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अपने ही जाल में फँस चुके हैं शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारी, जानिए 5 बड़े कारण

दिल्ली के शाहीन बाग इलाक़े में 15 दिसंबर 2019 को हुई हिंसा के बाद से लगा जाम अब तक जारी है। दरअसल ये इलाक़ा जामिया यूनिवर्सिटी से सटा हुआ है और नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ हिंसा की शुरुआत यहीं से हुई थी। यहाँ पर कई बसें जलाई गई थीं और गाड़ियों में तोड़फोड़ हुई थी। तब से चल रहे प्रदर्शन के कारण नोएडा से होकर फ़रीदाबाद और दक्षिणी दिल्ली की तरफ़ जाने वाली मुख्य सड़क बंद पड़ी है। इसी सड़क पर दिल्ली के मशहूर अपोलो और एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल हैं। इसके अलावा नोएडा और पश्चिमी यूपी के शहरों से एम्स या सफ़दरजंग अस्पताल में इलाज के लिए जाने वाले भी इसी रास्ते से जाते हैं। दिल्ली से नोएडा के स्कूलों में पढ़ने के लिए हज़ारों बच्चे भी इसी रास्ते से आते हैं। शाहीन बाग जाम के कारण इन सभी को डीएनडी के रास्ते जाना पड़ रहा है, जो कि लंबा है और उस पर भी हर समय ट्रैफ़िक जाम लग रहा है। अगर आप आंदोलन के अंदर की गतिविधियों की पड़ताल करेंगे तो पता चलता है कि इससे जुड़े लोग अपने ही बुने जाल में फँस चुके हैं। ये आंदोलन उस मोड़ पर पहुँच चुका है जहां से न तो वो पीछे जा पा रहे हैं और आगे जाने में नुक़सान ही नुक़सान हैं। जानते हैं इस बात के पीछे की 5 बड़ी वजहें।

1. आंदोलन का असली कारण कुछ और

शाहीन बाग जाम का कारण नागरिकता क़ानून कभी नहीं था। 15 दिसंबर की हिंसा के बाद ही यह साफ़ हो गया था कि बसें जलाने वाले इलाक़े के ही माफ़िया क़िस्म के लोग थे। पुलिस ने भी जो कार्रवाई की वो सिर्फ़ दंगाइयों को क़ाबू करने के लिए थी। इसके बावजूद शाहीनबाग का रास्ता जाम करने की रणनीति के पीछे बड़ा कारण यह था कि मुसलमान अपनी संख्या के दम पर सरकार को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर देंगे। इस आंदोलन को शुरुआती दिनों में देखने वाले लोग बताते हैं कि पहले ये कथित पुलिस कार्रवाई के ख़िलाफ़ था। दूसरे दिन राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश और कश्मीर में धारा 370 हटाने के विरोध में तख़्तियाँ दिखाई दीं। 3-4 दिन के बाद प्रदर्शनकारियों को ध्यान आया कि नागरिकता क़ानून को ही मुद्दा बनाना बेहतर होगा। दिल्ली पुलिस के पास भी जो ख़ुफ़िया इनपुट्स हैं उनके मुताबिक़ प्रदर्शन का असली मक़सद वो नहीं है जो बताया जा रहा है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस, दोनों ने ही अपने लोकल नेताओं के सहारे इस धरने को बढ़ावा दिया, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि इससे दिल्ली चुनाव में उन्हें फ़ायदा होगा।

2. नहीं काम आई ब्लैकमेल की राजनीति

नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ विपक्ष और मीडिया ने शुरू में ऐसा माहौल बना दिया था मानो इससे देश के सारे मुसलमानों की नागरिकता रद्द हो जाएगी। कई लोग इस झूठ पर यक़ीन भी करने लगे थे। लेकिन शाहीनबाग के प्रदर्शन में आए दिन ऐसी बातें होती रहीं, जिनसे लोगों को सच्चाई पता चलती गई। अब यह पूरी तरह से साफ़ है कि धरने पर बैठे लोगों पर नागरिकता क़ानून का कोई असर नहीं पड़ रहा। मतलब यह कि वो इस नाम पर सरकार को ब्लैकमेल करना चाहते थे। वो चाहते थे आंदोलन ख़त्म कराने की आड़ में सरकार से सौदेबाज़ी होगी तो कुछ ऐसे फ़ायदे पा लिए जाएँगे जो कांग्रेस के दिनों में आसानी से मिल जाया करते थे। यह वो ब्लैकमेल है जो मुसलमानों के तथाकथित नेता देश और सरकारों को अक्सर करते रहे हैं, लेकिन इस बार उनके मंसूबों पर पानी फिर गया।

3. जिहादी सपोर्ट की बात जगज़ाहिर हुई

शाहीन बाग़ में शुरुआती दिनों में कई महिलाएँ ऐसी तख़्तियाँ लेकर बैठी थीं जिन पर इस्लामी कट्टरपंथी संदेश लिखे गए थे, लेकिन इनके कारण मीडिया में आंदोलन को कवरेज नहीं मिल पा रही थी। बताया जा रहा है कि विवादित पत्रकार बरखा दत्त की सलाह पर यहाँ से इस्लामी पोस्टर हटाए गए। इसके बावजूद “जिन्ना वाली आजादी” जैसे नारे लग ही गए, जिससे यह साफ़ होता रहा कि आंदोलन के पीछे असल में जिहादी ताक़तें सक्रिय हैं।

4. देश को बदनाम करने की बड़ी साज़िश

किसी भी दूसरे आंदोलन में कोई अगर इतने दिन तक सड़क जाम करके बैठता तो उसे अब तक पुलिस के दम पर हटा दिया गया होता। लेकिन शाहीन बाग में अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई, क्योंकि जैसे ही पुलिस एक्शन में आएगी यहाँ की तस्वीरें दुनिया भर में फैलाकर भारत को बदनाम करने की कोशिश होगी कि वहाँ पर अल्पसंख्यकों का दमन हो रहा है। इसी मक़सद से शाहीन बाग में अमेरिका और यूरोप तक की मीडिया 24 घंटे डेरा डाले हुए है। जनता और पूरी दुनिया इस सच को भी देख और समझ रही है।

5. आंदोलनकारियों में पड़ चुकी है फूट

दिल्ली पुलिस के सूत्रों ने हमें बताया कि शाहीन बाग में धरने के आयोजक दरअसल पिछले क़रीब एक हफ़्ते से इसे ख़त्म करने का बहाना ढूँढ रहे हैं। वो लोकल पुलिस को इस बारे में मैसेज देने की भी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन वो बुरी तरह फँस चुके हैं क्योंकि बिना किसी तार्किक अंत से उनकी फ़ज़ीहत हो जाएगी। दिक़्क़त यह है कि आंदोलन के नाम पर मिल रही करोड़ों की फ़ंडिंग ख़त्म होती जा रही है और इलाक़े में कारोबार-धंधा चौपट होने के कारण अंदर ही अंदर नाराज़गी भी पैदा हो रही है। यही कारण है कि आंदोलनकारियों के दो ख़ेमे बन गए हैं और अंदर ही अंदर उनके बीच भारी टकराव की स्थिति है। ऐसे में पुलिस प्रशासन दूर से तमाशा देखना बेहतर समझ रहा है क्योंकि उसकी किसी भी कार्रवाई से दोनों गुटों को अपनी पक्ष सही साबित करने का बहाना मिल जाएगा।

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