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जानिए बिप्लब देब से इतनी नफरत का क्या कारण है?

त्रिपुरा में वामपंथी पार्टियों के शासन का अंत करने वाले मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब के तथाकथित विवादित बयानों को इन दिनों मीडिया खूब दिखा और छाप रहा है। इनमें से कुछ बयान ऐसे हैं जो गलत तरीके से काट-छांट कर दिखाए जा रहे हैं, ताकि उनका मतलब बदल जाए, जबकि कुछ बातें ऐसी हैं जो उन्होंने कभी कहा ही नहीं। ऐसी झूठी खबरें फैलाने वालों में ज्यादातर वामपंथी अखबार, चैनल और न्यूज एजेंसी है। लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि आखिर त्रिपुरा जैसे छोटे राज्य का मुख्यमंत्री अचानक राष्ट्रीय मीडिया और बुद्धिजीवियों के टारगेट पर क्यों आ गया। इसी त्रिपुरा राज्य में पहले आए दिन बीजेपी और संघ के लोगों की हत्याएं होती थीं, तब तो मीडिया नहीं दिखाता था।

बिप्लब देब से दुश्मनी क्यों?

सबसे पहले जानते हैं कि बिप्लब देब के खिलाफ चलाए जा रहे इस अभियान के पीछे असली कारण क्या है। दरअसल मुख्यमंत्री बनने के अगले दिन से ही बिप्लब देब ने कुछ ऐसे फैसले लेने शुरू कर दिए, जिससे वामपंथी बुद्धिजीवियों और मीडिया में बौखलाहट है। इसमें सबसे अहम है राज्य के स्कूलों में वामपंथी किताबें हटाकर NCERT का पाठ्यक्रम लागू करना। अकेले इस कदम से इतनी तिलमिलाहट है कि उसे फेल करने की कोशिशें तेज़ हो गई हैं। इसके अलावा राज्य भर में सरकारी जमीनों पर कब्जा करके बनाए गए सीपीएम के सभी 78 दफ्तर ध्वस्त करने का आदेश बिप्लब देब ने ही दिया है। साथ ही यह पता चला है कि पिछली सीपीएम सरकार ने मिनी डीप ट्यूबवेल के नाम पर 80 से 90 करोड़ का घोटाला किया है। इसकी जांच के आदेश भी दिए जा चुके हैं। राज्य में चिटफंड कंपनियों के जरिए जनता की गाढ़ी कमाई की लूट के पीछे त्रिपुरा के बड़े वामपंथी नेताओं का नाम सामने आया है। इसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई है। साथ ही अगरतला विधानसभा में पहली बार राष्ट्रगान शुरू किया गया है। ये वो कदम हैं जिन्होंने बिप्लब देब को वामपंथियों की आंखों की किरकिरी बना दिया।

प्रोपोगेंडा के हथियार से हमला

कोलकाता के कम्युनिस्ट अखबार द टेलीग्राफ और देश की सबसे बड़ी न्यूज एजेंसी पीटीआई ने बिप्लब देब के बयान को तोड़-मरोड़ कर चलाया। बुद्ध जयंती पर एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि “गौतम बुद्ध का ज्ञान भारत से चलकर जापान और दूसरे देशों तक पहुंचा”। इसे पीटीआई और टेलीग्राफ ने बताया कि मुख्यमंत्री ने कहा है कि “बुद्ध भारत से जापान गए”। यहां आपको बता दें कि पीटीआई एक तरह से सरकारी समाचार एजेंसी होने के बावजूद वामपंथियों का अड्डा बनी हुई है। यहां पर मैनेजमेंट तो बदल चुका है, लेकिन निचले स्तर पर ज्यादातर पत्रकार कम्युनिस्ट पार्टी या कांग्रेस के कार्यकर्ता की तरह काम करते हैं। पीटीआई न्यूज एजेंसी है और इसकी दी खबरें बाकी अखबार और चैनल भी चलाते हैं। नीचे आप इस मसले पर त्रिपुरा सरकार का आधिकारिक बयान देख सकते हैं।

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