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CAA पर हिंसा कराके पाकिस्तान ने फ़िलहाल ‘POK बचा लिया’

देश में नागरिकता क़ानून को लेकर चल रहे धरना-प्रदर्शनों और हिंसा के बीच ये ख़बर बेहद चौंकाने वाली है। सुरक्षा से जुड़े एक अहम सूत्र ने न्यूज़लूज़ को बताया कि इस बात के पक्के संकेत मिले हैं कि दिल्ली समेत देश के कई शहरों में विरोध-प्रदर्शनों के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ है। खास तौर पर दिल्ली के शाहीन बाग में पहले हुई हिंसा और उसके बाद धरने के लिंक आईएसआई के नेटवर्क के साथ पाए गए हैं। लेकिन इस पूरे तमाशे के पीछे का मकसद जानकर आप हैरान रह जाएंगे। हमारे सूत्र ने दावा किया कि पाकिस्तान को लग रहा था कि इसी साल जनवरी के अंत तक भारत पीओके को आजाद कराने के लिए बड़ी सैनिक कार्रवाई कर सकता है। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि क्या वाकई भारत सरकार और सेना की ऐसी कोई तैयारी थी। लेकिन जिस तरह से धारा 370 हटने के बाद गतिविधियां तेज़ हुई थीं उसे देखते हुए पाकिस्तान बेहद सतर्क हो गया था। इस संभावित हमले को टालने के लिए ही उसने नागरिकता कानून के नाम पर भारत में हिंसा करवाने का प्लान बनाया, ताकि भारत अपने अंदरूनी मामलों में ही उलझ जाए और पीओके के बारे में न सोचने पाए।

सिविल वॉर जैसी स्थिति की तैयारी है

ख़ुफ़िया एजेंसियों ने कुछ इंटरसेप्ट पकड़े हैं जिनमें सिविल वॉर या बड़े पैमाने पर दंगे-फसाद की प्लानिंग के संकेत मिलते हैं। इसके लिए विपक्ष के कट्टरपंथी नेताओं के अलावा मीडिया की भी मदद ली गई। इसके अलावा शरजील इमाम जैसे कट्टरपंथियों की एक जमात को सक्रिय किया गया। हमारे सूत्र ने बताया कि सरकार को इस स्थिति का अंदाज़ा था। कुछ ख़ुफ़िया इनपुट्स भी थे कि पाकिस्तान या तो कोई बड़ा हमला करवा सकता है या देश में ही दंगे-फसाद की साज़िश रच सकता है। लेकिन नागरिकता क़ानून ने उसे मौक़ा दे दिया। इस मामले में कुछ पत्रकारों की भूमिका भी सवालों के दायरे में है। ख़ास तौर पर वो पत्रकार जिन्होंने सवाल पूछने के नाम पर झूठ फैलाना शुरू कर दिया कि इस क़ानून से लोगों को लाइन में लगना पड़ेगा और मुसलमानों की नागरिकता छिन जाएगी। इतना ही नहीं कुछ पत्रकारों और नेताओं ने तो हिंदुओं की नागरिकता छिनने जैसी बातें भी उड़ाईं। एजेंसी के स्तर पर ऐसे सभी संदिग्ध लोगों की गतिविधियों पर भी नज़र बनी हुई है।

क्या ‘ऑपरेशन पीओके’ तय था?

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने ऐसी बातें लिखी हैं कि पाकिस्तानी क़ब्ज़े वाले इलाक़े में नीलम घाटी पर पिछले कुछ समय से भारतीय सेना लगातार भारी गोलाबारी कर रही थी। इसके बाद ख़बर आई कि केरन सेक्टर में भारतीय सेना ने एक पाकिस्तानी गाँव को आज़ाद करा लिया है। हालाँकि बाद में ख़ुद सेना ने बयान जारी करके इसका खंडन किया। जानकारों के मुताबिक़ ये सब दबाव बनाने की उस रणनीति के तहत हो रहा था, जिसके तहत असली कार्रवाई जनवरी के अंत तक हो सकती थी। क्योंकि इसके बाद पहाड़ों में बर्फ़ पिघलती है और इस दौरान पीओके, गिलगित और बल्टिस्तान के इलाक़ों पर सैनिक कार्रवाई आसान होती। इस दलील के पक्ष में एक तर्क यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय रूप से इन दिनों पाकिस्तान बेहद कमजोर स्थिति में है। न सिर्फ़ आर्थिक और राजनीतिक रूप से बल्कि सैनिक तौर पर भी पाकिस्तान की कमर टूट चुकी है। पीओके को लेकर होने वाली किसी भी कार्रवाई की सूरत में पाकिस्तान 2-3 दिन से ज़्यादा मोर्चा लेने की स्थिति में नहीं है। फ़िलहाल देश में जो कुछ हालात हैं उन्हें देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भारत में अपने स्लीपर सेलों की मदद से पाकिस्तान ने एक सीज़न के लिए ख़ुद को बचा लिया है। क्योंकि पूरी तरह गर्मी शुरू होने के बाद किसी सैनिक कार्रवाई की उम्मीद कम ही होगी।

दंगे भड़काने का पाकिस्तानी खेल पुराना

दरअसल शक करने की कई और वजहें भी हैं। 2002 में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हमला हुआ था। तब केंद्र की वाजपेयी सरकार ने पाकिस्तान के बॉर्डर पर सेना भेज दी थी। उन दिनों यह पक्का माना जाता था कि कभी भी हमला हो सकता है। लेकिन तभी 27 फ़रवरी 2002 को गोधरा में कारसेवकों से भरी ट्रेन जला दी गई। इस हमले से पूरा देश हिल गया और गुजरात में दंगे भड़क उठे। इस दौरान अहमदाबाद कैंटोनमेंट की सेना भी बॉर्डर पर थी। जिसके कारण दंगे रोकने में प्रशासन नाकाम हो गया। इन दंगों से वाजपेयी सरकार देश के अंदर ही उलझकर रह गई और पाकिस्तान को सबक़ सिखाने का प्लान धरा का धरा रह गया। कई लोग यह मुद्दा समय-समय पर उठाते रहे हैं। उनका आरोप है कि पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई ने उस हमले के लिए गुजरात कांग्रेस से जुड़े कुछ लोगों को इस्तेमाल किया था। हाल ही में पुलवामा हमले के बाद भी यह आरोप लगे थे कि कांग्रेस के कुछ नेता पाकिस्तान को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। आप हमारी वो रिपोर्ट इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं: क्या फिर से पाकिस्तान को बचाने की कोशिश में है कांग्रेस?

नीचे आप कुछ ट्वीट देख सकते हैं, जिनमें लोगों ने नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों के पीछे पीओके मसले से ध्यान हटाने की साज़िश का शक जताया है।

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