान मीडिया ने उसे हीरो बनाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन जगह-जगह उस पर हमले हुए। इस बात से केजरीवाल और पीके की जोड़ी को अंदाजा हो गया है कि कन्हैया के खिलाफ बिहार में किस कदर गुस्सा है।

दिल्ली हिंदू नरसंहार से ध्यान भटका दिया

कन्हैया पर केस चलाने की अनुमति की केजरीवाल सरकार की टाइमिंग कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। क्योंकि इस समय दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में आम आदमी पार्टी बुरी तरह से फँसी हुई है। पार्टी के बड़े नेताओं पर दंगे में शामिल के आरोप लग रहे हैं। ऐसे समय में केजरीवाल ने कन्हैया की फाइल को मंज़ूरी देकर अपनी विश्वसनीयता को बहाल करने की कोशिश की है। क्योंकि मीडिया को इसी बहाने कन्हैया की ख़बर को प्राथमिकता देने का बहाना मिल गया। धीरे-धीरे दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों की ख़बर पूरी तरह से ग़ायब कर दी जाएगी, ताकि इसे बिहार चुनाव में मुद्दा न बनने दिया जाए। क्योंकि बिहार में इस मामले पर अगर राजनीति हुई तो केजरीवाल को महँगी पड़ सकती है। यह केजरीवाल का दांव बिहार में अगड़ी जाति के हिंदू वोटरों को काटने का है, ताकि बीजेपी को नुक़सान पहुँचाया जा सके। जहां तक मुस्लिम वोटरों का सवाल है केजरीवाल को पूरा भरोसा है कि बिहार में वो एक मज़बूत विकल्प बनकर सामने आएँगे क्योंकि ताहिर हुसैन के मामले से मुसलमान समुदाय में एक अलग तरह का मैसेज गया है।

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