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पुलिस अंडर में नहीं तो पुलिस की मीटिंग में क्या करने गए केजरीवाल?

दिल्ली में हिंसा को लेकर उच्चस्तरीय बैठक की ये तस्वीर सोशल मीडिया पर चर्चा में है। इस बैठक में गृह मंत्री अमित शाह के साथ दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हिस्सा ले रहे हैं। उनके अलावा दिल्ली पुलिस के कमिश्नर और दिल्ली से जुड़ी तमाम एजेंसियों के लोगों ने इसमें हिस्सा लिया। यह सवाल उठ रहा है कि अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि दिल्ली पुलिस उनके अंडर में नहीं आती, फिर वो क़ानून और व्यवस्था से जुड़ी इस बैठक में क्यों हिस्सा ले रहे हैं? यह सवाल इसलिए भी सही है क्योंकि बैठक की अध्यक्षता कर रहे अमित शाह के ठीक बग़ल में बैठे हैं। इससे यह पता चलता है कि वो सिर्फ़ आमंत्रित सदस्य के तौर पर नहीं बल्कि संवैधानिक ज़िम्मेदारी के हिसाब से वहाँ पर मौजूद थे। दरअसल पिछले कुछ सालों में यह भ्रम फैलाया गया है कि दिल्ली पुलिस राज्य सरकार के तहत नहीं आती। बार-बार बोले जाने के कारण लोगों ने इस पर यक़ीन भी कर लिया। लेकिन वास्तविकता से इससे कोसों दूर है। आगे हम आपको बताएँगे कि कैसे दिल्ली पुलिस से जुड़े फ़ैसलों में मुख्यमंत्री की पूरी दखल होती है। यहाँ तक कि दिल्ली में दंगाइयों को देखते ही गोली मारने का आदेश भी केजरीवाल की सहमति से ही दिया गया है।

केजरीवाल और मीडिया का फैलाया झूठ

अक्सर हम इस बात पर भरोसा कर लेते हैं कि दिल्ली पुलिस दिल्ली सरकार के अंडर में नहीं आती है। इसी तरह यह ग़लतफ़हमी भी पैदा की गई है कि दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के तहत आती है। जबकि ये दोनों बातें पूरी तरह से सही नहीं हैं। इस बात को समझने के लिए आपको 2017 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बारे में जानना होगा। दिल्ली में केजरीवाल सरकार आने के बाद एलजी के साथ टकराव शुरू हो गया था। मामला कोर्ट में पहुँचा। पहले हाई कोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। जो फ़ैसला आया उसमें साफ़-साफ दर्ज है कि दिल्ली पुलिस उपराज्यपाल के अंडर में आती है। उपराज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर काम करेंगे। लेकिन उन्हें फ़ैसलों में मुख्यमंत्री से सलाह मशविरा करना ज़रूरी होगा। इसके बाद से एलजी और सीएम की ऐसी बैठकें होती रहती हैं। यहाँ तक कि पुलिस अधिकारियों के तबादले के फैसलों भी मुख्यमंत्री शामिल होते हैं और उनकी राय ली जाती है। यह पहली बार हुआ है जब ऐसी बैठक में गृहमंत्री अमित शाह को भी शामिल होना पड़ा, क्योंकि मुद्दा बेहद संवेदनशील है।

सभी आदेशों में शामिल होते हैं मुख्यमंत्री

पुलिस के तबादलों और नियुक्ति का मामला भी एलजी के तहत है, लेकिन वो इसमें भी दिल्ली के मुख्यमंत्री से सलाह-मशविरा करते हैं। मुख्यमंत्री की सलाह बाध्यकारी तो नहीं होती, लेकिन उससे जुड़े फ़ैसलों में वो शामिल ज़रूर होते हैं। जैसे कि अगर मुख्यमंत्री को पुलिस कमिश्नर के नाम में ऐतराज हो तो वो इसे औपचारिक तौर पर दर्ज करवा सकते हैं। दिल्ली सरकार के पास इकलौता जो अधिकार नहीं है वो है दिल्ली पुलिस से जुड़े क़ानून का। दिल्ली विधानसभा ऐसा कोई क़ानून पास नहीं कर सकती है जो दिल्ली पुलिस या दिल्ली के लॉ एंड ऑर्डर से जुड़ा हो। ऐसा भी इसलिए है क्योंकि दिल्ली देश की राजधानी है, लिहाज़ा इसे केंद्रीय सरकार के ही अधिकार में रखा जा सकता है। 2017 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली में स्थिति अब बिल्कुल साफ़ है। इसमें कोई संदेह नहीं कि दिल्ली पुलिस को दिए जाने वाले आदेशों और नीतिगत फ़ैसलों में केजरीवाल की बराबर की भागीदारी होती है, यह अलग बात कि वो अपनी राजनीति के लिए कभी इस बात को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं करते।

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