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जानिए कैसे आज़ादी के बाद से ही आरक्षण विरोधी रही है कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी आरोप लगा रही है कि बीजेपी आरक्षण को ख़त्म करना चाहती है। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि कांग्रेस ने आज़ादी के बाद से सत्ता में अपने आख़िरी महीनों यानी 2014 तक अनुसूचित जाति और जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण को ख़त्म करने की कोई कोशिशें की थीं। ज्यादातर बार अलग-अलग कारणों से वो कामयाब नहीं हो पाए। इसके लिए आपको आरक्षण के पूरे इतिहास पर नज़र डालनी होगी। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने अनुसूचित जातियों सरकारी सेवाओं और शिक्षा आरक्षण की मांग पहली बार 1942 में की थी। तब कांग्रेस के किसी नेता ने उनका समर्थन नहीं किया था। उस दौर में गांधी और नेहरू जैसे कांग्रेस के तमाम बड़े नेता जातिगत आरक्षण के विरोधी हुआ करते थे। लेकिन देश की आजादी के बाद अंबेडकर जब संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष बने तब उन्होंने आरक्षण का अपना प्रस्ताव फिर से पेश किया। यह भी पढ़ें: मोदी आरक्षण खत्म कर देगा.. की अफवाह उड़ाने में जुटी कांग्रेस

आरक्षण पर सिर्फ़ पटेल ने दिया था साथ

संविधान निर्माण के समय गांधी समेत कांग्रेस के सभी दिग्गज आरक्षण के विचार के ख़िलाफ़ थे। सिर्फ़ सरदार पटेल थे जिन्होंने अंबेडकर का साथ दिया। इसी का नतीजा हुआ कि 1950 में संविधान की धारा 330 और 332 के तहत तय हुआ कि लोकसभा में और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित रखी जाएगी। राजशेखरैया ने अपने लेख ‘डॉ. अंबेडकर एंड पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन ऑफ द शेड्यूल कॉस्ट्स’ (1979) में कहा है कि डॉ. अंबेडकर दलितों को स्वावलंबी बनाना चाहते थे। यही कारण है कि संविधान सभा में दलितों के आरक्षण पर पटेल ने उनका पूरा साथ दिया। जबकि 26 मई 1949 को संविधान सभा में अपने भाषण में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जोर देकर कहा था कि “यदि हम किसी वर्ग को आरक्षण देंगे तो उससे समाज का संतुलन बिगड़ेगा। ऐसा आरक्षण देने से भाई-भाई के बीच दरार पैदा हो जाएगी।” आरक्षण के मुद्दे पर 22 दिसंबर 1949 को जब धारा 292 और 294 के तहत मतदान कराया गया तो उस वक्त सात में से पांच वोट आरक्षण के खिलाफ पड़े थे। ख़िलाफ़ वोट देने वाले थे- मौलाना अबुल कलाम आजाद, मौलाना हिफ्ज-उर-रहमान, बेगम एजाज रसूल, तजम्मुल हुसैन और हुसैनभाई लालजी। ये सभी नेहरू के करीबी लोग थे। यह भी पढ़ें: आरक्षण व्यवस्था से खुश एक झगड़े के मन की बात

पिछड़ा आरक्षण का मामला भी लटकाया

अन्य पिछड़ी जातियों यानी OBC आरक्षण की बुनियाद 1953 में पड़ी थी जब इस बारे में एक कमीशन का गठन किया गया था। इस आयोग की रिपोर्ट 1955 में आ गई। लेकिन कांग्रेस की सरकारों ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। 1978 में इस बारे में दोबारा मंडल आयोग बनाया गया, यह वो समय था जब कांग्रेस सत्ता से बाहर थी। लेकिन वो सरकार भी जल्दी ही गिर गई और मंडल आयोग पर अमल का मामला लटक गया। इसी रिपोर्ट में अन्य पिछड़ी जातियों के लिए 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की गई थी। करीब 10 साल बाद जब कांग्रेस सत्ता से दोबारा बाहर हुई और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने तो ओबीसी आरक्षण के बारे में मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू कर दिया गया। उन दिनों में कांग्रेस के नेताओं के बयान देखें तो पता चलेगा कि वो इसके कितने विरोध में हुआ करते थे। इतना ही नहीं, बाद के सालों में कांग्रेस लगातार सत्ता में रही, लेकिन उसने कभी भी ओबीसी कमीशन को संवैधानिक शक्ल नहीं दी।

प्रमोशन में आरक्षण के ख़िलाफ़ थी कांग्रेस

1995 में 77वें संविधान संशोधन के ज़रिए नौकरियों में प्रमोशन में भी आरक्षण की व्यवस्था लागू कर दी गई। तब पीवी नरसिंह राव की सरकार थी। चुनावी साल होने के कारण नरसिंह राव ने यह दांव खेला था। बीजेपी समेत संसद में ज़्यादातर दलों ने इसका समर्थन किया था। लेकिन तब के मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई थी कि सोनिया गांधी समेत कांग्रेस के तमाम दिग्गज नरसिंह राव के फ़ैसले से नाराज़ हैं। नरसिंह राव ने बिना सोनिया गांधी की हरी झंडी के इस संविधान संशोधन को पास करवाया था। यह भी पढ़ें: आरक्षण से दुखी हैं तो इसका हल भी जान लीजिए

2014 में आरक्षण हटाने के वादे पर विचार

कम लोगों को ही पता होगा कि 2014 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस पार्टी में यह विचार चल रहा था कि वो घोषणापत्र में वादा करे कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने तो आरक्षण को ख़त्म कर दिया जाएगा। कांग्रेस के नेताओं को उम्मीद थी कि ऐसा करने से सवर्ण और मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण उसके पक्ष में होगा। यह वो समय था जब अनारक्षित जातियों के लोग बीजेपी के समर्थन में एकजुट थे। तब कांग्रेस के दिग्गज नेता और सोनिया गांधी के करीबी जनार्दन द्विवेदी ने इस बारे में बयान भी दिया था जो मीडिया में छपा था। यह भी पढ़ें: फ़र्ज़ी दलित था रोहित वेमुला, माँ ने की थी जालसाजी

ईसाई मिशनरी एजेंडे में रुकावट है आरक्षण

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि चर्च हमेशा से आरक्षण के ख़िलाफ़ रहा है। दरअसल संविधान के मुताबिक़ धर्मांतरण करके ईसाई या मुसलमान बनने वालों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है। इस तरह से आरक्षण धर्मांतरण में एक बड़ी रुकावट का काम करता है। कई लोग ऐसे भी मिलेंगे जिन्होंने धर्मांतरण तो कर लिया है लेकिन काग़ज़ों में ख़ुद को हिंदू लिखते हैं ताकि आरक्षण का लाभ मिलता रहे। इसी से बचने के लिए चर्च ने कई बार अलग से “दलित ईसाई” कैटेगरी बनाकर आरक्षण की माँग की, लेकिन संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण संभव ही नहीं है। यही कारण है कि सोनिया गांधी ने निजी तौर पर हमेशा आरक्षण को कमजोर करने की ही कोशिश की है, चाहे वो दलितों का मामला हो या पिछड़ों का। यह भी पढ़ें: हिंदू धर्म के ख़ात्मे के लिए सोनिया गांधी का गेमप्लान

आरक्षण पर अब क्या है कांग्रेस की रणनीति

दरअसल केंद्र में सत्ता जाने के बाद कांग्रेस अब वापसी के लिए हर दांव आज़मा रही है। इसी के तहत उसने पहले मुस्लिम तुष्टिकरण का दांव खेला। अब उसे लग रहा है कि आरक्षण के मुद्दे पर वो मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर सकती है। प्रमोशन में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने उसे एक सुनहरा मौक़ा दे दिया। कांग्रेस की रणनीति है कि अगर मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर चुप बैठ जाती है तो वो कहेगी कि सरकार आरक्षण विरोधी है और अगर मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अध्यादेश लाया तो वो प्रचार करेगी कि बीजेपी ऊँची जातियों के अधिकारों के ख़िलाफ़ है और इस तरह से उसके लोग नोटा का प्रचार शुरू कर देंगे। जबकि यह बात भी एक तथ्य है कि सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला 2012 में उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार के उस आदेश के ख़िलाफ़ है जिसमें उसने पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लगा दी थी। हैरानी है कि इसके बावजूद कांग्रेस सरकार ख़ुद को आरक्षण समर्थक बता रही है।

संदर्भ:

Facts you need to know before you plunge into the reservation debate

https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_amendments_of_the_Constitution_of_India

https://www.ndtv.com/india-news/rahul-gandhi-should-end-caste-based-reservation-says-congress-leader-janardhan-dwivedi-549791

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