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‘महाभारत की खोज’ में बड़ी कामयाबी, वैदिक सभ्यता के मिले निशान

सनौली में चल रही खोज और खुदाई में मिले एक कंकाल की तस्वीर।

उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले के सनौली गाँव में मिले अवशेषों से जुड़ी एक अहम जानकारी सामने आई है। यहाँ मिले रथों और दूसरे सामान की कार्बन डेटिंग से पुष्टि हुई है कि ये 3800 साल पुराने हैं। यह समय ईसा से लगभग 2000 साल पहले का है। सनौली गाँव में एक समाधि स्थल पाया गया था। इस जगह पर 126 लोगों को दफ़नाए जाने के निशान मिले हैं। इनमें कुछ भूमिगत चेंबर जैसी जगहें भी हैं। इसके अलावा ताबूत जैसी कुछ आकृतियाँ भी निकली हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि शवों को इनमें रखा जाता रहा होगा। इन ताबूतों पर सजावट और नक़्क़ाशी के भी निशान पाए गए। शवों के साथ चावल की पोटली भी दफनाए जाने की बात पाई गई है। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) ने यह पुष्टि की है कि ये सारे अवशेष किसी स्थानीय मूल के ही लड़ाकू समुदाय से जुड़े हो सकते हैं। दरअसल कार्बन डेटिंग के नतीजों का जो सबसे बड़ा मतलब है वो यह कि पूरी खोज की तारीख महाभारत काल से जुड़ रही है। माना जाता है कि करीब 5000 साल पहले महाभारत का युद्ध हुआ था। कार्बन डेटिंग के हिसाब से यह उसके काफी करीब है। दरअसल बागपत का ये पूरा इलाका उस जगह के काफी करीब है जिसे महाभारत काल की राजधानी हस्तिनापुर के नाम से जाना जाता है। यह भी पढ़ें: डीएनए स्टडी से साबित हुआ आर्य इसी देश के, नेहरू के झूठ का हुआ खुलासा

महाभारत काल के साथ जुड़ा कनेक्शन

यूपी के बागपत शहर के सनौली में 2005 में खुदाई शुरू हुई थी। यह जगह दिल्ली से क़रीब 70 किलोमीटर दूर है। 2018 में यहाँ पर पहली बार घोड़े से चलने वाले रथ, तलवारें, ढाल और मिट्टी के बर्तनों के अवशेष पाए गए थे। अब तक माना जाता रहा है कि महाभारत का काल आज से क़रीब 5000 साल पहले रहा होगा। जिन सामान की कार्बन डेटिंग की गई वो क़रीब 4000 साल पुराने साबित हुए। इससे इतना तय है कि इस सभ्यता का संबंध महाभारत के उस काल के साथ रहा होगा। रथों और हथियारों का तरीक़ा भी इस बात की पुष्टि करता है। जहां तक समाधि या शव दफ़नाए जाने का सवाल है, हिंदू धर्म में अंत्येष्टि के दोनों तरीक़े प्रचलित रहे हैं। शवदाह का प्रचलन बाद में बढ़ा है। आज भी और पहले भी बहुत सारे लोग समाधि के रूप में दफ़नाए जाते थे। समाधियों को बनाने का जो तरीक़ा है वो भी वैदिक परंपरा के अनुरूप ही है। शवों पर शुद्धीकरण के ठीक वैसे ही निशान पाए गए हैं, जैसे वैदिक परंपरा में किया जाता रहा है।

वैदिक सभ्यता से जुड़े होने के सबूत मिले

सिर्फ़ शवों की समाधि ही नहीं, सनौली में हुई खुदाई में ऐसी मूर्तियाँ और आकृतियाँ भी मिली हैं जो वैदिक देवी-देवताओं की हैं। कई ऐसे सामान भी मिले हैं जिनका प्रयोग धार्मिक क्रियाकलापों में किया जाता है। इनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं जिनसे जुड़ी परंपराएँ आज भी बरकरार हैं। फ़िलहाल इतिहासकार सनौली में हुई पूरी खोज को अभी तक खुलकर महाभारत काल से नहीं जोड़ रहे हैं, क्योंकि दोनों के बीच समय का काफ़ी अंतर है। लेकिन यह स्पष्ट हो चुका है कि ये सारी खोज उसी काल से जुड़ी हुई है जिसे हम महाभारत काल के नाम से भी जानते हैं। क्योंकि अभी तक कुछ लोग यह दावा कर रहे थे कि सनौली में मिल रहे अवशेष ज़्यादा से ज़्यादा 2500 साल पुराने हैं। कुछ लोग इसे सिंधु घाटी सभ्यता के साथ भी जोड़ रहे थे। फ़िलहाल ज़्यादातर इतिहासकार मानते हैं कि अब तक जो सच सामने आया है वो एक बहुत छोटा हिस्सा है। पूरे इलाक़े में अगर वैज्ञानिक तरीक़े से खोज की जाए तो प्राचीन भारत के वैदिक काल से जुड़ी कई और सच्चाइयाँ सामने आने की उम्मीद है। यह भी पढ़ें: क्या आर्य वाक़ई भारत के मूल निवासी नहीं हैं?

सनौली, द्वारका और सरस्वती नदी

गुजरात में कृष्ण की नगरी के तौर पर मशहूर द्वारका के जो अवशेष समुद्र के अंदर मिलते हैं उनकी कार्बन डेटिंग के मुताबिक़ वो 1500 से 2000 ईसा पूर्व के हैं। इस हिसाब से सनौली की खोज का समय भी क़रीब-करीब वही बैठ रहा है। सरस्वती नदी को लेकर जो खोजें हुई हैं उनके मुताबिक़ क़रीब यही समय था जब यह नदी लुप्त हो गई थी। इन तीनों तथ्यों को भी अगर आपस में जोड़ा जाए तो भी बात महाभारत से कहीं न कहीं जुड़ती हैं। हालाँकि यह बात सही है कि इस पूरे मसले पर अभी काफ़ी शोध की ज़रूरत है ताकि सारे तथ्य पूरी तरह साफ़ हो सकें।

(न्यूज़लूज़ टीम)

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