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1971 की लड़ाई का वो पायलट जो देश छोड़कर चला गया था

गांधी परिवार खुद को देश का सबसे बड़ा हितैषी और देशभक्त बताता रहा है। खास तौर पर 1971 के युद्ध को कांग्रेस पार्टी अपनी निजी जीत और उपलब्धि की तरह गिनाती रही है। लेकिन इस युद्ध से जुड़े ऐसे कई सच हैं जिन्हें लोगों की नजरों से छिपाया जाता रहा है। 1971 की लड़ाई के समय राजीव गांधी इंडियन एयरलाइंस के पायलट थे। जैसा कि होता है युद्ध के समय सभी आवश्यक सेवाओं से जुड़े लोगों की छुट्टियां रद्द कर दी जाती हैं। उस समय इंडियन एयरलाइंस के सभी पायलटों और अन्य कर्मचारियों की छुट्टियां भी रद्द कर दी गईं। लेकिन पूरे युद्ध के दौरान एक पायलट था जो छुट्टी पर रहा। वो थे राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी। उस दौर के कई पायलटों और पूर्व फौजी अधिकारी इस बात की पुष्टि करते हैं। उस दौर के कई पत्रकारों ने इस बारे में अखबारों और वेबसाइट पर भी लिखा है। हालांकि उन दिनों मीडिया आज की तरह व्यापक नहीं था, लिहाजा राजीव गांधी की गैरमौजूदगी ज्यादा चर्चा का विषय नहीं बन पाई।

लड़ाई के दौरान कहां थे राजीव गांधी?

वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता ने इस बारे में एक विस्तृत लेख लिखा है। इसमें उन्होंने बताया है कि युद्ध शुरू होने के बाद आपातकालीन नियमों के तहत सभी पायलटों की छुट्टियां कैंसिल कर दी गईं। क्योंकि सेना को सामग्री वगैरह पहुंचाने के लिए नागरिक विमानों की जरूरत पड़ सकती थी। सभी पायलट काम पर थे, लेकिन राजीव गांधी छुट्टी पर चले गए। बाद में पता चला कि वो अपनी नवविवाहिता पत्नी सोनिया गांधी उर्फ एंटोनियो माइनो के साथ इटली चले गए। वो सोनिया गांधी जिन्होंने बाद में अपनी भारतीयता को लेकर उठे विवाद पर यह कहा था कि मैं आखिरी सांस तक भारतीय हूं। राजीव और सोनिया की शादी 1968 में हुई थी। इसके बाद 1970 में राहुल गांधी का जन्म हुआ। यानी युद्ध के समय राहुल की उम्र 1 साल के करीब थी। 3 से 16 दिसंबर 1971 तक यानी कुल 13 दिन यह लड़ाई चली थी। इस पूरे दौरान राजीव, सोनिया और राहुल इटली में रहे थे और तभी लौटे जब पाकिस्तानी जनरल नियाजी ने सरेंडर के कागजात पर दस्तखत कर दिए और औपचारिक तौर पर युद्ध की समाप्ति का एलान कर दिया गया।

1977 में भी देश से भागे थे राजीव!

1971 की लड़ाई के बाद 1977 में राजीव और सोनिया एक बार फिर देश छोड़कर भागे थे। ये वो समय था जब आपातकाल हटने के बाद दोबारा चुनाव कराए गए और कांग्रेस पार्टी बुरी तरह से हारी। चुनावी नतीजों के फौरन बाद सोनिया गांधी पति राजीव और अपने दोनों बच्चों (1972 में प्रियंका जन्मीं) को लेकर रातों-रात दिल्ली के चाणक्यपुरी में इटली के दूतावास चली गई थीं। उस दौर में कई प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक उनके साथ ढेरों बड़े-बड़े बैग और अटैचियां थीं। बाद में संजय गांधी और मेनका गांधी के बहुत समझाने-बुझाने के बाद ही सोनिया घर वापस लौटने को तैयार हुई थीं। यह वो घटना है जिसका जिक्र उस दौर के अखबारों और किताबों में भी मिलता है। यह अपने आप में एक ऐसा उदाहरण है जो बताता है कि सोनिया गांधी की निष्ठा वास्तव में इस देश के लिए कितनी है।

भारतीय बनने से बचती रहीं सोनिया

1968 में शादी करके भारत आने के बाद सोनिया गांधी की कई गतिविधियां संदिग्ध रहीं। नागरिकता कानून के तहत 5 साल बाद यानी 1974 में सोनिया भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन दे सकती थीं। लेकिन उन्होंने अगले 10 साल तक नागरिकता के लिए कोई अर्जी नहीं दी। इसी दौरान किसी भी मुश्किल समय में उनका पति और बच्चों के साथ मायके भाग जाना भी यह इशारा करता है कि सोनिया गांधी अपनी इटली की नागरिकता को छोड़ना नहीं चाहती थीं। वो करीब 15 साल तक बिना भारतीय नागरिकता के देश की प्रधानमंत्री के घर में रहीं और किसी तरह का कोई विवाद नहीं हुआ। आज भी यह बात रहस्य है कि सोनिया गांधी ने भारत की नागरिकता किस साल में ली थी। ये सारी वो बातें हैं जिन पर कई दशक तक परदा डाले रखा गया। लेकिन अब जब लोगों को ये बातें पता चल रही हैं तो वो कांग्रेस पार्टी से सवाल पूछने लगे है।

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