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एनडीटीवी के ही पूर्व पत्रकार ने खोली चैनल की पोल

वह लेख एनडीटीवीख़बर.कॉम पर जाते ही वायरल हो गया। कुछ ही देर में उसपर सैकड़ों कमेंट्स आ चुके थे और ज़्यादातर टिप्पणियों में लेख में कही गई बातों का ज़ोरदार समर्थन था। इसके कुछ ही देर बाद मुझे एनडीटीवी इंडिया के तत्कालीन मैनजिंग एडिटर का ई-मेल मिला, जो एनडीटीवीख़बर.कॉम के प्रभारी को लिखा गया था और मुझे भी सीसी मार्क किया गया था। उस ई-मेल में लेख को साइट पर से अविलंब उतारने का निर्देश था, जिसके बाद उस लेख को फौरन उतार लिया गया। बाद में हमने मैनेजिंग एडिटर से पूछा कि आख़िर लेख में समस्या क्या हुई? इसपर उन्होंने कहा कि “लेख बहुत अच्छा था, लेकिन तुम तो जानते हो यार!” इसके बाद मैंने उन्हें धर्मसंकट में डालना उचित नहीं समझा, इसलिए कुछ नहीं पूछा, लेकिन खुलते-खुलते बात खुल ही गई कि पीएमओ ने उस लेख पर एतराज किया था और पीएमओ से संदेश मिलने के बाद उस लेख को उतारने में इतनी हड़बड़ी दिखाई गई थी।

मज़े की बात यह थी कि बाद में कुछ कांग्रेसी नेताओं के वे निराधार, बेसिरपैर और नफ़रत फैलाने वाले बयान ज़ोर-शोर से चलाए जा रहे थे, जिसमें वे उस हमले में आरएसएस का हाथ बता रहे थे, लेकिन हमारी निष्पक्ष और तथ्यात्मक बातें संस्थान के प्लेटफॉर्म पर जगह नहीं बना पाईं। इसीलिए, जब आज ये लोग कहते हैं कि वे सरकार से लड़ रहे हैं, तो हंसी आती है। एक सरकार की चापलूसी करने वाला संस्थान अगर दूसरी सरकार से लड़ रहा है, तो समझना मुश्किल नहीं कि क्यों और किसके इशारे पर लड़ रहा है? यानी एनडीटीवी में अभिव्यक्ति की आज़ादी हमेशा से एकतरफ़ा ही थी और इस प्रकार निष्पक्षता भी हमेशा से ही संदिग्ध थी। अगर हम जैसे न्यूट्रल लेखक-पत्रकार अपनी बात रखना चाहते, तो उसके लिए एनडीटीवी में स्पेस तब भी बहुत कम था।

(एनडीटीवी के पूर्व पत्रकार अभिरंजन कुमार के फेसबुक पेज से साभार)

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