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हिंदू मंदिरों के निर्माण के पीछे का विज्ञान जो आज भी रहस्य है!

तमिलनाडु के तंजौर में बना बृहदीश्वर मंदिर। इस विशाल मंदिर की वास्तुकला किसी अजूबे से कम नहीं।

देशभर में बने खूबसूरत और विशाल मंदिर हमारी हजारों साल पुरानी सभ्यता की जीती-जागती निशानियां हैं। ये भगवान के वो घर हैं, जहां फरियाद लेकर आने वाले की हर मुराद पूरी होती है। इंसान की आस्था उसे इन देवालयों तक लेकर जाती है। लोग इन मंदिरों में ईश्वर के दर्शन करके खुद को धन्य समझते हैं। लेकिन इन मंदिरों के पीछे एक विज्ञान भी है, जिसके बारे में ज्यादातर लोग नहीं जानते। दरअसल हमारे देश में बने प्राचीन मंदिर आस्था और अध्यात्म के साथ-साथ एक ऐसी वैज्ञानिकता को भी समेटे हुए हैं, जिनके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएंगे। दरअसल मंदिरों को बनाने का अपना एक अलग ही वास्तुशास्त्र है। इसे आगम शास्त्र भी कहते हैं। इसमें मंदिर की जमीन से लेकर उसके नींव और उसके शिखर तक के नियम तय हैं। मंदिर के अलग-अलग हिस्सों का आकार तय करने के लिए एक खास तरह की गणना का इस्तेमाल होता है। इस वैदिक ज्ञान को एक जगह पर समेट कर 15वीं शताब्दी में एक पुस्तक का रूप दिया गया था, जिस ‘देवालय चंद्रिका’ के नाम से जानते हैं। इसमें बताई गई बातों को जानना हर आस्थावान व्यक्ति के लिए जरूरी है। यह भी पढ़ें: शिवलिंग और परमाणु रिएक्टरों के बीच क्या है संबंध?

मंदिर की जगह और देवता का स्थान

सनातन धर्म में मंदिरों की जगह बहुत सोच-समझकर तय की जाती रही है। ये वो जगहें होती हैं जहां पर मनुष्य का संपर्क ब्रह्मांडीय ऊर्जा से होता है। इसी तरह मंदिर के आकार को लेकर भी वैदिक नियम तय हैं। जितने भी प्राचीन सिद्ध मंदिर हम देखते हैं उन सभी में धरती की चुंबकीय शक्ति बाकी जगहों से अधिक पाई गई है। यह रहस्य ही है कि हजारों साल पहले यह बात कैसे पता लगाई जाती रही होगी। मंदिरों की डिजाइन के पीछे के विज्ञान के बारे में इस लेख में आपको हम बताएँगे। सबसे पहले बात मंदिर में देवता के स्थान की। प्राचीन शैली के मंदिर हमेशा एक प्रमुख देवता के होते हैं। उनके अलावा अन्य देवताओं को भी मंदिर में सही दूरी और ऊंचाई पर लगाया जाता है। जहां पर प्रमुख देवता को स्थापित किया जाता है उसे गर्भगृह भी कहते हैं। ये जगहें ऐसी होती हैं जहां पर विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा सबसे अधिक मात्रा में पाई जाती है। यहां पर धरती की चुंबकीय शक्ति भी सबसे अधिक पाई जाती है। यह भी पढ़ें: जानिए जगन्नाथ मंदिर में घुसने को क्यों इतने उतावले हैं ग़ैर-हिंदू

किसकी हो मूर्ति और मूर्ति पूजा क्यों?

मंदिर में भगवान की प्रतिमा या प्रतीक किस धातु या पत्थर का हो इसके चुनाव का भी एक वैज्ञानिक आधार है। कई प्राचीन जागृत मंदिरों में मुख्य मूर्ति तांबे की प्लेट पर जड़ी हुई होती है। इसके पीछे बड़ा कारण यह है कि तांबा एक ऐसी धातु है जो धरती की चुंबकी शक्ति और आसपास के रेडिएशन को सोखता है। इससे मंदिर में आने वाला व्यक्ति उस सघन सकारात्मक ऊर्जा के संपर्क में आता है। मूर्ति की परिक्रमा के पीछे भी यही वैज्ञानिक तर्क दिया जाता है। हिंदू धर्म में ईश्वर को मूर्ति के रूप में सबसे ज्यादा पूजा जाता है। क्योंकि ध्यान के लिए हमेशा एक बिंदू की जरूरत होती है। मूर्तियों को ईश्वर का प्रतीक मानते हुए उन पर ध्यान लगाना बहुत आसान होता है। इसके मुकाबले किसी अमूर्त वस्तु की कल्पना करके ध्यान करना कठिन होता है। मंदिर में भगवान का स्थान एक तरह का केंद्र बिंदु होता है, जिस पर हर किसी का आसानी से ध्यान केंद्रित होता है। यह भी पढ़ें: काशी की अमरता के पीछे क्या है रहस्य?

मंदिर में बैठना क्यों है जरूरी?

अक्सर लोग मंदिर में दर्शन करके बाहर निकल जाते हैं। जबकि कोई भी देवालय पूजा पाठ से अधिक ध्यान की जगह होता है। इसलिए जरूरी है कि दर्शनों के बाद मंदिर परिसर में ही किसी शांत जगह बैठकर कुछ देर ध्यान लगाएं। गर्भगृह में दर्शन के बाद जो पॉजिटिव एनर्जी मिलती है वो ध्यान लगाने में सहायक होती है। यह भी पढ़ें: केदारनाथ को क्यों कहते हैं जागृत महादेव?

मंदिर के घंटे का निर्माण

मंदिर का घंटा किसी भी धातु का नहीं बनाया जाता। इसके लिए भी नियम तय हैं। आमतौर पर घंटे में कैडमियम, शीशा, तांबा, जस्ता, निकल, क्रोमियम और मैगनीज की मिश्र धातु का इस्तेमाल होता है। इनका अनुपात जितना सही होता है घंटे से निकलने वाली आवाज उतनी ही दिव्य और मधुर होती है। वैज्ञानिक तौर पर पाया गया है कि घंटे की आवाज का दिमाग पर बहुत अच्छा असर होता है। यह भी पढ़ें: हिंदुओं दोबारा मत कहना कि सभी धर्म एक समान हैं

दैवीय आभा मंडल का स्थान

फूल, धूपबत्ती और कपूर की सुगंध से मंदिर के अंदर एक दैवीय आभा मंडल का निर्माण होता है। इससे पैदा सकारात्मक ऊर्जा का संचार हर उस व्यक्ति में होता है जो मंदिर में प्रवेश करता है। इस आभामंडल का केंद्र मंदिर का गर्भगृह होता है, जहां पर थोड़ा समय बिताने से कई तरह की शारीरिक और मानसिक समस्याएं खुद ही दूर हो जाती हैं। यह भी पढ़ें: कहानी एक अनोखे योगी की, जिसे आग नहीं जला सकती

चरणामृत का क्या महत्व है?

मंदिरों में भक्तों को प्रसाद के तौर पर चरणामृत दिया जाता है। इसका इस्तेमाल भगवान की तांबे की मूर्ति का अभिषेक में होता है। इसमें तुलसी और कपूर जैसी दिव्य वस्तुएं होती हैं। चरणामृत के सेवन का स्वास्थ्य पर चमत्कारिक असर होता है। मंदिर हों या कोई दूसरा धर्मस्थल, उनका उद्देश्य मनुष्य को उस ईश्वरीय शक्ति के करीब लेकर जाना है जो जीवन का आधार है। देवालयों के निर्माण से जुड़े जो भी नियम हैं वो इसी बात को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। जहां कहीं भी आप खुद को उस ईश्वरीय शक्ति के करीब महसूस करते हैं वो आपके लिए सबसे सिद्ध मंदिर है। यह भी पढ़ें: देश के 7 सबसे अनोखे मंदिर, जिनके रहस्य आजतक कोई नहीं जान सका

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