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यूरोप यात्रा में पीएम मोदी ने ऐसे बिगाड़ा चीन का खेल

पीएम नरेंद्र मोदी की यूरोप यात्रा का असल मकसद अब सामने आ रहा है। इस यात्रा में उन्होंने चीन के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव’ यानी BRI पर पानी फेर दिया है। यह वही प्रोजेक्ट है जो वन बेल्ट, वन रोड यानी OBOR के नाम से शुरू किया गया था। यह प्रोजेक्ट भारत के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा था। क्योंकि इसके तहत पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से होते हुए पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर और चीन के कब्जे वाले कश्मीर के इलाकों से होते हुए बांग्लादेश और उसके बाद थाईलैंड और सिंगापुर तक सड़क, जल और हवाई मार्ग से जोड़ने का प्रोजेक्ट था। ये सिल्क रूट की तरह से एक व्यापारिक मार्ग होता। भारत ने इसका विरोध किया क्योंकि ये पीओके के इलाके से भी गुजर रहा था। लेकिन उससे भी बड़ी चिंता यह थी कि इस प्रोजेक्ट के पूरा होने से पूरा अंतरराष्ट्रीय कारोबार चीन के कब्जे में आ जाता। चीन ने नेपाल को भी इस प्रोजेक्ट में शामिल कर लिया था। पीएम मोदी ने यूरोपीय यूनियन के 28 में से 27 देशों को इस प्रोजेक्ट के खिलाफ खड़ करने में कामयाबी पाई है।

भारत की बड़ी कूटनीतिक कामयाबी

माना जाता रहा है कि अगर चीन का यह प्रोजेक्ट सफल हो जाता तो सिर्फ एशिया और अफ्रीका ही नहीं, यूरोप तक के कारोबार और कंपनियों पर उसका दबदबा हो जाता। मोदी ने यूरोपीय देशों को यह समझाने में कामयाबी हासिल की कि चीन के प्रोजेक्ट से यूरोपीय यूनियन के कारोबार को उदार बनाने के एजेंडे को नुकसान होगा। क्योंकि चीन की सरकारी मदद पा रही कंपनियों के लिए कारोबार आसान हो जाता और दुनिया भर की दूसरी कंपनियों के लिए काम करना मुश्किल हो जाता। पीएम मोदी ने इन देशों के प्रतिनिधियों को यह समझाया कि भारत उनका सबसे भरोसेमंद सहयोगी है। अगर चीन का प्रोजेक्ट सफल होता है तो इससे भारत की संप्रभुता और अखंडता पर भी असर पड़ेगा। BRI के कुल 6 इकोनॉमिक कॉरीडोर 65 देशों से गुजरने हैं। लेकिन यूरोपियन यूनियन ने ट्रेड डॉक्यूमेंट पर दस्तखत करने से मना कर दिया है। सिर्फ हंगरी ने खुद को इससे बाहर रखा है। यह भी पढ़ें: तो इसलिए मोजांबिक की यात्रा पर गए थे मोदी!

डोकलाम की जड़ में भी यही सड़क

दावा किया जाता है कि इसी प्रोजेक्ट के तहत चीन डोकलाम से होते हुए सड़क बनाने की कोशिश कर रहा है। चीन के पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए भारत ने उस पर भरोसा न करने का फैसला किया और इस प्रोजेक्ट को शुरू से ही खारिज कर दिया। डोकलाम में सड़क निर्माण को रुकवाने के पीछे भी यही रणनीति है। अब यूरोपीय देश अगर इस प्रोजेक्ट से पीछे हट जाते हैं तो चीन के लिए इसके लिए फंडिंग पाना मुश्किल हो जाएगा। इसका पहला संकेत इंटरनैशनल मॉनेटरी फंड यानी IMF ने दे दिया है। उसका कहना है कि जीडीपी के अनुपात में भारत पर बहुत ज्यादा कर्ज है, लेकिन वह सही नीतियों के जरिए इसे तेजी से कम कर रहा है। 2017 में भारत सरकार का कर्ज जीडीपी का 70 प्रतिशत रहा है। जबकि चीन के कर्जे उसके लिए मुसीबत बन चुके हैं। आईएमएफ की इस टिप्पणी से दुनिया भर में चीन की आर्थिक स्थिरता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

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