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जानिए कैसे केजरीवाल सरकार के कारण बच रहे हैं निर्भया के बलात्कारी

दिल्ली में 2012 के निर्भया बलात्कार केस में चारों आरोपियों की फाँसी एक बार फिर टल गई है। पटियाला हाउस कोर्ट ने अगले आदेश तक फाँसी के आदेश पर अमल टाल दिया है। इसका मतलब यह हुआ कि 1 फ़रवरी की सुबह छह बजे तय फाँसी अब नहीं होगी। इससे पहले 22 जनवरी को भी फाँसी की तारीख़ तय हुई थी, लेकिन वो तारीख भी टल गई थी। दरअसल इस मामले में एक ऐसा क़ानूनी पेच फँसा है जिसके कारण अदालतों को फाँसी का आदेश देने में दिक़्क़त पेश आ रही है। ये क़ानूनी पेच दिल्ली सरकार के कारण पैदा हुआ है। इस मामले में चल रही अदालती कार्यवाही के दौरान बार-बार इस बात का ज़िक्र आ रहा है। निर्भया की माँ भी इशारों में इस बात को कहती रही हैं। दरअसल फाँसी के क़ानून के तहत अपराधियों के कुछ क़ानूनी अधिकार होते हैं, अगर वो पूरे नहीं किए गए हैं तो फाँसी नहीं दी जा सकती।

फाँसी में क्या है क़ानूनी पेच?

5 मई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने चारों दोषियों की फाँसी की सज़ा पर मुहर लगा दी थी। इसके बाद उन्होंने अदालत में अलग-अलग समय पर पुनर्विचार याचिकाएं दायर की, जो ख़ारिज होती गईं। फाँसी के क़ानून के तहत यह ज़रूरी है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के फ़ौरन बाद दोषियों को यह नोटिस दे दिया जाए कि वो क्यूरेटिव पिटीशन और दया याचिका जैसे अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं। तिहाड़ जेल में बंद होने के कारण यह मामला दिल्ली सरकार के अधिकार में आता है। लेकिन मई 2017 से ढाई साल तक दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने दोषियों को नोटिस नहीं दिया कि पर्सी पिटीशन दायर करें। जबकि तकनीकी रूप से उन्हें यह काम सज़ा पर फ़ैसला आने के एक हफ़्ते के अंदर कर लेना चाहिए था। केजरीवाल सरकार ने अगर ये देरी नहीं की होती तो अब तक फाँसी हो चुकी होती। कुछ दिन पहले बीजेपी ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके ये सारे आरोप लगाए थे।

दोषियों के पास बाक़ी हैं विकल्प

पहले दोषी मुकेश ने बचाव के लिए अपने सभी क़ानूनी विकल्प इस्तेमाल कर लिए हैं। उसकी पुनर्विचार, क्यूरेटिव पिटीशन, दया याचिका और दया याचिका को ख़ारिज करने को चुनौती देने वाली याचिकाएँ नामंज़ूर हो चुकी हैं। दूसरे दोषी विनय की दया याचिका अभी राष्ट्रपति के पास है। अक्षय ने अभी तक राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर नहीं की है। जबकि चौथे पवन ने अभी तक अपने एक भी क़ानूनी विकल्प का इस्तेमाल नहीं किया है। यहाँ तक कि उसने सुप्रीम कोर्ट में ख़ुद को सज़ा के ख़िलाफ़ पुनर्विचार याचिका भी दायर नहीं की। यानी ऐसी स्थिति में फाँसी नहीं हो सकती। क्योंकि चारों आरोपियों के सारे क़ानूनी विकल्प ख़त्म हो चुका होना ज़रूरी है।

कोर्ट में खुली सरकार की चूक

15 जनवरी 2020 को दिल्ली सरकार और तिहाड़ जेल के अधिकारियों ने हाई कोर्ट के जस्टिस मनमोहन और संगीता धींगरा सहगल की बेंच के आगे माना कि जेल के नियमों के तहत अगर किसी मामले में एक से ज़्यादा लोगों को मृत्युदंड दिया गया है और उनमें से कोई एक दया याचिका दायर कर देता है तो सभी की फाँसी टल जाएगी, जब तक कि उसकी याचिका पर फ़ैसला न हो जाए। ये एक तरह से अपनी चूक मानने वाली बात थी क्योंकि चार में से एक दोषी मुकेश को छोड़कर बाक़ी तीन के पास अब भी क़ानूनी विकल्प बाक़ी हैं। जिसकी प्रक्रिया में लगने वाले स्वाभाविक समय के कारण सबकी फाँसी पर अमल रुक गया। दिल्ली सरकार ने अगर 2017 में ही उसे नोटिस दे दिया होता तो उसके पास क़ानूनी विकल्पों के इस्तेमाल में देरी काकोई बहाना नहीं होता।

केजरीवाल सरकार को फटकार

जब नियमों के इस पेच का खुलासा हुआ था तो दिल्ली हाई कोर्ट ने केजरीवाल सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी और कहा कि “फिर तो आपके नियम ही ठीक नहीं हैं। ऐसा लगता है कि नियम बनाते समय दिमाग़ नहीं लगाया गया और बाद में भी उनकी कोई समीक्षा की ज़रूरत नहीं समझी गई। यह पूरा सिस्टम मानो किसी कैंसर से जूझ रहा है।” हाई कोर्ट ने ये कड़ी टिप्पणी केजरीवाल के करीबी और दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा की तरफ़ मुख़ातिब होकर की थी। हैरानी की बात यह रही कि कोर्ट की इतनी कड़ी टिप्पणी को मीडिया ने लगभग दबा दिया। निर्भया की माँ ने भी मीडिया के आगे बयान में इस तकनीकी पहलू का ज़िक्र किया था, लेकिन उस पर भी चुप्पी साध ली गई।

देरी के पीछे क्या थी राजनीति?

माना जाता है कि निर्भया मामले में फांसी को केजरीवाल ने चुनाव से ठीक पहले अपने “मास्टरस्ट्रोक” की तरह बचाकर रखा था। उन्हें उम्मीद थी कि आख़िरी समय में वो आरोपियों की फाँसी की सिफ़ारिश उपराज्यपाल को भेज देंगे। इसके बाद फाइल गृह मंत्रालय को जाती है। इस दौरान उनके पास कहने का मौक़ा रहेगा कि गृह मंत्रालय फाइल को लटकाकर बैठा है। लेकिन गृह मंत्रालय ने फ़ौरन फाइल राष्ट्रपति को भेज दी और फाँसी की सिफ़ारिश कर दी। लेकिन दिल्ली सरकार को यह ध्यान ही नहीं था कि कुछ बलात्कारियों ने अभी अपने सारे क़ानूनी विकल्पों का इस्तेमाल नहीं किया है।

बलात्कारियों के हौसले बुलंद

लगातार दूसरी बार फाँसी टलने पर बलात्कारियों और उनके वकीलों के हौसले बुलंद हैं। फैसले पर निर्भया की मां आशा देवी ने कहा कि जो दोषी चाहते थे वही हुआ। उन्होंने बताया कि दोषियों के वकील एपी सिंह ने मुझे चैलेंज करते हुए कहा कि दोषियों को कभी फांसी नहीं होगी। उन्होंने कहा कि- मैं अपनी लड़ाई जारी रखूंगी और केजरीवाल सरकार को दोषियों को फांसी देनी ही होगी।

दिसंबर 2012 की है घटना

16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में एक लड़की के साथ 6 लोगों ने चलती बस में गैंगरेप किया था। उसके बाद उसे और उसके दोस्त को मरा समझकर फेंक दिया। बाद में पुलिस उसे अस्पताल लेकर पहुंची। हालत बिगड़ने के बाद उसे इलाज के लिए सिंगापुर भेजा गया। 29 दिसंबर 2012 को सिंगापुर के अस्पताल में निर्भया की इलाज के दौरान मौत हो गई। केजरीवाल ने चुनाव से पहले इस मुद्दे का जोरशोर से इस्तेमाल किया था। 13 सितंबर 2013 को निचली अदालत ने चारों दोषियों पवन गुप्त, विनय शर्मा, मुकेश और अक्षय सिंह को मौत की सजा सुनाई थी।

फाँसी टलने के इस तकनीकी पहलू पर बीजेपी लगातार केजरीवाल सरकार को घेरती रही है।

लगातार दूसरी बार फाँसी पर अमल टलने के बाद निर्भया की माँ का दर्द छलक पड़ा।

(न्यूज़लूज़ ब्यूरो)

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