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कर्नाटक में राहुल गांधी से प्रचार नहीं चाहती कांग्रेस!

गुजरात और हिमाचल में चुनाव हारने के बाद कांग्रेस पार्टी अब कर्नाटक को लेकर उलझन में है। ताजा जानकारी यह है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया नहीं चाहते कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कर्नाटक में गुजरात की तरह प्रचार करें। सिद्धारमैया ने यह बात अपने कुछ करीबियों के जरिए पार्टी हाईकमान तक पहुंचाई है। मुख्यमंत्री का फॉर्मूला यह है कि राहुल गांधी कर्नाटक के कुछ इलाकों तक ही सीमित रहें। खास तौर पर वो शहरी इलाकों में प्रचार करने न जाएं, क्योंकि उससे कांग्रेस पार्टी को नुकसान हो सकता है। अभी यह साफ नहीं है कि इस फॉर्मूला पर कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकारों का क्या रुख़ है। लेकिन यह हैरानी की बात है कि कांग्रेस की ही एक राज्य ईकाई अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष से प्रचार करवाने की इच्छुक नहीं है। पंजाब चुनाव के वक्त भी यही हुआ था तब कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर उतरने के लिए यही शर्त रखी थी कि वो खुद प्रचार की कमान संभालेंगे और राहुल गांधी को पंजाब से दूर रखा जाएगा। कर्नाटक अब उन कुछ गिने-चुने राज्यों में से है जहां पर कांग्रेस की सरकार बाकी है। यहां पर अप्रैल-मई में चुनाव होने हैं।

मोदी बनाम राहुल नहीं चाहती कांग्रेस

गुजरात चुनाव जिस तरह से पूरी तरह से मोदी बनाम राहुल बन गया था, उससे कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया डरे हुए हैं। इसलिए चुनावी रणनीति का जो खाका उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व को भेजा है उसमें राहुल गांधी की चुनावी सभाएं बहुत ही रखने को कहा गया है। उनकी ज्यादातर सभाएं मुस्लिम, ईसाई बहुल इलाकों और ग्रामीण क्षेत्रों में रखने का प्रस्ताव है। स्थानीय मीडिया में इस बारे में रिपोर्ट्स भी छपी हैं। सिद्धारमैया का कहना है कि “अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी को हम पहला गिफ्ट देंगे।” सीएम के इस बयान का एक छिपा मतलब यह निकाला जा रहा है कि राहुल गांधी राज्य से दूर रहें तो जीत संभव है। कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी के पास सिद्धारमैया के रूप में बड़ा चेहरा है। उन्होंने मुसलमानों, ईसाइयों, पिछड़ी जातियों और दलितों के तुष्टीकरण के आधार पर एक जातीय समीकरण बनाया है जिसे कन्नड़ में ‘अहिंदा’ कहते हैं। अगर राहुल गांधी प्रचार करने आए तो वो जरूर कोई न कोई ऐसी बात कह सकते हैं जिससे बीजेपी को ‘हिंदू एकता’ के फॉर्मूले में मदद मिलेगी।

हिंदुओं को बांटने का कांग्रेसी फॉर्मूला

पिछले दिनों में कर्नाटक में हिंदी विरोधी आंदोलन हुए थे, उसके पीछे मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का दिमाग माना जाता है। उन्होंने कन्नड़ स्वाभिमान के नाम पर कई संगठनों को पिछले दिनों में खड़ा किया है जो वास्तव में ईसाई मिशनरियों के इशारे पर काम कर रहे हैं। यह बात अक्सर सामने आती रही है कि कर्नाटक में पिछले 5 साल में सोनिया गांधी के इशारे पर ईसाई मिशनरियों को सरकारी फंड से करोड़ों रुपये बांटे गए। इसी तरह लिंगायत समुदाय को हिंदू धर्म से अलग धर्म की मान्यता देने की मांग के पीछे भी कांग्रेस का हाथ रहा है। कांग्रेस कर्नाटक में 16 फीसदी मुस्लिम आबादी के वोटों को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त है। इसी मकसद से उसने टीपू सुल्तान जयंती का आयोजन किया था। उसे लग रहा है कि अगर बीजेपी का समर्थन करने वाले कुछ लिंगायत वोटों को भी अगर वो तोड़ लेगी तो सत्ता में वापसी कर लेगी।

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कर्नाटक में बीजेपी की रणनीति क्या?

राहुल गांधी को लेकर कर्नाटक कांग्रेस की उलझन को बीजेपी अच्छी तरह से समझ रही है। उसे पता है कि राहुल गांधी आते ही कर्नाटक के मुद्दों को भटका देंगे। लिहाजा पार्टी के नेता इस सवाल पर वेट एंड वॉच की पॉलिसी अपनाए हुए हैं। कर्नाटक में हिंदुओं के बीच नरेंद्र मोदी की जबर्दस्त लोकप्रियता है। पार्टी के सबसे बड़े नेता बीएस येदियुरप्पा पूरे राज्य में परिवर्तन यात्रा निकाल रहे हैं। येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय से हैं और वो लिंगायतों को तोड़ने की कांग्रेसी रणनीति को फेल करने में अपनी तरह से जुटे हुए हैं। 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यहां 17 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस सत्ता में होने के बावजूद 9 पर सिमट गई थी। कर्नाटक में गांव-गांव में बीजेपी और आरएसएस का संगठन है और उन्हें इसका बड़ा श्रेय दिया जाता है।

अभी जबकि कर्नाटक में चुनाव प्रचार शुरू नहीं हुआ है कांग्रेस नेताओं की अपने ही नए-नवेले राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर हिचकिचाहट काफी कुछ कहती है। यह तय है कि आने वाले समय में राहुल गांधी अपनी ही पार्टी के लिए दोधारी तलवार का काम करते रहेंगे।

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