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करप्शन की कार और गांधी परिवार का ‘बिगड़ैल बेटा’

क्या आपको पता है कि आज जिस मारुति कार पर हम आप सवारी करते हैं वो भी गांधी परिवार के भ्रष्टाचार की एक जीती-जागती मिसाल है। दरअसल ये इस बात का भी उदाहरण है कि गांधी परिवार अपने नालायक बेटों को किस तरह से देश के ऊपर थोपता रहा है। आज राहुल गांधी चर्चा में हैं तो 70 के दशक में उनकी जगह संजय गांधी थे। गांधी परिवार के इस सबसे बिगड़ैल बेटे ने 1976 में इमरजेंसी के दौरान जो कुछ किया उसकी कहानी तो हर कोई जानता है, लेकिन मारुति कार कंपनी के नाम पर गांधी परिवार ने जो लूट पूरे देश में मचाई थी उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती। उस समय इस प्राइवेट को कंपनी कार बनाने के लिए जिस तरह से करोड़ों रुपये बिना किसी जवाबदेही के दे दिए गए वो अपने आप में भ्रष्टाचार का एक ऐसा उदाहरण है जो देश में पहली बार देखने को मिला था। मारुति कार बनाने की इस पूरी कहानी को इंडिया टुडे पत्रिका ने 2014 में आए अपने विशेष अंक में प्रकाशित किया था।

पीएम के बेटे की ‘ड्रीम कार’

साल 1964 में संजय गांधी ने दून स्कूल में अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। इसके बावजूद उन्हें लंदन में मशहूर कार कंपनी रोल्स रॉयस में 3 साल की इंटर्नशिप मिल गई। इंटर्नशिप का मतलब है काम के साथ ट्रेनिंग। इंदिरा गांधी के इस नालायक बेटे को महंगी गाड़ियों का शौक पहले से ही था। मां भारत जैसे देश की प्रधानमंत्री थीं, ऐसे में संजय गांधी को काम सीखने की जरूरत भी क्या थी? लिहाजा इंटर्नशिप के नाम पर वो लंदन में मटरगश्ती करते रहे। 2 साल के अंदर ही उन्हें वहां से चलता कर दिया गया। आधा-अधूरा ज्ञान लेकर संजय गांधी भारत लौट आए और मोटरसाइकिल के इंजन से छोटी कार बनाने का फर्जीवाड़ा करने लगे। उन्होंने दावा किया कि वो ऐसी कार बना रहे हैं जिसकी मरम्मत कोई भी मैकेनिक आसानी से कर सकता है। तब संजय गांधी के इशारे पर नाचने वाले पत्रकारों की टीम ने इसे ‘जनता की कार’ यानी पीपुल्स कार का नाम भी दे दिया।

पुत्रमोह में फूंके करोड़ों रुपये

जिस तरह से इन दिनों सोनिया गांधी पुत्रमोह में डूबी हुई हैं, कुछ वैसा ही हाल उन दिनों इंदिरा गांधी का हुआ करता था। इंदिरा ने बेटे की ख्वाहिश पूरी करने के लिए अपनी पूरी सरकार और उसके अफसरों को झोंक दिया। बाकायदा कैबिनेट में प्रस्ताव पारित करवा कर ‘जनता की कार’ बनाने की परियोजना शुरू की गई। 4 जून 1971 को एक कंपनी बनाई गई मारुति मोटर्स लिमिटेड। बिना किसी योग्यता के संजय गांधी उसके मैनेजिंग डायरेक्टर बनाए गए। कंपनी में भर्ती किए गए बाकी लोगों के पास भी न कार बनाने का कोई अनुभव था न कोई ठीक-ठाक काम करने वाला प्रोटोटाइप, जिसके आधार पर ये माना जाता कि वो कार बना सकते हैं। लेकिन पुत्रमोह में बंधी इंदिरा गांधी ने देश की गरीब जनता की फ्रिक न करते हुए मारुति को हर साल 50 हजार कार बनाने का ठेका दे दिया। न कोई टेंडर हुआ न कोई सर्वे, आखिर करता भी कौन?

मारुति की पहली कार की ये तस्वीर उन दिनों अखबारों में खूब छापी गई थी। तस्वीर में जो व्यक्ति इस कार को चला रहा है वो संजय गांधी हैं। ये कार ऐसी थी जो खूब तेज आवाज करती थी और काला धुआं छोड़ती थी। इसकी स्पीड भी बहुत कम थी। लिहाजा यह खटारा कार ग्राहकों तक कभी नहीं पहुंच पाई।

मारुति के नाम पर खुली लूट

सरकार से हर साल 50 हजार कार बनाने का ठेका मिलने के बाद जनता के पैसे की असली लूट-खसोट शुरू हुई। हरियाणा के कांग्रेसी सीएम बंसीलाल ने दिल्ली से सटे गुड़गांव में कार की फैक्ट्री के नाम पर 290 एकड़ जमीन दी। कौड़ियों के भाव पर बेची गई उस जमीन को खरीदने के लिए लोन भी हरियाणा सरकार ने ही दिया। फैक्ट्री बनाने के लिए बैंकों और बड़े कारोबारियों को धमकाकर पैसे वसूले गए। 1971 में पाकिस्तान से जंग हुई और लोग इंदिरा गांधी की जय-जयकार करने लगे। कम याद्दाश्त वाली जनता मारुति घोटाले को भूल गई। 1972 में मारुति का पहला प्रोटोटाइप (मॉडल) आया। लोगों ने गाड़ी को खूब कोसा। घटिया डिजाइन… घटिया इंजन सबकुछ दो कौड़ी का था। संजय गांधी को समझ आ गया था कि मामला बनने वाला नहीं है तो उन्होंने जर्मन कंपनी फोक्सवागन से संपर्क किया कि वो भारत में अपनी बीटेल मॉडल उनके साथ ज्वाइंट वेंचर में लांच करें, लेकिन फोक्सवागन ने मना कर दिया। 1976 में जब इमर्जेंसी लगी तो जनता को लूट कर बनी कंपनी मारुति पर ताला लग गया। कंपनी की जांच के लिए शाह कमीशन बना लेकिन दोबारा कांग्रेस सरकार आने के कारण संजय गांधी का बाल भी बांका नहीं हुआ। इसी दौरान नए बाजार की तलाश कर रही जापानी कंपनी सुजुकी ने मारुति के साथ डील कर ली और सुजुकी ने ही पूरी तरह जापान में तैयार करके मारुति की पहली कार भारत में लॉन्च कर दी।

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