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नागरिकता क़ानून के बाद मोदी ने चला अगला सबसे बड़ा दांव

देश भर में नागरिकता क़ानून, एनआरसी वग़ैरह को लेकर जारी विवाद अभी तक पूरी तरह से थमा नहीं है, लेकिन मोदी सरकार ने इसी के बीच अपना अगला सबसे बड़ा दांव भी चल दिया है। ये वो दांव है जिसको लेकर ज़्यादा बड़ा कोहराम मच सकता है। माना जा रहा था कि सरकार नागरिकता क़ानून के बाद जनसंख्या क़ानून ला सकती है ताकि बढ़ती आबादी और धार्मिक अनुपात यानी डेमोग्राफी में बदलाव को रोका जा सके। लेकिन सारी उम्मीदों के उलट सरकार ने वो फ़ैसला लिया है जिससे एक धर्म विशेष और उनके नाम पर राजनीति करने वाले कांग्रेस जैसे दलों की मुसीबत बढ़ जाएगी। मोदी सरकार ने फ़ैसला किया है कि आधार कार्ड को वोटर आईडी के साथ लिंक किया जाएगा। सरकार इस काम के लिए चुनाव आयोग को क़ानून अधिकार देने की तैयारी कर रही है। इसका मतलब हुआ कि ये काम चुनाव आयोग की देखरेख में किया जाएगा। देश के तमाम इलाक़ों में अभी कई लोगों ने अलग-अलग पहचान से कई वोटर कार्ड बनवा रखे हैं। एक बार इसे आधार से लिंक कर दिया गया तो बहुत बड़ी संख्या में वोटर कार्ड अवैध हो जाएँगे। यह भी पढ़ें: क्या वाकई मोदी सरकार एलआईसी को बेच रही है

क्या है केंद्र सरकार का नया कदम

क़ानून मंत्रालय ने एक कैबिनेट नोट तैयार किया है, जिसमें आधार एक्ट में बदलाव करके उसके साथ वोटर आईडी को भी जोड़ने की बात कही गई है। चुनाव आयोग को भी इस बारे में औपचारिक जानकारी दे दी गई है। दरअसल चुनाव आयोग देश में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग (ई-वोटिंग) शुरू करना चाहती है। इससे कोई व्यक्ति अपने आधार वैरीफिकेशन का इस्तेमाल करते हुए घर बैठे वोट डाल सकेगा। ये काम उन लोगों के लिए होगा जो चुनाव के दिन अपने इलाक़े में नहीं हैं। लेकिन इस कदम का जो सबसे बड़ा असर होगा उसकी कल्पना उन लोगों को अच्छी तरह से है जो इन दिनों नागरिकता क़ानून को लेकर विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। एक अनुमान है कि देश के एक-एक चुनाव क्षेत्र में ऐसे लोगों की संख्या हज़ारों से लेकर लाखों के बीच हो सकती है जिनके पास एक से ज़्यादा वोट हैं। देशभर में देखें तो संभवत: कुछ करोड़ लोग हो सकते हैं जो इस तरीक़े से फ़र्ज़ी मतदान करते हैं। यह आरोप हमेशा से लगता रहा है कि ऐसा करने वाले एक मज़हब विशेष के ज़्यादा हैं। वोटर आईडी और आधार लिंक होने से ये बोगस वोटिंग बंद हो जाएगी। यह भी पढ़ें: बिहार चुनाव से पहले इन दो राज्यों में सरकार बना सकती है बीजेपी

चुनाव आयोग को अमल की जिम्मेदारी

सरकार ने आधार से वोटर आईडी लिंक करने का काम चुनाव आयोग को दिया है। इसके पीछे वजह यह है कि चुनाव आयोग सीधे तौर पर सरकार के तहत नहीं आता। वैसे भी चुनाव प्रक्रिया से जुड़े सारे काम चुनाव आयोग के ही अधिकार में आते हैं। लिहाज़ा इस कदम को लेकर किसी तरह का विवाद पैदा करना आसान नहीं होगा। हालाँकि यह तय माना जा रहा है कि इसे लेकर भी कोई न कोई समस्या ज़रूर खड़ी की जा सकती है। सरकारी सूत्रों ने हमें बताया कि ये मामला सिर्फ़ वोटर आईडी और आधार लिंक करने तक नहीं है। चुनाव आयोग चाहता है कि आगे चलकर इसे फ़िंगरप्रिंट से जोड़ा जाए, ताकि वोट देने से पहले हर आदमी की सही-सही पहचान हो सके। हालाँकि अभी एक सवाल बाक़ी है कि फ़र्ज़ी तरीक़े से बनवाए गए आधार कार्डों की इससे पहचान कैसे होगी? क़ानूनी स्थिति यही है कि आधार और वोटर कार्ड किसी की नागरिकता के सबूत नहीं हैं। यह भी पढ़ें: 2000 के नोट पर रिज़र्व बैंक का बहुत बड़ा कदम

सरकार का इरादा आख़िर क्या है?

यहाँ यह बात समझनी ज़रूरी है कि वोटर कार्ड और आधार लिंक होना हो या नागरिकता क़ानून, एनपीआर या एनआरसी इन सारे कदमों से उन लोगों का भला होगा जो भारत के नागरिक हैं। हाँ उन लोगों में बेचैनी ज़रूर होगी जो बांग्लादेश या किसी दूसरे देश से भारत में आकर चोरी-छिपे रह रहे हैं। चूँकि ऐसे लोगों का अच्छा वोट बैंक बन चुका है इसलिए राजनीतिक पार्टियाँ उनके समर्थन में भी आ जाती हैं। लेकिन सरकार का इरादा सिर्फ़ इतना है कि कोई भी आदमी ग़लत पहचान के साथ देश में न रहे, न चुनाव जैसी गतिविधियों में हिस्सा ले पाए। हर व्यक्ति की सही पहचान होगी तो उन लोगों को सिस्टम से हटाया जा सकेगा जो अवैध तरीक़े से ज़रूरतमंदों के हक़ का पैसा खा रहे हैं।

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