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केजरीवाल को क्यों सता रहा है हार का डर, जानिए 5 बड़े कारण

दिल्ली में विधानसभा चुनावों का एलान हो चुका है और मीडिया के ज़रिए ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि इनमें आम आदमी पार्टी की जीत लगभग तय है। लेकिन क्या वाक़ई ज़मीनी स्तर पर यह बात सही है? इसकी पड़ताल के लिए हमारी टीम ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी के चुनाव प्रचार से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पदाधिकारियों से अनौपचारिक बात की। जो बातें सामने आईं वो हैरान करने वाली हैं। सार्वजनिक तौर पर ये सभी 100 फ़ीसदी जीत का भरोसा जता रहे हैं, लेकिन निजी बातचीत में ज़्यादातर के सुर बदल जाते हैं। दरअसल ख़ुद अरविंद केजरीवाल को लगता है कि विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी बहुमत से पीछे छूट सकती है। प्रचार की कोर टीम के साथ दिसंबर के आख़िर में हुई बैठक में केजरीवाल ने ऐसी आशंका भी जताई थी। आम आदमी पार्टी ने नवंबर में दिल्ली में एक सर्वे कराया था, जिसके नतीजे बहुत उत्साह बढ़ाने वाले नहीं थे। हम आपको बताते हैं वो 5 बड़े लक्षण जो इशारा करते हैं कि केजरीवाल जीत को लेकर आश्वस्त क्यों नहीं हैं। यह भी पढ़ें: दिवाली की रात हिंदुओं पर थी केजरीवाल की बुरी नज़र

1. प्रशांत किशोर की सेवाएँ लेनी पड़ीं

केजरीवाल ने इस चुनाव में चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपने साथ जोड़ा है। हालाँकि वो कहते हैं कि प्रशांत किशोर मुफ़्त में सेवाएँ दे रहे हैं, लेकिन हमारे सूत्र ने इसे ग़लत बताया। उनके मुताबिक़ केजरीवाल ने ख़ुद ही प्रशांत किशोर से संपर्क किया था, ताकि प्रचार की रणनीति में ख़ामियों को दूर किया जा सके। मीडिया के सर्वे में आम आदमी पार्टी की जिस विराट जीत का अनुमान लगाया जा रहा है अगर वाक़ई वैसा होता तो प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार की ज़रूरत क्यों आ पड़ी? इसका कारण है लोकसभा चुनाव के नतीजे। इसमें कांग्रेस को 22 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिले थे। दिल्ली में ऊपर से कांग्रेस भले ही कमजोर नज़र आती हो, लेकिन संगठन के स्तर पर अब भी काफ़ी मज़बूत है। आम आदमी पार्टी से नाराज़ होकर कई नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस में गए हैं। ऐसे में कांग्रेस ने अगर 2015 के विधानसभा चुनावों में मिले 9.7 फ़ीसदी वोट शेयर में थोड़ा भी सुधार कर लिया तो आम आदमी पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। प्रशांत किशोर को इसी की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। यह भी पढ़ें: जब मीटिंग में अपने ही विधायक के हाथों पिट गए थे केजरीवाल

2. विधायकों की इमेज ख़राब होना

2015 विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीती थीं। ज़्यादातर विधायकों की इमेज बहुत अच्छी नहीं है। कई पर भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी, हवाला, आम लोगों से मारपीट, धमकाने और यहाँ तक कि घरेलू हिंसा जैसे आरोप चल रहे हैं। विधायकों से इस नाराज़गी का असर चुनाव पर पड़ना तय है, क्योंकि अगर उनके टिकट कटते हैं तो उनमें से कई बाग़ी होकर वोटकटवा की भूमिका निभा सकते हैं। अगर टिकट नहीं कटेंगे और ज़्यादातर उन्हीं विधायकों को दोबारा टिकट मिल जाए तो बाक़ी कैडर में नाराज़गी का ख़तरा है। दरअसल आम आदमी पार्टी में टिकटों का मामला बेहद जटिल है। 2015 में यह स्थिति नहीं थी और तब ज़्यादातर ज़मीनी लोगों को टिकट मिल गए थे। लेकिन अब इस बात की गुंजाइश कम दिखती है। टिकट बँटवारे के बाद आम आदमी पार्टी में कई नेताओं के बाग़ी होने की आशंका है। ज़ाहिर है उन पर बीजेपी और कांग्रेस नज़र टिकाए बैठी हैं। ये सभी अलग-अलग तरीक़ों से आम आदमी पार्टी उम्मीदवारों को नुक़सान पहुँचाने के काम आ सकते हैं। यह भी पढ़ें: वो पाँच पुराने साथी, जिनसे केजरीवाल को डर लगता है

मॉडल टाउन इलाक़े से आम आदमी पार्टी के विधायक अखिलेश पति त्रिपाठी के ख़िलाफ़ अनशन पर बैठे स्कूल शिक्षक रंजीत राय।

3. नागरिकता क़ानून पर केजरीवाल के झूठ

सीएम केजरीवाल कई बार यह बोलते पाए गए हैं कि नागरिकता क़ानून लागू हुआ तो हिंदुओं को भी भारत छोड़कर जाना होगा। इसी तरह कुछ दिन पहले उन्होंने बोला था कि नागरिकता क़ानून लागू करके बीजेपी बिहार के लोगों को दिल्ली से भगा देगी। ये झूठ भी दरअसल उसी डर की निशानी हैं। केजरीवाल को लग रहा है कि अगर दो-चार फ़ीसदी लोग भी इस झाँसे में आ गए तो चुनाव में फ़र्क़ पड़ जाएगा। हालाँकि इन झूठों के कारण केजरीवाल की विश्वसनीयता पर बुरा असर पड़ा है। एक गंभीर नेता के तौर उनकी इमेज पहले से भी ज़्यादा धूमिल हुई है। यह भी पढ़ें: पानी मिले न मिले, शराब पिलाएगी केजरीवाल सरकार

4. केजरीवाल सरकार से नाखुश मुसलमान

केजरीवाल के हार के डर के पीछे एक बड़ी वजह मुसलमान हैं। ऊपरी तौर पर केजरीवाल ने बीते 5 साल मुस्लिम तुष्टिकरण जमकर किया। लेकिन ज़मीनी स्तर पर मुसलमानों को ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ। यहाँ तक कि दिल्ली की सरकारी नौकरियों और ठेकों वग़ैरह में मुसलमानों को बहुत कम हिस्सा मिला। लिहाजा मुस्लिम आबादी में यह राय बन चुकी है कि केजरीवाल मुसलमानों की बात भले ही करते हैं लेकिन काम वो अपने लोगों का करते हैं। इसी नाराज़गी की झलक 2019 लोकसभा चुनावों में देखने को मिली थी, जब कांग्रेस के वोट शेयर में भारी उछाल आया था और आम आदमी पार्टी तीसरे नंबर पर रही थी। फ़िलहाल इस मोर्चे पर केजरीवाल जोरशोर से लगे हैं। इसी चक्कर में कांग्रेस के कट्टरपंथी नेता शोएब इक़बाल और उसके पूरे परिवार को आम आदमी पार्टी में शामिल किया गया।

5. मीडिया के आगे केजरीवाल का सरेंडर

नए साल के मौक़े पर केजरीवाल ने दिल्ली के कुछ टीवी, प्रिंट और वेब पत्रकारों को मिलने के लिए अनौपचारिक रूप से बुलाया था। इसमें उन्होंने बीते 5 साल में मीडिया को दिए गए करोड़ों के विज्ञापनों का वास्ता देते हुए मदद की अपील की। केजरीवाल ने कई पत्रकारों को दोबारा सत्ता में आने पर निजी तौर पर ‘बड़े फ़ायदे’ का ऑफ़र भी दिया है। सवाल उठ रहा है कि अगर केजरीवाल को अपनी जीत का इतना ही भरोसा है तो फिर उन्हें इस तरह से मीडिया को लालच क्यों देना पड़ रहा है?

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