Home » Loose Top » क्या वाक़ई भूखों मर रहे हैं पुलवामा के शहीदों के परिवार?, जानिए सच
Loose Top

क्या वाक़ई भूखों मर रहे हैं पुलवामा के शहीदों के परिवार?, जानिए सच

पुलवामा हमले की बरसी के दिन अख़बारों और चैनलों पर एक साथ कई ख़बरें देखने को मिलीं, जिनमें दावा किया गया था कि फलां शहीद की पत्नी या बेटा बहुत ग़रीबी में जी रहा है या सब्ज़ी बेच रहा है। इन सभी ख़बरों में दावा किया गया कि उस शहीद परिवार को सरकार की तरफ़ से घोषित कोई मदद नहीं मिली। क्या यह बात सही है? हमने इनमें से कुछ ख़बरों की पड़ताल अपने तरीक़े से करने की कोशिश की। जो जानकारी सामने आई वो यह कि ज़्यादातर शिकायतें उन मामलों में हैं जिनमें परिवार के अंदर मुआवज़े की रक़म को लेकर कोई विवाद है। कुछ राजनीतिक मामले भी हैं जिनमें परिवार के सदस्य किसी नेता के बहकावे में आकर मीडिया के आगे गलतबयानी करते हैं। क्योंकि उन्हें भुलावा दिया जाता है कि वो ऐसा बोलेंगे तो सरकार से कुछ और पैसे मिल जाएंगे। सीआरपीएफ ने अपनी तरफ से बयान जारी करके बताया है कि पुलवामा में शहीद हुए सभी 40 जवानों में से 39 के परिवारों को सारी सहायता और सुविधाएं दी जा चुकी हैं। सिर्फ एक परिवार को अब तक मदद नहीं दी जा सकी है क्योंकि वहां मुआवजे को लेकर परिवार के सदस्यों में झगड़ा हो गया और मामला कोर्ट तक पहुंच गया। ऐसी स्थिति में अदालती फैसले तक इंतजार करने की मजबूरी है।

परिवारों के भूखों मरने का सच यह है!

शहीदों को मिलने वाली मदद के बारे में कोई भी सरकारी वेबसाइट “भारत के वीर” पर जानकारी ले सकता है। 10 फ़रवरी 2020 तक देश की रक्षा में अपने बलिदान देने वाले 285 जवानों में से 282 के परिवार को 15-15 लाख रुपये दिए जा चुके हैं। ये पैसा वो होता है जो देशभर के लोग एक फंड में जमा कराते हैं और सरकार इसे सीधे उसके खाते में ट्रांसफ़र करती है जिसे जवान अपने आश्रित के तौर पर दर्ज करवाते हैं। जिन 3 मामलों में अभी तक पैसा नहीं भेजा जा सका है उनमें विवाद है और मामला कोर्ट में चल रहा है। 15 लाख रुपये की इस मदद के बाद हर जवान को अपने वेतन के बकाये और पेंशन की तमाम सुविधाएँ मिलती हैं। कभी-कभी पारिवारिक विवाद या काग़ज़ों में गड़बड़ी से इसमें देरी हो जाती है, लेकिन ऐसा कभी नहीं होता कि पैसा मिले ही नहीं। हर शहीद जवान के परिवार को राज्य सरकारों की तरफ़ से भी सहायता मिलती है। कई बड़े कारोबारी घराने भी उनकी मदद करते हैं। जैसे कि पुलवामा में रिलायंस ने अलग-अलग मद में शहीदों के परिवारों को सहायता पहुँचाई है। हाँ यह ज़रूर है कि जहां परिवार में ही माँ-बाप, पत्नी या बेटे-बेटियों में कोई झगड़ा हो जाए वहाँ कोई भी चाहकर मदद नहीं कर पाता।

प्रयागराज के महेश कुमार का मामला

कुछ अख़बारों में फ़र्ज़ी ख़बर छपी कि प्रयागराज में शहीद महेश कुमार यादव का परिवार भूखा मर रहा है। शहीद की पत्नी संजू देवी का दावा है कि उनसे किया गया कोई भी वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ है। लेकिन जब हमने कुछ स्थानीय पत्रकारों से बात की तो उन्होंने शक जताया कि संभवत: कोई राजनीतिक दल इस परिवार को उकसाने में जुटा है। महेश कुमार यादव का पार्थिव शरीर जब गाँव पहुँचा था तब भी परिवार ने यह कहना शुरू कर दिया था कि जब तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नहीं आएँगे तब तक अंतिम संस्कार नहीं करेंगे। जबकि मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह के आने का कार्यक्रम तय था। सिद्धार्थनाथ सिंह ने राज्य सरकार की तरफ़ से पत्नी को 20 लाख और माता-पिता को 5 लाख रुपये का चेक दिया। लेकिन परिवार ने यह ख़बर उड़ा दी कि चेक बाउंस हो गया। बाद में पता चला कि शहीद की पत्नी ने सरकारी अधिकारियों को अपना वह नाम नहीं लिखवाया जो उनके बैंक खाते में दर्ज है। परिवार दावा करता है कि उन्हें डेढ़ एकड़ ज़मीन और भाई को नौकरी का वादा किया गया था। लेकिन हमने पुरानी रिपोर्ट्स में चेक किया तो पता चला कि ऐसा कोई वादा किसी नेता या प्रशासनिक अधिकारी ने नहीं किया था।

झारखंड के शहीद विजय सोरेंग का केस

झारखंड में गुमला के शहीद विजय सोरेंग का मामला भी काफ़ी सुर्खियों में आया। एक तस्वीर सामने आई जिसमें उनकी पत्नी सब्ज़ी बेच रही हैं। दावा किया गया कि वो बेहद ग़रीबी में अपनी ज़िंदगी गुज़ार रही हैं। इस मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी जांच के आदेश दिए हैं। न्यूज़लूज़ ने अपनी पड़ताल में पाया कि विजय सोरेंग की दो पत्नियाँ हैं। पहली पत्नी कारमेला राज्य पुलिस बस की जवान है और वो अपने 24 साल के बेटे के साथ राँची में रहती है। दूसरी पत्नी विमला देवी सिमडेगा में रहती हैं। उनके चार बच्चे हैं। एक बच्ची बोल नहीं पाती, बाक़ी तीन स्कूल में पढ़ते हैं। मुख्यमंत्री रघुबर दास ने मदद का जो एलान किया था उसके बाद पौने दो करोड़ रुपये जुटाए गए। लेकिन दो पत्नियों के विवाद के कारण यह मुश्किल खड़ी हो गई कि पैसे का हक़दार कौन है? मामला दो पत्नियों का ही नहीं, बल्कि विजय सोरेंग के पिता भी रक़म पर दावा ठोंक रहे हैं। उनके बयानों से भी इस मामले में चल रही राजनीति का कुछ-कुछ अंदाजा लग जाता है। हमें यह भी बताया गया कि विजय सोरेंग का एक बेटा क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग अपने स्कूल में बिल्कुल मुफ़्त में पढ़ा रहे हैं। जहां उसकी पढ़ाई और बाक़ी खर्चे भी वो उठाते हैं। विजय सोरेंग वही जवान थे जिनके पार्थिव शरीर को तब के सीएम रघुवर दास ने कंधा दिया था। इसलिए जानबूझकर यह झूठ फैलाया गया कि उनके परिवार का बुरा हाल है ताकि इस मामले में राजनीति की जा सके।

तब के सीएम रघुबर दास ने शहीद विजय सोरेंग के पार्थिव शरीर को कंधा दिया था।

 

भारत के वीर वेबसाइट पर दी गई जानकारी, जिसके मुताबिक़ शहीद परिवारों को भुगतान हो चुका है।
सीआरपीएफ़ का बयान
एक अपील: न्यूज़लूज़ के जरिए हम राष्ट्रवादी पत्रकारिता को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। इस वेबसाइट पर होने वाला खर्च बहुत ज्यादा है और हमारी आमदनी काफी कम। हम अपने काम को जारी रख सकें इसके लिए हमें आर्थिक मदद की जरूरत है। ये हमारे लिए ऑक्सीजन का काम करेगी। डोनेट करने के लिए क्लिक करें:

कृपया लेख कॉपी-पेस्ट न करें। कई लोग पोस्ट कॉपी करके फेसबुक और व्हाट्सएप पर शेयर कर देते हैं, जिससे वेबसाइट की आमदनी काफी कम हो गई है। राष्ट्रवाद की विचारधारा पर आधारित यह वेबसाइट बंद हो जाएगी तो क्या आपको खुशी होगी? कृपया खबरों का लिंक शेयर करें।

comments

Polls

क्या नरेंद्र मोदी सरकार इसी कार्यकाल में जनसंख्या कानून लाएगी?

View Results

Loading ... Loading ...
Don`t copy text!