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मीडिया को कैसे खुश रखते हैं अरविंद केजरीवाल, जानिए 5 मंत्र

आपने गौर किया होगा कि मीडिया में पिछले काफ़ी समय से अरविंद केजरीवाल का स्तुतिगान चल रहा है। वो इकलौते नेता हैं जिनके ख़िलाफ़ सत्ता में होने के बावजूद भी ख़बरें सबसे कम दिखाई देंगी। खास तौर पर दिल्ली का मीडिया तो आम आदमी पार्टी की चापलूसी की हद तक झुका हुआ है। यह देखा जाता है कि मीडिया का झुकाव आमतौर पर कांग्रेस के समर्थन में होता है, लेकिन कभी-कभार आपको कांग्रेस के नेताओं के भ्रष्टाचार या अभद्र बयानों से जुड़ी खबरें मिल जाएंगी लेकिन आम आदमी पार्टी को इसमें भी छूट मिली हुई है। पिछले पूरे पांच साल में दिल्ली की मीडिया ने कभी भी दिल्ली सरकार के कामकाज को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया। यहां तक कि चुनाव से ठीक पहले जब सड़कों की खराब हालत, गंदगी और खराब पानी के मामले सामने आए तो मीडिया ने उन खबरों को दबाने में पूरी मदद की। और दिल्ली चुनाव में जीत के बाद मीडिया फिर से केजरीवाल को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करने में जुट गया है। इसका कारण क्या है? इस बारे में न्यूज़लूज़ ने कुछ बड़े मीडिया हाउस में काम करने वाले पत्रकारों से बात की। इस आधार पर हम 5 सबसे बड़े कारण आपको बताते हैं:

1. संपादकों को फ़ोन करना और मिलते रहना

अरविंद केजरीवाल इकलौते मुख्यमंत्री हैं जो सभी बड़े चैनलों के संपादकों को सीधे फ़ोन करके उनका हाल-चाल लेते रहते हैं। बीच-बीच में वो उनसे मुलाक़ात के कार्यक्रम भी रखते हैं। इससे उनका इगो शांत होता है। हर संपादक सोचता है कि सीएम से उसके निजी रिश्ते बहुत अच्छे हैं। उसके एक फ़ोन पर भी मुख्यमंत्री से बात हो जाती है। लेकिन केजरीवाल की मंशा इस तरीक़े से ख़बरों के मैनेजमेंट करने का होता है। एक सीनियर पत्रकार ने बताया कि जिस दिन दिल्ली का पानी सबसे गंदा होने के बारे में ख़बर आई थी उस दिन केजरीवाल ने उनके संपादक को फ़ोन किया और ख़बर न चलाने को कहा। संपादक जी फ़ौरन इसके लिए तैयार हो गए। अगले दिन जब ख़बर दिखाई भी तो राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की तरह। इसी कारण दिल्ली चुनाव से पहले किसी चैनल या अख़बार ने जनता की परेशानियों और शिकायतों से जुड़ी ख़बरें नहीं दिखाईं। जो इंटरव्यू दिखाए गए उनमें भी केजरीवाल से सवाल पूछने का मौक़ा उन्हीं लोगों को दिया गया जो दरअसल आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता थे। केजरीवाल और संपादकों की ये सेटिंग पुरानी बात है। पुण्यप्रसून वाजपेयी के साथ उनके “क्रांतिकारी इंटरव्यू” को तो लोग देख ही चुके हैं। यह भी पढ़ें: केजरीवाल नहीं, दिल्ली में मुस्लिम तुष्टीकरण की जीत हुई है

2. पत्रकारों के छोटे-मोटे काम बड़े आराम से

कई पत्रकारों ने बताया कि पिछले पाँच साल में दिल्ली में पत्रकारों की चाँदी हो गई है। दिल्ली सरकार से जुड़े तमाम छोटे-मोटे काम चुटकियों में हो जाते हैं। अस्पताल में भर्ती कराना हो या स्कूल में एडमिशन, फ़ौरन सीधे सीएम हाउस से सिफ़ारिशी मदद मिल जाती है। कई मेनस्ट्रीम पत्रकारों को केजरीवाल सरकार के मंत्रियों के मीडिया सलाहकार और ओएसडी जैसी नौकरियाँ भी दी गईं। नोएडा के एक अख़बार में काम करने वाले पत्रकार ने बताया कि उन्होंने एक बार अपने एक रिश्तेदार का ऑपरेशन दिल्ली सरकार के अस्पताल में करवाने के बारे में आम आदमी पार्टी के एक पदाधिकारी से मदद माँगी तो वो काम चुटकियों में हो गया। आम आदमी पार्टी के जिन पदाधिकारी ने ये मदद की वो ख़ुद भी कुछ साल पहले तक पत्रकार थे। देखा जाए तो मदद के इस खेल में ज़्यादातर बार नियम-कायदों की अनदेखी की जाती है और किसी ज़्यादा योग्य व्यक्ति का हक़ मारा जाता है।

3. अपने वॉलेंटियर्स को मीडिया में घुसवाया

अरविंद केजरीवाल ने पिछले पाँच साल में मीडिया संस्थानों में जितने लोगों को नौकरी दिलवाई होगी उतनी शायद ही किसी राजनीतिक दल या नेता ने दिलाई हो। ख़ास तौर पर आम आदमी पार्टी की बीट कवर करने वाला पत्रकार तो एक तरह से उनकी पार्टी का वॉलेंटियर ही होता है। ये वो लोग होते हैं जो अपने संस्थानों में पूरा ध्यान रखते हैं कि कहीं भी पार्टी या सरकार के ख़िलाफ़ कोई छोटी सी भी ख़बर न चलने पाए। चूँकि उन्हें संपादकों का संरक्षण मिला होता है इसलिए वो यह काम बड़े आराम से करते रहते हैं। बदले में उन्हें तमाम सरकारी कमेटियों, कॉलेजों वग़ैरह की गवर्निंग काउंसिल वग़ैरह में रखा जाता है। यहाँ यह भी बताते चलें कि अगर किसी रिपोर्टर ने नकारात्मक ख़बरें छापने की कोशिश की तो वो उनको नौकरी से निकलवा भी देते हैं। इसके ढेरों उदाहरण हैं, जब किसी पत्रकार को दिल्ली सरकार के ख़िलाफ़ ख़बर छापने पर नौकरी से हाथ धोना पड़ा। यह भी पढ़ें: दिल्ली में पानी संकट की ख़बर छापने पर गई पत्रकार की नौकरी

4. मीडिया को करोड़ों के सरकारी विज्ञापन

अरविंद केजरीवाल सरकार हर साल मीडिया को दिए जाने वाले विज्ञापनों पर मोटी रक़म खर्च करते हैं। कई बार ऐसा भी हुआ है कि वो किसी योजना के कुल बजट से ज़्यादा पैसे उसके विज्ञापन पर खर्च कर देते हैं। जैसे कि एजुकेशन लोन की स्कीम पर कुल सिर्फ़ 3 लाख रुपये छात्रों को दिए गए थे, जबकि अख़बारों और चैनलों पर स्कीम के विज्ञापन पर 40 लाख से अधिक खर्च कर दिया गया। विज्ञापनों का मामला ऐसा होता है कि उससे अख़बारों और चैनलों के मालिक भी खुश रहते हैं। हमें बताया गया कि मीडिया उम्मीद लगाए बैठी है कि इस बार विज्ञापनों का बजट 500 करोड़ रुपये से भी ज़्यादा होगा। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि दिल्ली सरकार के विज्ञापन उन चैनलों को भी मिलते हैं जो बीजेपी समर्थक माने जाते हैं। इसी कारण ये चैनल भी अहम मुद्दों पर केजरीवाल को सपोर्ट करते दिखाई देते हैं और दिल्ली से जुड़े असली मुद्दे कभी नहीं उठाते।

5. छोटे-छोटे मीडिया संस्थानों को बाँटे पैसे

यह केजरीवाल सरकार का वो सबसे बड़ा दांव था जिस पर अक्सर लोगों की नज़र नहीं पड़ती। हमें बताया गया कि दिल्ली की तमाम कॉलोनियों और आरडब्लूए के लेवल पर जो छोटे-छोटे अख़बार, पत्र-पत्रिकाएं और केबल न्यूज़ चैनल चलते हैं उन्हें भी दिल्ली सरकार ने विज्ञापन और दूसरे तरीक़ों से काफ़ी पैसे बाँटे। पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज इलाक़े में व्यापारियों के लिए छपने वाली एक कम्युनिटी मैगज़ीन के पब्लिशर ने हमें बताया कि स्थानीय विधायक की तरफ़ से उन्हें काफ़ी मदद मिली। दिल्ली में ऐसी पत्रिकाओं की संख्या हज़ारों में है। इन्हें पढ़ने वाले कुछ सौ लोग ही होते हैं, लेकिन केजरीवाल ने इन्हें भी खुश करके अपने ख़िलाफ़ माहौल बनने की बची-खुची गुंजाइश को भी दबा दिया।

यह भी पढ़ें: ये हैं वो पत्रकार जो केजरीवाल के हाथों बिक गए

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