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जानिए क्यों आतंकवादियों के एजेंडे पर काम कर रहा है बॉलीवुड

हाल ही में विधु विनोद चोपड़ा की फ़िल्म ‘शिकारा’ रिलीज़ हुई। कश्मीर घाटी में हिंदुओं के नरसंहार और उनके पलायन के विषय पर बनी इस फ़िल्म से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं कि इसमें भारतीय इतिहास के उस काले अध्याय के बारे में कुछ जानकारी देखने को मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जब लोग ‘शिकारा’ फ़िल्म देखने पहुँचे तो उन्होंने ये पाया कि उलटा इस फ़िल्म में कश्मीरी हिंदुओं को ही क़सूरवार ठहराने की कोशिश हुई है। विधु विनोद चोपड़ा फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले ही बोल चुके थे कि कश्मीर में जो कुछ हुआ था वो छोटी बात है और अब हिंदू और मुस्लिम समुदाय को एक-दूसरे को सॉरी बोल देना चाहिए। इस घटिया फ़िल्म ने हिंदुओं के बरसों पुराने ज़ख़्म को ताज़ा कर दिया है। दरअसल बॉलीवुड में ऐसी हिंदू विरोधी फ़िल्मों का सिलसिला पुराना रहा है। हम आपको बताते हैं ऐसी फ़िल्मों के बारे में जो कहीं न कहीं कश्मीर में अलगाव की हवा को और भी तेज़ करने के लिए ज़िम्मेदार रही हैं। यह भी पढ़ें: हिंदुओं के खिलाफ ज़हर फैला रहा है बॉलीवुड, IIM का अध्ययन

दिलजले (1996)

हैरी बावेजा की ये फ़िल्म कश्मीर से हिंदुओं के पलायन के सिर्फ़ 5-6 साल बाद आई थी। उन दिनों कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था। फ़िल्म का हीरो श्याम एक देशभक्त लड़का है जिसके परिवार का हीरोइन का बाप उत्पीड़न करता है जिसके बाद श्याम आतंकवादी बन जाता है। यहां तक की वैष्णो देवी जाने वाली बस को अगवा कर लेता है। 1996 में कश्मीर में फैले जिहादी आतंक को समझने की बॉलीवुड की ये समझ थी। यानी जिस दौर में कश्मीर में मुस्लिम आतंकवाद अपने चरम पर था उस समय कश्मीर की पृष्ठभूमि पर बनी एक फ़िल्म में हिंदू नाम वाला लड़का ‘श्याम’ आतंकवादी बना। वो भी ऐसा आतंकवादी जो फ़िल्म का हीरो होता है और उसके लिए दर्शकों की सहानुभूति होती है। जबकि श्याम, कृष्ण, राम नाम का एक भी आतंकी पूरे कश्मीर में आज तक नहीं हुआ। सबसे आश्चर्य इस बात का कि फ़िल्म का राइटर करन राजदान ख़ुद कश्मीरी है। यह भी पढ़ें: बॉलीवुड में ज़्यादातर गायक ही क्यों बाग़ी हो रहे हैं?

मिशन कश्मीर (2000)

विधु विनोद चोपड़ा के दिल में कश्मीरी आतंकवादियों के लिए सहानुभूति कोई नई बात नहीं है। ‘शिकारा’ से पहले साल 2000 में उन्होंने ‘मिशन कश्मीर’ नाम से फ़िल्म बनाई थी। इस फ़िल्म में उन्होंने सीधे-सीधे कश्मीर के जिहादी आतंकवादियों को बेचारा और पीड़ित के तौर पर दिखाने की शुरुआत की थी। ये वो समय था जब देश में लोगों को कश्मीर समस्या के बारे में ठीक से पता भी नहीं था। फ़िल्म के हीरो अल्ताफ का परिवार एक पुलिस एक्शन में मारा जाता है। पुलिस ऑफ़िसर अल्ताफ़ को गोद ले लेते हैं। लेकिन बड़े होकर उसे पता चलता है कि उसके परिवार के साथ क्या हुआ था। जब ये बात अल्ताफ़ को पता चलती है तो वो बदला लेने के लिए आतंकवादी बन जाता है। ये वो फ़िल्म थी जिसे कश्मीरी के जिहादी आतंकवादियों ने बहुत पसंद किया था। क्योंकि इसमें उनके किरदार को एक तरह से सही ठहराया गया है। यह भी पढ़ें: ‘रईस’ के पीछे ये है शाहरुख़ खान का असली खेल

हैदर (2014)

बॉलीवुड का वो खेल जो अब तक देशभक्ति और जय हिंद के नारों के बीच छिपकर हो रहा था वो वामपंथी विशाल भारद्वाज की इस फ़िल्म में खुलकर सामने आ गया। इस फ़िल्म में न सिर्फ़ भारतीय सेना के ख़िलाफ़ बेहूदी टिप्पणियाँ की गई हैं, बल्कि आतंकवादी को बेचारा साबित करने की परंपरा को नई ऊँचाई तक पहुँचा दिया गया है। फ़िल्म के हीरो हैदर की मां और चाचा में अफेयर चल रहा है तो उसके बाप को रास्ते हटाने के लिए उसका चाचा उसके बाप को आतंक के झूठे केस में फंसा कर जेल पहुंचा देता है। फिल्म में दिखाया गया कि सेना बेचारे कश्मीरी मुसलमानों पर कितना जुर्म कर रही है। हैदर फ़िल्म में “बिस्मिल, बिस्मिल” गाने को अनंतनाग के मार्तंड सूर्य मंदिर के खंडहर में फ़िल्माया गया है। फ़िल्म में इस पवित्र प्राचीन मंदिर को शैतान के घर की तरह दिखाया गया है। हिंदुओं के देश में इस हिंदू विरोधी फ़िल्म ने क़रीब 100 करोड़ का बिज़नेस किया और इसे 2014 में 5 कैटेगरी में राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला। क्योंकि फ़िल्म की जूरी कांग्रेस सरकार के वक़्त चुनी गई थी।

शिकारा (2020)

हाल ही में आई फ़िल्म ‘शिकारा’ को देखकर पता चलता है कि कश्मीर में फैले आतंक के पीछे अमेरिका का हाथ है क्योंकि हथियार बनाने वाली कंपनियां को हथियार बेचने हैं इसलिए वो कश्मीर में हिंसा भड़का रही हैं। इस फ़िल्म में कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अत्याचार को ऐसे छूकर निकला गया है मानो वो कोई ख़ास बात ही न हो, जबकि फ़िल्म की ब्रांडिंग कश्मीरी हिंदुओं के नाम पर ही की गई थी ताकि लोग ग़लतफ़हमी में इसे देखने के लिए पहुँचे। फ़िल्म को देखने वाला कोई भी सामान्य व्यक्ति यही समझेगा कि कश्मीर में आतंकवादी मासूम और बहुत भले लोग हैं और असली खलनायक अमेरिका है।

(अविनाश त्रिपाठी के इनपुट्स पर आधारित)

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