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जानिए कैसे बुरी तरह जिहादियों के चंगुल में फँस चुकी है दिल्ली

सौजन्य- बिज़नेस टुडे

दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों में जिहादी हिंसा के मामले बढ़ते जा रहे हैं। जिस तरह से एक के बाद एक इलाक़ों में सड़कें रोकने की कोशिश हो रही हैं उससे यह सवाल पैदा हो रहा है कि क्या वाक़ई दिल्ली में मुस्लिम आबादी इस स्तर तक पहुँच चुकी है कि वो जब चाहे शहर को बंधक बना सकते हैं? और जब चाहें पुलिस को चुनौती दे सकते हैं? दरअसल यह बात काफ़ी हद तक सही है। पिछले क़रीब एक दशक में दिल्ली में आबादी का संतुलन बहुत तेज़ी के साथ बिगड़ा है। इसके लक्षण समय-समय पर दिखाई देते रहे, लेकिन कभी सरकारों ने तो कभी पुलिस ने मामला दबा दिया। यह बात समय-समय पर उठती रही है कि पिछले एक दशक में दिल्ली में कई इलाकों में अवैध बस्तियां बस चुकी हैं, जिनमें ज्यादातर बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठिए रह रहे हैं। उन्होंने मस्जिदें और यहां तक कि पक्की इमारतें भी बना ली हैं। आरोप है कि आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद इन्होंने आधार, वोटर कार्ड जैसे जरूरी दस्तावेज भी बनवा लिए हैं। नई बनी मुस्लिम बस्तियाँ ज़्यादातर दिल्ली के बाहरी इलाक़ों में हैं, जहां से शहर के अंदर आने और बाहर जाने के रास्ते हैं। वो जब चाहें इन रास्तों को बंद करके लोगों का जीना मुहाल कर सकते हैं।

मुस्लिम आबादी में भारी बढ़ोतरी के लक्षण

2019 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले दिल्ली कांग्रेस के कुछ नेताओं की बातचीत का एक वीडियो लीक (इसी पेज पर नीचे देखें) हुआ था, जिसमें वो शहर में मुसलमानों की बढ़ती आबादी पर बात कर रहे हैं। ये चारों कांग्रेस के टिकट पर विधायक रह चुके थे। इनमें से ही एक नेता शोएब इक़बाल ने राहुल गांधी को पत्र लिखकर माँग की थी कि चूँकि दिल्ली में अब मुसलमानों की आबादी में भारी बढ़ोतरी हुई है, इसलिए कम से कम लोकसभा का एक टिकट एक मुस्लिम उम्मीदवार को दिया जाए। चुनाव से ठीक पहले वायरल हुए उस वीडियो में कांग्रेस के नेता यह मान रहे हैं कि बाहरी दिल्ली में जहां पहले ज़्यादा मुसलमान नहीं हुआ करती थी वहाँ पर आबादी में भारी उछाल आया है। इस बातचीत के मुताबिक़ अब दिल्ली में मुस्लिम पॉपुलेशन 40 लाख से ऊपर हो चुकी है। 2011 की जनगणना के मुताबिक़ दिल्ली में मुस्लिम आबादी 13 फ़ीसदी से कम हुआ करती थी। जबकि इस वीडियो में दिल्ली कांग्रेस के 3 बड़े मुस्लिम नेता ख़ुद यह क़बूल रहे हैं कि उनकी आबादी अब 20 फ़ीसदी के आसपास हो चुकी है। जितनी तेज़ी से मुस्लिम बस्तियाँ बस रही हैं, उन्हें देखते हुए यह दावा सही भी मालूम होता है। फ़िलहाल इसकी पुष्टि 2021 की जनगणना में हो जाएगा। हालांकि वोटर लिस्ट के हिसाब से आबादी अनुपात में अभी बहुत ज्यादा अंतर नहीं दिखाई देता।

आबादी के कारण सियासी हैसियत बढ़ी

दिल्ली में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी विधानसभा चुनाव में एक पार्टी के पक्ष में मुसलमानों का ध्रुवीकरण हो। जबकि दूसरी तरफ़ हिंदुओं का वोट प्रतिशत सामान्य ही रहा। इसी का नतीजा है कि दिल्ली की 70 में से क़रीब 10 सीटों पर मुस्लिम वोट जीत-हार का फ़ैसला करते हैं। इनमें बल्लीमारान, सीलमपुर, ओखला, मुस्तफाबाद, चांदनी चौक, मटिया महल, बाबरपुर और किराड़ी सीटें शामिल हैं। इन इलाक़ों में तो उनकी आबादी 35 से 60 फीसदी तक हैं। साथ ही त्रिलोकपुरी और सीमापुरी इलाक़े भी तेज़ी के साथ मुस्लिम बहुल होते जा रहे हैं। ये सभी इलाक़े वो हैं जिनसे कांग्रेस के उम्मीदवार चुनाव जीतते रहे, लेकिन आम आदमी पार्टी की मुस्लिम तुष्टीकरण का नतीजा ये हुआ कि ये सारे इलाक़े आज उसकी पकड़ में हैं। केजरीवाल सरकार ने इन इलाक़ों में सड़क, बिजली जैसे सुविधाओं से ज़्यादा वोटर कार्ड बनवाने का काम किया है। लोकसभा चुनाव से पहले इन्हीं इलाक़ों के कुछ वोटरों के नाम लिस्ट से कट गए थे तो केजरीवाल ने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना लिया था और तब तक हंगामा मचाया था जब तक चुनाव आयोग ने दबाव में आकर कई वोटरों के नाम बहाल कर दिए थे।

दिल्ली में मुस्लिम आबादी पर कांग्रेस नेताओं की बातचीत सुनिए:

नीचे आप 2011 की जनगणना के मुताबिक दिल्ली की आबादी में धार्मिक अनुपात को देख सकते हैं।

दिल्ली के चमचमाते इलाक़ों में लोग सुरक्षित अपने घरों में रहते हैं, इसलिए लोगों को आबादी में आ रहे इस बदलाव की ज़्यादा चिंता नहीं होती। लेकिन यह समस्या उन इलाक़ों को चपेट में लेने लगी है जो इन अवैध मुस्लिम बस्तियों के क़रीब हैं। उदाहरण के लिए लाजपतनगर के पास श्रीनिवासपुरी में बड़ी संख्या में हिंदुओं को अपने घर बेचककर जाना पड़ा। विकासपुरी इलाके में डॉक्टर पंकज नारंग की हत्या भी कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों के ही हाथों हुई थी। कुछ दिन पहले तुलसीनगर इलाक़े में भी हिंदुओं के पलायन की रिपोर्ट्स (नीचे देखें) मीडिया में आई थीं। ऐसी घटनाएं अब लगातार बढ़ रही हैं।

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