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राज ठाकरे के ‘हिंदुत्ववादी’ अवतार के पीछे जानिए क्या है रहस्य

Photo tweeted by @ANI

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के नेता राज ठाकरे ने रविवार को मुंबई के आज़ाद मैदान में एक बड़ी रैली की। पहले से घोषित था कि ये रैली नागरिकता क़ानून (CAA) के समर्थन में है। राज ठाकरे ने अपने भाषण में अपील की कि पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए मुस्लिम घुसपैठियों को फ़ौरन बाहर किया जाए। इतना ही नहीं, इस रैली में उन्होंने अपनी पार्टी का नया भगवा झंडा भी लॉन्च किया। माना जा रहा है कि शिवसेना के सेकुलर होने के बाद राज ठाकरे को लग रहा है कि वो उसके वोटरों पर कब्जा कर सकेगी। इसी कारण राज ठाकरे उस स्पेस को भरने की कोशिश कर रहे हैं जो शिवसेना की नई राजनीति के कारण पैदा हुई है। लेकिन वास्तव में क्या ऐसा ही है? न्यूज़लूज़ को सूत्रों के हवाले से कुछ ऐसी जानकारियां हाथ लगी हैं जो कुछ और ही इशारा कर रही हैं। इसके मुताबिक राज ठाकरे का अचानक सक्रिय होना भी दरअसल सेकुलर राजनीति का ही हिस्सा है। इसका असली मकसद बीजेपी को राजनीतिक तौर पर नुकसान पहुंचाना है।

क्यों हिंदूवादी बन गए राज ठाकरे?

दरअसल इसके पीछे शरद पवार का दिमाग़ बताया जा रहा है। इस बात की पक्की ख़बर है कि महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज ठाकरे और शरद पवार की कम से कम दो बार मुलाक़ात हुई। शरद पवार के बेहद करीबी रहे इस सूत्र ने हमें बताया कि पवार को एहसास है कि महाराष्ट्र में हिंदुत्ववादी राजनीति पर अब बीजेपी का एकाधिकार हो गया है। अगले चुनाव में शिवसेना के लिए अपना परंपरागत हिंदुत्ववादी वोट बचाना बहुत मुश्किल साबित होगा। इन सभी को बीजेपी की तरफ़ खिसकने से रोकने के लिए राज ठाकरे के रूप में नया विकल्प पैदा करने की रणनीति बनी। यह बात सही है कि महाराष्ट्र में शिवसेना के कोर वोटरों में अब भी ज़्यादातर लोग मानते हैं कि राज ठाकरे ही बाला साहेब के स्वाभाविक उत्तराधिकारी बन सकते हैं। यही एक तरीक़ा था जिससे महाराष्ट्र में बीजेपी को और भी मज़बूत होने से रोका जा सकता था। यह भी पढ़ें: जब बाल ठाकरे के डर से भाग गए थे कश्मीरी आतंकी

CAA का समर्थन, NRC का विरोध!

राज ठाकरे ने रैली में जो भाषण दिया उसमें उन्होंने नागरिकता क़ानून का समर्थन किया, लेकिन एनआरसी (NRC) का विरोध किया। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि देशभर में बसे बांग्लादेशियों और पाकिस्तानी घुसपैठियों को बाहर किया जाए। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि घुसपैठियों को बाहर करने का काम नागरिकता कानून से तो नहीं हो सकता, इसके लिए तो NRC की जरूरत पड़ेगी। क्योंकि नागरिकता कानून तो सिर्फ उन हिंदुओं के लिए है जो भागकर भारत में आए हैं और पहले से यहां रह रहे हैं। घुसपैठियों की पहचान का ही तरीका एनआरसी है जिसका राज ठाकरे विरोध कर रहे हैं। हमारे सूत्र ने बताया कि यह दांव भी पवार से पूछकर ही चला गया। ऐसा करके राज ठाकरे ने बीजेपी से दूरी बना ली। ताकि सियासी जरूरत के हिसाब से वो मोलभाव करते रह सकें। हमारे सूत्र ने दावा किया कि राज ठाकरे से कहा गया है कि वो बीजेपी के साथ चुनावी गठबंधन की कोशिश भी करें।

नवंबर में महाराष्ट्र की नई सरकार के शपथ ग्रहण के बाद राज ठाकरे और शरद पवार के बीच कई राउंड मुलाक़ात हुई है। (फाइल फ़ोटो)

‘शरद पवार की कठपुतली बने राज’

उद्धव ठाकरे के बाद राज ठाकरे को कठपुतली बनाकर शरद पवार ने एक तीर से कई शिकार किए हैं। इसके बाद वो महाराष्ट्र की राजनीति के बेताज बादशाह बन जाएँगे। साथ ही आगे चलकर उन्हें अपनी बेटी सुप्रिया सुले को महाराष्ट्र की राजनीति में मज़बूत बनाने का मौक़ा मिल जाएगा। क्योंकि एक बार अगर दोनों ठाकरे भाइयों की विश्वसनीयता महाराष्ट्र की राजनीति में ख़त्म हुई मराठा राजनीति पर पूरा एकाधिकार उनका होगा। राज ठाकरे हिंदुत्व के नाम पर जो कुछ भी वोट बटोरेंगे वो भी उन्हीं के काम आएगा। कांग्रेस के पास न तो नेता बचे हैं न ही कैडर, ऐसे में उसके दोबारा खड़ा होने की उम्मीद बहुत कम है। शरद पवार चाहते हैं कि महाराष्ट्र की राजनीति एनसीपी बनाम बीजेपी की ही रहे। सारी बीजेपी विरोधी पार्टियाँ एनसीपी की छतरी तले आ जाएं। ऐसे में राज ठाकरे का दांव उन्होंने बीजेपी के समर्थकों को कनफ्यूज करने के लिए चला है, जिसमें फ़िलहाल वो काफ़ी हद तक सफल भी दिखाई दे रहे हैं।

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राज ठाकरे पर भरोसा न करने की जो सबसे बड़ी वजह है वो है नीचे की तस्वीर। 8 जुलाई 2019 को राज ठाकरे ने 10 जनपथ में पहुँचकर सोनिया गांधी से मुलाक़ात की थी। तब ख़बर आई थी कि वो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में एनसीपी और कांग्रेस के गठबंधन में शामिल होना चाहते हैं। लेकिन बात नहीं बन पाई। इस मुलाक़ात के बाद यह सवाल उठा था कि जो बाल ठाकरे हमेशा सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ खुलकर बोलते रहे उन्हीं का भतीजा अगर 10 जनपथ में हाज़िरी दे रहा है तो इसका क्या मतलब निकाला जाए।

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