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लव जिहाद के जाल से बाल-बाल बची एक लड़की की कहानी

लव जिहाद यानी हिंदू लड़कियों को बहला-फुसलाकर प्रेम के जाल में फँसाकर मुसलमान बनाने की घटनाएँ हम अक्सर सुनते रहते हैं। लेकिन अक्सर लोग नहीं जान पाते कि क्या कारण है कि कई हिंदू लड़कियाँ इतनी आसानी से ऐसे लड़कों के जाल में फँस जाती हैं, जिनका सामाजिक और पारिवारिक माहौल न सिर्फ़ दक़ियानूसी और कट्टरपंथी होता है, बल्कि उनकी नीयत भी शुरू से ही ग़लत होती है। ट्विटर पर तन्वी नाम की एक लड़की ने अपनी आपबीती लिखकर बताई है। इसे हर किसी को पढ़ना चाहिए ताकि समझ सकें कि प्यार-मोहब्बत के नाम पर धर्मांतरण की कितनी बड़ी साज़िश चल रही है। जिसका शिकार वो हिंदू लड़कियाँ बनती हैं जो यह सोचती हैं कि सारे धर्म एकसमान होते हैं और एक दिन वो कट्टरता के एक ऐसे अंधे कुएँ में धकेल दी जाती हैं जिससे बाहर निकलना उनके लिए नामुमकिन होता है। मुंबई में रहने वाली तन्वी ने हिम्मत करके अपना अनुभव सबके साथ शेयर किया है। उनके ट्वीट का हमने हिंदी में अनुवाद किया है ताकि उनकी बात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँच सके।

तन्वी की आपबीती

स्कूल के दिनों में मैं एक मुस्लिम लड़के के साथ डेटिंग करती थी। उसका सबसे अच्छा दोस्त एक हिंदू था और वो मुस्लिम लड़का भी काफ़ी सभ्य और शरीफ़ क़िस्म का लड़का था। थोड़ा शर्मीला, पढ़ने-लिखने वाला और बहुत अच्छी तरह से बात करने वाला। आलम नाम का वो लड़का मेरे घर के पास ही रहता था। अक्सर वो मेरे घर भी आया करता था और मैं उसके घर पर जाया करती थी। उसके माता-पिता मेरे लिए कुछ ज़्यादा ही मधुर थे। उसने मुझे अपने माता-पिता से अपनी गर्लफ़्रेंड की तरह ही इंट्रोड्यूस कराया था। 14 साल की एक लड़की को एक लड़के और उसके पूरे परिवार से मिल रहा ऐसा अटेंशन और भाव बहुत मज़ेदार था। मुझे लगता था मानो पूरी दुनिया में मैं सबसे स्पेशल हूँ। एक दिन की बात है मैं उसके घर गई थी। उसके 3 भाई और 3 बहनें भी घर पर मौजूद थे। लेकिन तभी वो सभी कुछ न कुछ बहाना बनाकर बाहर चले गए। तभी मेरी छठी इंद्रिय ने काम करना शुरू कर दिया। आख़िर कोई दो नौजवान लड़के-लड़की को घर पर अकेला क्यों छोड़ेगा? क्या मेरे माता-पिता होते तो वो ऐसी सिचुएशन में मुझे अकेला छोड़ते? वो तो एक इंच भी नहीं खिसकते। और सबसे हैरानी तो इस बात की कि घर की लड़कियाँ क्यों चली गईं?

मैं अलर्ट हो गई और आलम से दूरी बनाकर रखा। मुझे लग रहा था कि कुछ तो गड़बड़ है। तभी उसने मेरे क़रीब आने की कोशिश शुरू कर दी। लेकिन मैंने उसे इजाज़त नहीं दी। कुछ ही मिनटों में मैंने बहाना बना दिया कि मेरी मम्मी फ़ोन कर रही हैं और मैं उसके घर से निकल गई। अगले दिन उसने मुझे फ़ोन किया और सॉरी बोलना शुरू कर दिया। मैंने पूछा- सॉरी किस बात का? उसने जवाब दिया, “मुझे लगा कि तुम्हें वो सब अच्छा नहीं लगा।” 3-4 दिन बाद उसकी माँ ने मेरे मोबाइल पर फ़ोन किया और बड़े प्यार से पूछा- बेटा, आप आजकल आ नहीं रही हो? फिर उन्होंने बताया कि “मैंने चिकन बिरयानी बनाई थी तो तुम्हारी बहुत याद आ रही थी।” मेरा दिमाग़ घूम गया कि 5 बच्चों की माँ को चिकन बिरयानी के लिए आख़िर मेरी ही याद क्यों आ रही है? खैर उन्होंने मुझे घर आने के लिए एक बार फिर से बोला। बाद में मैंने सोचा कि क्या पता मैं ही कुछ ज़्यादा शक कर रही हूँ। उन्होंने इतने प्यार से बुलाया है तो मिलने जाना चाहिए।

मैं एक बार फिर से उनके घर पहुँची। उस वक़्त वो क़ुरान पढ़ रही थीं। उन्होंने इशारा करके मुझे बैठने को कहा और क़ुरान पढ़ती रहीं। क़रीब 15 मिनट बाद उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और बोलीं- आओ मैं तुमको क़ुरान का पहला पन्ना पढ़कर सुनाती हूँ। फिर उन्होंने पहला पेज पढ़कर मुझे सुनाया। मैंने सुन तो लिया, फिर बोली- मेरी माँ भी हनुमान चालीसा पढ़ती हैं, लेकिन मुझे ज़्यादा समझ में नहीं आता। यह सुनते ही वो बोल पड़ीं, “वो सब कुफ़्र है, उस पर ध्यान मत दिया करो।” यह सुनकर मैं समझ गई कि माजरा क्या है। थोड़ी देर बाद मैंने ऐसे एक्टिंग की मानो मेरा फ़ोन बज रहा है और माँ का फ़ोन बोलकर मैं वहाँ से निकल गई। घर पहुँचकर मैंने सारी हिम्मत बटोरकर पापा को सारी बातें बता दीं। मुझे लग रहा था कि आज मुझे ज़ोरदार थप्पड़ पड़ने वाला है। लेकिन मैं यह देखकर हैरान रह गई कि मेरे पापा के आँखों से आंसू बह रहे थे। उन्होंने मुझे लिपटा लिया और देर तक रोते रहे। फिर उन्होंने आवाज़ देकर मेरी माँ को बुलाया। दोनों कुछ देर के लिए अंदर के कमरे में चले गए। मेरी माँ डरी हुई थीं और रुआंसी थीं। मैं भी रो पड़ी थी। पापा ने कहा- “तुम परेशान मत हो।” उन्होंने मेरे स्कूल में फ़ोन करके बात की और मेरे एक भाई से कहा कि वो मेरा ध्यान रखें।

आलम ने कुछ दिन बाद फिर से मुझसे संपर्क करने की कोशिश शुरू कर दी। यह देखकर मेरे भैया सीधे उसके घर पहुँच गए। वहाँ पर उसके पूरे परिवार ने ऐसे एक्टिंग की मानो उन्हें कुछ पता ही नहीं था। बाद में उसकी माँ जब भी मुझे दिखीं उन्हें देखकर यही लगा कि बिरयानी के लिए बुलाना हो या प्यार से बातें करना, उनके दिमाग़ में सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही बात थी कि इसको मुसलमान बनाना है। मेरी आँखें खुल चुकी थीं। अगर मैंने गलती की होती तो यह परिवार मुझे पूरी तरह से बर्बाद कर देता। शायद भगवान शिव ने मुझे सदबुद्धि दी। मैं आज भी उन्हें धन्यवाद कहती हूँ। वरना अब तक मैं 3 बच्चे पैदा कर चुकी होती और चौथा मेरे पेट में होता। फ़िलहाल आलम अपने परिवार के साथ एक मुस्लिम आबादी वाले इलाक़े में शिफ़्ट हो चुका है। वो और उसके सारे भाइयों की शादी हो चुकी है और वो सभी एक दो कमरे के मकान में अपनी बीवियों और बच्चों की फौज के साथ रहते हैं।

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