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क्या है महाशिवरात्रि का रहस्य? इस दिन ज़रूर करें ये पाँच काम

आम बोलचाल में कहा जाता है कि महाशिवरात्रि वो दिन है जब शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। लेकिन सच सिर्फ़ इतना ही नहीं है। यह महाशिवरात्रि के पर्व का सरल मतलब है। इस कथा के अंदर ही छिपा हुआ है शिव का वो रहस्य जिसे जानने की कोशिश हम सभी को करना चाहिए। वास्तव में महाशिवरात्रि एक ऐसा वैज्ञानिक उत्सव है, जिसके बारे में जानकर दुनिया हैरान रह जाती है। इसे समझने के लिए आपको यह पूरा लेख पढ़ना होगा। दरअसल साल में क़रीब 12 शिवरात्रि पड़ती हैं। ये हर महीने अमावस्या से ठीक एक दिन पहले की रात होती है। महीने का ये वो समय होता है जब रात सबसे अंधेरी होती है। लेकिन शक संवत के अनुसार माघ महीने में अमावस्या से ठीक पहले यानी चौदहवीं तारीख (चतुर्दशी) की रात को महाशिवरात्रि कहा जाता है। महाशिवरात्रि आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वालों के लिए ही नहीं, कुछ पाने की चाह रखने वाले सांसारिक और गृहस्थ जीवन जीने वाले लोगों के लिए भी यह उतना ही महत्वपूर्ण है। जो लोग कोई पूजा-पाठ नहीं करते या कोई साधना नहीं करते। उनके लिए भी यह दिन विशेष है। यह भी पढ़ें: हिंदू मंदिरों के पीछे का विज्ञान जो आज भी रहस्य है

महाशिवरात्रि का वैज्ञानिक आधार

यह वो रात होती है जब सूरज धरती की भूमध्य रेखा या विषुवत रेखा (Equator) की सीध (नीचे देखें तस्वीर) में होता है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में इसे विषुव कहा गया है। यह वो तारीख होती है जब पूरी धरती पर रात और दिन बराबर होते हैं। इस खगोलीय अवस्था में अपनी धुरी पर चक्कर काट रही धरती के कारण जो ऊर्जा पैदा होती है वो नीचे की तरफ से ऊपर की ओर बढ़ती है। विज्ञान की भाषा में इसे अपकेंद्रीय बल या centrifugal force कहा जाता है। हमारा शरीर भी इस ब्रह्मांड और धरती का ही हिस्सा है। इसलिए अगर इस दिन हम अपने शरीर को सीधा रखें जैसे कि योग की मुद्रा में बैठे या खड़े रहें तो हमें शिव की ऊर्जा मिलती है। यही कारण है कि महाशिवरात्रि के दिन सोने से मना किया जाता है और रात भर लोग जागरण करते हैं। ऐसा करने के पीछे जो मंशा है वो यह कि व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी झुकी हुई नहीं, बल्कि सीधी होनी चाहिए ताकि वो ऊर्जा के इस प्रवाह का पूरा लाभ उठा सके। ऊर्जा के इस प्रवाह के कारण ही महाशिवरात्रि को जागृति अथवा चेतना की रात भी कहा जाता है। ब्रह्मांड से जुड़ा यह विज्ञान भारतीयों को हजारों साल से पता था और वो इस दिन को महाशिवरात्रि के रूप में मनाते थे। आधुनिक विज्ञान के लिए यह ज्ञान महज कुछ सौ साल ही पुराना है। यह भी पढ़ें: क्या शिवलिंग और परमाणु रिएक्टरों के बीच कोई संबंध है?

महाशिवरात्रि का धार्मिक आधार क्या?

ऊपर बताए गए वर्णन से आप समझ गए होंगे कि वास्तव में महाशिवरात्रि एक खगोलीय अवसर है जब हम ब्रह्मांडीय ऊर्जा का अपने शरीर और जीवन में संचार कर सकते हैं। लेकिन आम लोगों की समझ के लिए इसे कुछ धार्मिक परंपराओं और कथा कहानियों के साथ भी जोड़ा गया है। ये कहानियाँ भी किसी न किसी सत्य की तरफ़ इशारा कर रही होती हैं। उदाहरण के तौर पर कहा जाता है कि इसी दिन सृष्टि की रचना का काम शुरू हुआ था। पुराणों के अनुसार इस दिन अग्निलिंग का उदय हुआ था जो आगे चलकर सृष्टि की उत्पत्ति का कारण बना। इसी अग्निलिंग के सिद्धांत को आधुनिक विज्ञान में बिग बैग जैसे नामों से पुकारा जाता है। महाशिवरात्रि का संबंध समुद्र मंथन की कथा से भी है। ये वो दिन है जब समुद्र से विष निकला था और भगवान शिव ने विष का पान करके सृष्टि को बचाया था। यह भी पढ़ें: जानिए केदारनाथ को क्यों कहते हैं जागृत महादेव

यह तस्वीर Equinox यानी विषुव के बारे में बता रही है। धरती अपनी धुरी पर चक्कर काट रही है और भूमध्य रेखा के ठीक सीध में सूरज है।

महाशिवरात्रि पर ज़रूर करें ये 5 काम

1. शास्त्रों में दिन को चार भाग में बाँटा गया है। महाशिवरात्रि का हर प्रहर खास होता है। अगर संभव हो तो इस दिन किसी शिवालय या मंदिर में ज़रूर जाएं और शिव का ध्यान लगाए।

2. अगर आप बहुत पूजा-पाठ नहीं करते तो भी जितना संभव हो सके “ॐ नम: शिवाय” का जाप ज़रूर करें। यह मंत्र शरीर में शक्ति संचय और संचार का माध्यम बन जाता है।

3. अगर आपके पास रुद्राक्ष है तो इस दिन उसे ज़रूर धारण करें। इससे धन और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ दूर होती हैं।

4. शिव की ऊर्जा को ख़ुद में समाहित करने के लिए शिवलिंग की पूजा एक अच्छा माध्यम माना जाता है। स्फटिक का शिवलिंग आप घर में भी स्थापित कर सकते हैं। इससे घर में वास्तुदोष भी ख़त्म हो जाते हैं।

5. भगवान शिव का चमत्कारिक मंत्र है महामृत्युंजय मंत्र। ऐसा नहीं है कि इससे मृत्यु पर विजय मिल जाती है। दरअसल यह मंत्र आपको मृत्यु के भय और अकाल मृत्यु से बचाता है। महाशिवरात्रि पर महामृत्युंजय मंत्र का जाप ज़्यादा असरदार होता है।

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