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जानिए बद्रीनाथ धाम में कैसे हो गई ‘जिहादी घुसपैठ’

क्या आपको पता है कि हिंदुओं के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक बद्रीनाथ पर मुसलमानों की बुरी नज़र पड़ चुकी है? हालात यहां तक कि एक देबबंदी उलेमा ने बद्रीनाथ धाम पर यह कहते हुए हक़ जता दिया कि ये दरअसल बदरुद्दीन शाह की दरगाह है। ये सब कुछ हुआ है हिंदुओं की ही एक गलती से जिसका नतीजा इस रूप में सामने आ रहा है। दरअसल कुछ साल पहले यहां पर कुछ गरीब मुस्लिम परिवार आए थे। उन पर रहम खाकर हिंदुओं ने उनके रहने का बंदोबस्त कर दिया। ये लोग छोटे-मोटे काम करके गुजारा करते थे। अब इन्हीं मुस्लिम परिवारों ने अपनी आबादी बढ़ाकर इस पवित्र धाम की शांति को भंग करने की कोशिश शुरू कर दी है। दो बार मंदिर को अपवित्र करने की कोशिश भी की जा चुकी है। जब हिंदू संगठनों ने इस बात पर ऐतराज जताया तो उसके जवाब में देवबंदी मौलाना का बयान आया कि बद्रीनाथ धाम दरअसल मुसलमानों का है। इसके बाद से स्थानीय लोगों में भारी गुस्सा है।

बद्रीनाथधाम को बचाने की कोशिश

मुसलमानों के रवैये को देखते हुए स्थानीय लोगों ने तय किया है कि वो अब उन्हें अपने इलाके में रहने की इजाज़त नहीं दे सकते। इस साल मंदिर के कपाट बंद होने के बाद इन सभी को बाहर निकाल दिया गया है। यह तय हुआ है कि मंदिर दोबारा खुलने के बाद भी मुस्लिम शरणार्थियों को वापस नहीं बसाया जाएगा। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि जिन मुसलमानों को उन्होंने मानवता के नाते बसने की जगह दी थी वो एक दिन उन्हीं के लिए खतरा बन जाएंगे। उत्तराखंड रक्षा अभियान नाम से एक आंदोलन शुरू किया गया है, जो राज्य भर में फैले हिंदू मंदिरों पर मुसलमानों के कब्जे की ऐसी कोशिशों पर नज़र रखेगा। यह बात सामने आई है कि कई जगहों पर पूरी साजिश के तहत मंदिरों के इर्द-गिर्द मुसलमानों की आबादी बसाई जा रही है। यह भी पढ़ें: हमने इंसानियत के नाते शरण दी, वो जिहाद करने लगे

बद्रीनाथ में बदरुद्दीन कहां से आया?

दरअसल बद्रीनाथ धाम की आरती को लेकर एक झूठ बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से फैलाया गया है। सिर्फ इस इलाके ही नहीं, देश भर में कुछ सेकुलर इतिहासकारों ने यह बात फैला दी कि बद्रीनाथ में जो आरती सुबह-शाम गाई जाती है उसे एक मुसलमान ने लिखा है। 1865 में यहां एक मुसलमान पोस्टमास्टर फकरुद्दीन आया था। उसी ने 18 साल की उम्र में बद्रीनाथ की आरती लिखी थी। बाद में उसने अपना नाम बदलकर बदरुद्दीन कर लिया था। 1951 में 104 साल की उम्र में बदरुद्दीन की मौत हो गई। उसका परिवार अब भी यहां रहता है। लेकिन इलाके के लोग हमेशा से इस बात को झूठ बताते रहे हैं। इलाके के वरिष्ठ पत्रकार क्रांति भट कहते हैं कि मंदिर में मिले भोजपत्र के मुताबिक इस आरती को संतेरा खाल में रहने वाले ठाकुर धन सिंह ने लिखा था। उनके परिवारवालों के पास भोजपत्र पर लिखी वो पांडुलिपि आज भी सुरक्षित है। जबकि बदरुद्दीन के पक्ष में ऐसा कोई सबूत नहीं है। चूंकि मामला मुसलमान का था इसलिए अखबारों और पत्रिकाओं ने इस झूठ को इतनी बार दोहराया कि कुछ लोगों को यह सच लगने लगा। इलाके में यह बात भी प्रचलित है कि बदरुद्दीन के पिता मनु गौड़ ने एक मुस्लिम लड़की से शादी कर ली थी, जिसके बाद उन्हें जाति से बाहर कर दिया गया था। मनु गौड़ बाद में मुसलमान बन गए थे।

राष्ट्रीय सनातन सभा के प्रदेश महिला विंग की अध्यक्ष निम्मी कुकरेती ने बद्रीनाथ मंदिर को लेकर मुसलमान धर्मगुरुओं की बयानबाजी पर नाराजगी जताई है। नीचे आप उनकी फेसबुक पोस्ट पढ़ सकते हैं।

मशहूर वकील प्रशांत पटेल ने भी मौलाना के बयान का मसला उठाया है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा है कि हिंदुओं के धार्मिक स्थानों के आसपास बहुत सोच-समझकर मुसलमानों को बसाया गया है। वो आबादी बढ़ाते हैं और एक बार जब ठीक स्थिति में आ जाते हैं तो हिंदुओं को वहां से खदेड़ना शुरू कर देते हैं।

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